section 28
Orders to ensure compliance
The Madhya Pradesh Electricity Reforms Act, 2000(१) जहां आयोग का यह समाधान हो जाता है कि कोई अनुज्ञप्तिधारी किसी सुसंगत शर्त या अपेक्षा का उल्लंघन कर रहा है या उसका उल्लंघन करने वाला है तो वह धारा २९ के अधीन अंतिम आदेश द्वारा, और यदि वह उपधारा (२) के अनुसार समुचित समझे तो इस धारा के अधीन अंतरिम आदेश द्वारा ऐसे निदेश जारी करेगा जैसे कि वह अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए उचित समझे। (२) यह अवधारित करने में कि क्या यह समुचित होगा कि अंतरिम आदेश किया जाए, आयोग, विशिष्टतया निम्नलिखित का ध्यान रखेगा - (क) वह सीमा, जिस तक अनुज्ञप्तिधारी द्वारा उल्लंघन या संभाव्य उल्लंघन, इस अधिनियम के उद्देश्यों और प्रयोजनों को उपलब्धि को प्रभावित करेगा; (ख) वह सीमा, जिस तक अंतिम आदेश किए जाने के पूर्व सुसंगत शर्त या अपेक्षा के उल्लंघन में किसी ऐसी बात के परिणामस्वरूप जो की जानी है या किए जाने से छोड़ दी गई है, किसी व्यक्ति को हानि या नुकसान होना संभाव्य है; और (ग) वह सीमा जिस तक (इस धारा में इसके पश्चात् उपबंधित उपबंधों को ध्यान में रखते हुए) किसी सुसंगत शर्त या अपेक्षा के अभिकथित उल्लंघन के संबंध में कोई अन्य उपचार उपलब्ध है। (३) यदि आयोग कोई अंतरिम आदेश किया जाना प्रस्तावित करता है तो वह, - (क) यह कथन करते हुए कि वह आदेश करना प्रस्तावित करता है; (ख) निम्नलिखित बातें उपवर्णित करते हुए:- (एक) ऐसी सुसंगत शर्तों या अपेक्षाएं जिनका अनुपालन किया जाना प्रस्तावित आदेश द्वारा आशयित है; (दो) ऐसे कृत्य या लोप जिनरो उसकी राय में उस शर्त या अपेक्षा का उल्लंघन होता है; (तीन) ऐसे अन्य तथ्य जो उनकी राय में प्रस्तावित आदेश किया जाने को न्यायोचित ठहराते हैं; और (चार) प्रस्तावित आदेश के प्रभाव, और वह कालावधि विनिर्दिष्ट करते हुए जो कि सूचना की तारीख से ५ दिन से कम की नहीं होगी, जिसके भीतर अनुज्ञप्तिधारी प्रस्तावित आदेश के विरुद्ध अभ्यावेदन या आक्षेप कर सकता है, अनुज्ञप्तिधारी को सूचना देगा। (४) उपधारा (५) के अध्याय रहते हुए और अनुज्ञप्तिधारी से उपधारा (३) के अनुसरण में प्राप्त अभ्यावेदनों या आक्षेपों पर विचार ले लेने के पश्चात्, आयोग (अनुज्ञप्तिधारी के अभ्यावेदनों या आक्षेपों के कारण प्रस्तावित आदेश को उपांतरित करते हुए), उपधारा (३) में निर्दिष्ट कालावधि का अवसान होने के पश्चात्, किसी भी समय अंतरिम आदेश कर सकेगा यदि :- (क) आयोग के पास यह विश्वास करने का ठोस कारण है कि, उस अनुज्ञप्तिधारी ने जिससे कि आदेश संबंधित है, किसी सुसंगत शर्त या अपेक्षा का उल्लंघन किया है या उल्लंघन कर रहा है या वह उनका उल्लंघन करने वाला है; और (ख) आदेश द्वारा किए गए उपबंध उस शर्त या अपेक्षा का अनुपालन सुनिश्चित करने के प्रयोजन से अपेक्षित है। (५) आयोग, कोई अंतरिम आदेश नहीं कर सकेगा यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि अनुज्ञप्तिधारी ऐसे सभी कदम उठाने के लिए सहमत हो गया है और वह ऐसे कदम उठा भी रहा है जिन्हें कि आयोग समझता है कि उस प्रश्नाधीन शर्त या अपेक्षा का अनुपालन सुनिश्चित करने या उसे सुकर बनाने के लिए अनुज्ञप्तिधारी को कदम उठाना चाहिए; (६) अंतरिम आदेश, - (क) द्वारा ऐसे अनुज्ञप्तिधारी से जिससे कि वह संबंधित है, (मामले की प्रकृति के अनुसार) यह अपेक्षा की जा सकेगी कि वह ऐसी बातें करें या न करें जैसी कि आदेश में विनिर्दिष्ट है या जो इस प्रकार विनिर्दिष्ट किए गए प्रकार की है। (ख) शीघ्रतम साध्य ऐसे समय से प्रभावशील होगा जो कि आदेश द्वारा अवधारित किया गया हो; और (ग) आयोग द्वारा किसी भी समय प्रतिसंहत, उपांतरित या त्रिखंडित किया जा सकेगा, परंतु किसी भी दशा में ऐसी कालावधि के समाप्त होने पर जैसी कि आदेश में कथित है, तब प्रभावहीन हो जाएगा जब तक कि आयोग, धारा २९ में उपवर्णित प्रक्रिया का अनुसरण करके, उस अंतरिम आदेश को अंतिम आदेश के रूप में घोषित न कर दे। (७) अंतरिम आदेश के पश्चात् आयोग यथासाध्य शीघ्रता से, - (क) आदेश को एक प्रति उस अनुज्ञप्तिधारी पर तामील करेगा जिससे कि वह आदेश संबंधित है; (ख) आदेश को ऐसी रीति में प्रकाशित करेगा जैसा कि वह उसे उन व्यक्तियों की जानकारी में लाने के प्रयोजन के लिए, जिनके कि उससे प्रभावित होने की संभावना है, समुचित समझे; और (ग) अंतरिम आदेश को धारा २९ के अनुसार अंतिम आदेश के रूप में घोषित करने की कार्यवाहियां प्रारंभ करेगा।
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