Bare Act
The Madhya Pradesh Electricity Reforms Act, 2000
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ
(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम मध्यप्रदेश विद्युत् सुधार अधिनियम, 2000 है। (2) इसका विस्तार सम्पूर्ण मध्यप्रदेश राज्य पर है। (3) यह ऐसी तारीख को प्रवृत्त होगा जिसे राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा, नियत करे।
2. परिभाषाएं
इस अधिनियम में जब तक संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,- (क) "पारेषण का क्षेत्र" से ऐसा क्षेत्र अभिप्रेत है जिसके भीतर किसी पारेषण अनुज्ञप्ति का धारक या कोई अन्य व्यक्ति तत्समय विद्युत् पारेषित करने के लिये प्राधिकृत है; (ख) "आयोग" से अभिप्रेत है धारा 3 के अधीन गठित मध्यप्रदेश विद्युत् नियामक आयोग; (ग) "केन्द्रीय आयोग" से अभिप्रेत है विद्युत् नियामक आयोग अधिनियम, 1998 (केन्द्रीय अधिनियम, 1998 का सं. 14) की धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन गठित केन्द्रीय विद्युत् नियामक आयोग; (घ) "केन्द्रीय अधिनियम" से अभिप्रेत है विद्युत् नियामक आयोग अधिनियम, 1998 (1998 का सं. 14); (ङ) "विद्युत् उद्योग" से ऐसे व्यक्ति या अस्तियां अभिप्रेत हैं जो विद्युत् के कारबार या उसके उत्पादन के क्रियाकलापों, पारेषण, उप-पारेषण, वितरण के या विद्युत् प्रदाय या ऊर्जा प्रणाली के प्रचालन में, ऐसे कारबार और क्रियाकलापों के विनियमन और उससे संसक्त विषयों में संलग्न हों; (च) "उच्च न्यायालय" से अभिप्रेत है मध्यप्रदेश राज्य का उच्च न्यायालय; (छ) "स्थानीय प्राधिकरण" से अभिप्रेत है राज्य में नगरपालिका निगम, नगरपालिका, नगर पंचायत, जनपद पंचायत या जिला पंचायत किन्तु और कोई अन्य प्राधिकरण नहीं; (ज) "अनुज्ञप्ति" से अभिप्रेत है इस अधिनियम की धारा 15 के अधीन प्रदान की गई कोई अनुज्ञप्ति और इसमें सम्मिलित है धारा 3 के अधीन प्रदान की गई अनुज्ञप्ति और इस अधिनियम के प्रवृत्त होने के पूर्व भारतीय विद्युत् अधिनियम, 1910 (1910 का सं. 9) की धारा 28 के अधीन दी गई मंजूरी; (झ) "अनुज्ञप्तिधारी" या "अनुज्ञप्ति धारक" से अभिप्रेत है इस अधिनियम के भाग-पांच के अधीन विद्युत् पारेषित करने या प्रदाय करने के लिये अनुज्ञप्त कोई व्यक्ति और उसके अंतर्गत धारा 3 के अधीन अनुज्ञप्त व्यक्ति या ऐसा व्यक्ति भी है जिसे इस अधिनियम के प्रवृत्त होने के पूर्व भारतीय विद्युत् अधिनियम, 1910 (1910 का सं. 9) की धारा 28 के अधीन मंजूरी प्रदान की गई है; (ञ) "सदस्य" से अभिप्रेत है आयोग का सदस्य और उसमें आयोग का चेयरपर्सन सम्मिलित होगा; (ट) "विहित" से अभिप्रेत है इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों या विनियमों द्वारा विहित; (ठ) "विनियम" से अभिप्रेत है इस अधिनियम के अधीन आयोग द्वारा बनाए गए विनियम; (ड) "नियम" से अभिप्रेत है राज्य सरकार द्वारा इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियम; (ढ) "चयन-समिति" से अभिप्रेत है धारा 4 के अधीन गठित चयन-समिति; (ण) "राज्य" से अभिप्रेत है मध्यप्रदेश राज्य; (त) "राज्य सरकार" से अभिप्रेत है राज्य की सरकार; (थ) "पारेषित करना" से अभिप्रेत है किसी ऐसी प्रणाली द्वारा विद्युत् का परिवहन या पारेषण जो पूर्णतः या मुख्यतः, अतिरिक्त उच्च वोल्टेज और अतिरिक्त उच्च दाब लाइन (हाईटेंशन लाइन) और विद्युत् संयंत्र से मिलकर बनी है और जिसका उपयोग विद्युत् को एक उत्पादन केन्द्र से किसी उप केन्द्र को, किसी उत्पादन केन्द्र से अन्य को, या उप-केन्द्र से अन्य को, या अन्यथा एक स्थान से दूसरे स्थान को परिवर्तित करने के लिए और पहुंचाने के लिये और/या अन्तरित करने के लिये किया जाता है; (द) "प्रदाय" में उप पारेषण और वितरण सम्मिलित होगा; (ध) "उपक्रम" से अभिप्रेत है ऐसी कारबार इकाई जो राज्य में, यथास्थिति, उत्पादन, पारेषण के विनिर्दिष्ट क्षेत्र में विद्युत् के प्रदाय या राज्य में ऊर्जा प्रणाली के प्रचालन से संबद्ध किसी अन्य कार्यकलाप में संलग्न हो; (न) उन शब्दों तथा अभिव्यक्तियों का जो इस अधिनियम में प्रयुक्त हैं किन्तु परिभाषित नहीं हैं और भारतीय विद्युत् अधिनियम, 1910 (1910 का सं. 9) या विद्युत् (प्रदाय) अधिनियम, 1948 (1948 का सं. 54) में परिभाषित हैं, वही अर्थ होगा जो इन अधिनियमों में उनके लिए दिया गया है।
3. आयोग की स्थापना और गठन
(1) राज्य के लिए एक आयोग होगा जिसे मध्यप्रदेश राज्य विद्युत् नियामक आयोग के नाम से जाना जाएगा जो शाश्वत उत्तराधिकार के साथ एक निगमित निकाय होगा और जिसकी एक सामान्य मुद्रा होगी और उसे जंगम तथा स्थावर दोनों प्रकार की सम्पत्ति अर्जित करने, धारण करने और उनका व्ययन करने तथा संविदा करने की शक्ति होगी और वह उक्त नाम से वाद चलाएगा या उक्त नाम से उसके विरुद्ध वाद चलाया जाएगा। (2) राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा आयोग गठित करेगी। आयोग एक अध्यक्ष (चेयरपर्सन) और दो सदस्यों से मिलकर बनेगा जो इस अधिनियम में उपबंधित रीति में चयनित और नियुक्त किए जाएंगे। राज्य सरकार किसी भी सदस्य को अध्यक्ष (चेयरपर्सन) के रूप में पदाभिहित करेगी। दो सदस्यों में पारस्परिक ज्येष्ठता की गणना उनकी अपनी-अपनी नियुक्ति की तारीख से की जाएगी। उस दशा में जब दो या अधिक व्यक्तियों का एक ही समय पर चयन किया जाता है तो राज्य सरकार, नियुक्ति करते समय उनमें ज्येष्ठता का अवधारण करेगी। (3) आयोग का अध्यक्ष (चेयरपर्सन) और उसके सदस्य आयोग के कृत्यों के अनन्यतः निर्वहन के लिए पूर्णकालिक रूप में नियुक्त किए जाएंगे और वे कोई अन्य पद धारण नहीं करेंगे या कोई अन्य कार्य हाथ में नहीं लेंगे। (4) केन्द्रीय अधिनियम की धारा 17 की उपधारा (1) के अधीन जारी की गई अधिसूचना क्रमांक 5726-एफ-3-20-तेरह/98 दिनांक 18-8-1998 द्वारा राज्य सरकार द्वारा गठित किया गया राज्य आयोग और इस अधिनियम के प्रारंभ होने की तारीख को अस्तित्व में आने वाला आयोग इस अधिनियम के प्रयोजन के लिये प्रथम आयोग होगा और उसके संबंध में यह समझा जाएगा कि उसका गठन नियुक्त किए गए अध्यक्ष (चेयरपर्सन) और सदस्यों की पदावधि की शेष कालावधि के लिये इस अधिनियम के अधीन किया गया है। (5) आयोग का मुख्यालय भोपाल, मध्यप्रदेश में होगा और यह अन्य स्थानों पर अपने कार्यालय स्थापित कर सकेगा। आयोग, अपनी कार्यवाहियां, परामर्श और सुनवाई, राज्य में अन्य स्थानों पर संचालित करने का हकदार होगा।
4. अध्यक्ष (चेयरपर्सन) और सदस्यों का चयन करने के लिए समिति का गठन
(1) राज्य सरकार, आयोग के सदस्यों के चयन व नियुक्ति के लिए एक चयन-समिति का गठन करेगी जो निम्नलिखित से मिलकर बनेगी:-(क) राज्य का मुख्य सचिव-अध्यक्ष; (ख) केन्द्रीय विद्युत् प्राधिकरण का अध्यक्ष या उसकी अनुपस्थिति में केन्द्रीय विद्युत् प्राधिकरण के अध्यक्ष द्वारा नामनिर्देशित एक सदस्य-सदस्य; (ग) कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का सं. 1) की धारा 4-ए की उपधारा (1) में यथा उपवर्णित किसी सार्वजनिक वित्तीय संस्था का प्रबंध संचालक या किसी विद्युत् उद्योग के कारबार में या किसी विद्युत् उद्योग की निधि संचालित करने या वित्त पोषण में संलग्न भारत सरकार के स्वामित्व या नियंत्रणाधीन किसी उपक्रम का प्रबंध संचालक-सदस्य। (2) राज्य सरकार, मृत्यु, पदत्याग या हटाए जाने के कारण हुई रिक्ति की तारीख से एक मास के भीतर और किसी सदस्य की पदाविधि या उसके कार्यकाल की समाप्ति के चार मास पूर्व उपधारा (1) में यथा विनिर्दिष्ट चयन-समिति गठित करेगी और रिक्तियों को भरने के लिए चयन-समिति को निर्देश देगी। (3) चयन-समिति, उस तारीख से जिसकी कि निर्देश दिया है, एक मास के भीतर सदस्य के चयन को अंतिम रूप देगी। (4) चयन-समिति, उसे निर्दिष्ट की गई प्रत्येक रिक्ति के लिए दो नाम के एक पैनल की सिफारिश करेगी। (5) राज्य सरकार, प्रत्येक रिक्ति के लिए चयन-समिति द्वारा सिफारिश किए गए दो नाम के पैनल में से सदस्यों की नियुक्ति करेगी और अपने विनिश्चय को ऐसी सिफारिश की प्राप्ति के एक मास के भीतर अधिसूचित करेगी।
5. आयोग के सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिये शर्तें
(1) आयोग के सदस्य योग्यता, ईमानदारी तथा प्रतिष्ठा वाले व्यक्ति होंगे, जिन्हें अभियांत्रिकी, अर्थशास्त्र, वाणिज्य, वित्त, विधि, प्रशासन या प्रबंधन का पर्याप्त ज्ञान और अनुभव हो, या जिन्होंने इस संबंध में संबंधित समस्याओं का निपटारा करने में क्षमता प्रदर्शित की हो तथा यह और कि आयोग सभी समयों पर निम्नलिखित व्यक्तियों से मिलकर बनेगा:--- (क) एक व्यक्ति जो विद्युत् के उत्पादन या पारेषण या उप-पारेषण या वितरण में विशेषज्ञता के साथ अभियांत्रिकी के क्षेत्र में अर्हता और पर्याप्त अनुभव रखता हो; और (ख) दो अन्य व्यक्ति जो किसी अन्य विषय अर्थात् अर्थशास्त्र, वाणिज्य, वित्त, विधि, प्रशासन या प्रबंधन में अर्हताएं और पर्याप्त अनुभव रखते हों: परन्तु एक से अधिक सदस्य को खण्ड (ख) में उल्लिखित किसी विशिष्ट विषय के अधीन नियुक्त नहीं किया जाएगा। (2) कोई भी व्यक्ति यदि वह संसद या किसी राज्य विधान मंडल का सदस्य है या किसी स्थानीय प्राधिकरण का अध्यक्ष (चेयरपर्सन) या सदस्य है तो वह आयोग के सदस्य के रूप में नियुक्त होने के लिए अनर्ह होगा। (3) वह व्यक्ति जिसके बारे में आयोग के सदस्य के रूप में नियुक्त किये जाने पर विचार किया जा रहा है, चयन-समिति को- (क) ऐसा कोई पद, नियोजन या परामर्शदाता करार या ठहराव जो वह अपने स्वयं के नाम से या किसी नातेदार के नाम से किसी ऐसी फर्म, व्यक्तियों का संगम या निगमित निकाय में रखता हो जो कि उनसे किसी के स्वामित्व की हो या उनमें से किसी के द्वारा अन्यथा नियंत्रित हो और जो निम्नलिखित में से कोई कारबार कर रहा है- (एक) विद्युत् का उत्पादन, पारेषण, उप-पारेषण, वितरण या प्रदाय; (दो) विद्युत् के उत्पादन के लिए किसी ईंधन का विनिर्माण, विक्रय या प्रदाय; (तीन) विद्युत् के उत्पादन, पारेषण, उप-पारेषण, वितरण, प्रदाय या उपयोग के लिए संव्यवहार करने वाली मशीनरी, संयंत्र, उपस्कर, साधित्र या फिटिंग्स का विनिर्माण, विक्रय, पट्टे पर देना, किराए पर देना या अन्यथा प्रदाय करना उनका कारबार करना; और (चार) उपरोक्त खण्ड (एक), (दो) और (तीन) में निर्दिष्ट किसी भी कारबार में वित्त प्रदाय करने वाली कोई सत्ता; अधिसूचित करेगा।
6. सदस्य की पदावधि, सेवा की शर्तें इत्यादि
(1) प्रत्येक सदस्य जिसमें अध्यक्ष (चेयरपर्सन) भी सम्मिलित है, उस तारीख से, जिसको वह अपना पद धारण करता है पांच वर्ष तक की अवधि के लिए या पैसठ वर्ष की आयु तक, इनमें से जो भी पूर्वतर हो, पद धारण करेगा और नियुक्ति की अवधि का अवसान होने के पश्चात् किसी भी समय अध्यक्ष (चेयरपर्सन) या सदस्य के रूप में पुनर्नियुक्ति का पात्र नहीं होगा : परन्तु किसी भी व्यक्ति को बासठ वर्ष की आयु पूर्ण कर लेने के पश्चात्, सदस्य के रूप में नियुक्त नहीं किया जाएगा। (2) अध्यक्ष (चेयरपर्सन) और अन्य सदस्य ऐसा पारिश्रमिक और अन्य भत्ते प्राप्त करेंगे और वे सेवा की ऐसी शर्तों द्वारा शासित होंगे जैसी कि नियमों द्वारा विहित की जाए : परन्तु अध्यक्ष (चेयरपर्सन) और सदस्य के लिए राज्य सरकार द्वारा, अवधारित किए गए वेतन और भत्ते किसी समय उस वेतन और भत्ते से निम्नतर नहीं होंगे जो सुसंगत समय पर राज्य सरकार के प्रमुख सचिव के पद को लागू हों : परन्तु यह और कि अध्यक्ष (चेयरपर्सन) और सदस्यों की नियुक्ति के पश्चात् एक बार विहित किए गए वेतन, भत्ते और सेवा की अन्य शर्तों में उनके अलाभप्रद रूप में कोई फेरफार नहीं किया जाएगा। (3) अध्यक्ष (चेयरपर्सन) और प्रत्येक अन्य सदस्य अपना पद ग्रहण करने के पूर्व ऐसे प्रारूप में, ऐसी रीति में तथा ऐसे प्राधिकारी के समक्ष पद और गोपनीयता की शपथ लेगा और हस्ताक्षर करेगा जो राज्य सरकार द्वारा विहित किया जाए। (4) अध्यक्ष (चेयरपर्सन) या कोई सदस्य, राज्य सरकार को कम से कम तीन मास की लिखित में सूचना देकर अपना पद त्याग सकेंगे।
11. आयोग की कार्यवाहियां
(१) इस अधिनियम के उपबंधों के अध्यधीन रहते हुए, आयोग को अपनी कार्यवाहियों के संचालन तथा अपने कृत्यों के निर्वहन के लिए विनियम बनाने की अन्य शक्ति होगी और इस प्रकार बनाए गए ऐसे समस्त विनियम राजपत्र में प्रकाशित किए जाएंगे। (२) उपधारा (५) में यथा उपबंधित के सिवाय, प्रत्येक सदस्य का एक मत होगा। आयोग के सदस्यों की राय में मतभेद होने के दशा में, बहुमत की राय अभिभावी होगी तथा आयोग की राय बहुमत के विचारों पर अभिव्यक्त की जाएगी। (३) आयोग के सम्मिलन के लिए गणपूर्ति दो सदस्यों की होगी, परन्तु आयोग द्वारा पूर्व में लिए गए किसी विनिश्चय के पुनर्विलोकन के लिए आयोग के सम्मिलन की गणपूर्ति उपधारा (५) के अध्यधीन रहते हुए उपस्थित समस्त सदस्यों से होगी। (४) जब आयोग का अध्यक्ष (चेयरपर्सन), अनुपस्थिति, बीमारी या किसी अन्य कारण से कृत्यों के निर्वहन में असमर्थ रहता है तब आयोग का वरिष्ठ सदस्य, अध्यक्ष (चेयरपर्सन) के कृत्यों का निर्वहन उस दिन तक करेगा जब तक कि अध्यक्ष (चेयरपर्सन) अपना पद का भार ग्रहण न कर ले। (५) अध्यक्ष (चेयरपर्सन) जिसमें आयोग का वरिष्ठ सदस्य भी सम्मिलित है, उस दशा में जहां वह अध्यक्ष के रूप में कार्य कर रहा हो, का द्वितीय या निर्णायक मत होगा : परन्तु जहां अध्यक्ष (चेयरपर्सन) या किसी सदस्य के पद में रिक्ति के कारण केवल दो सदस्य या अध्यक्ष (चेयरपर्सन) या किसी सदस्य को ऐसी निःशक्तता के कारण आयोग, तीस दिन से अधिक की कालावधि के लिये अवस्थित समस्त तीन सदस्यों से कार्यवाहियां नहीं कर सकता है वहां, अध्यक्ष (चेयरपर्सन) या यथास्थिति अध्यक्ष (चेयरपर्सन) के रूप में कार्य कर रहे वरिष्ठ सदस्य का मत केवल ऐसी रिक्ति या निःशक्तता की कालावधि के दौरान द्वितीय और निर्णायक होगा : परन्तु यह और कि प्रथम परंतुक में विनिर्दिष्ट ऐसी रिक्ति या निःशक्तता के दौरान, आयोग द्वारा पूर्व में किए गए किसी विनिश्चय के पुनर्विलोकन के लिए दो सदस्यों से गणपूर्ति होगी। (६) आयोग के अध्यक्ष (चेयरपर्सन) या सदस्य के पद में कोई रिक्ति या उसके गठन में कोई त्रुटि होने मात्र से ही आयोग का कोई कार्य या कार्यवाहियां अविधिमान्य नहीं होंगी। (७) आयोग का अध्यक्ष (चेयरपर्सन) सचिव को अनुदेश दे सकेगा कि वह आयोग का सम्मिलन ऐसे समय तथा ऐसे स्थान पर बुलाएं जैसा कि अध्यक्ष (चेयरपर्सन) निदेश दे तथा इसके अतिरिक्त आयोग का कोई सदस्य अन्य सदस्यों तथा सचिव को लिखित में सूचना देकर किसी भी समय आयोग का सम्मिलन बुलाने का अनुरोध कर सकेगा। (८) सदस्यों को समस्त सम्मिलनों की सूचना लिखित में दी जाएगी जब तक कि समस्त सदस्य लिखित में सूचना का अभित्यजन न कर दें। (९) आयोग को परिपालन द्वारा अति-आवश्यक मामलों का विनिश्चय करने का हक होगा। (१०) आयोग के समस्त विनिश्चय, निदेश तथा आदेश लिखित में होंगे और उनके समर्थन में कारण दिए जाएंगे। जिसमें भिन्न राय रखने वाले सदस्य भी सम्मिलित, आयोग के विनिश्चय, निदेश तथा आदेश आयोग द्वारा अन्यथा विनिर्दिष्ट के सिवाय, किसी भी व्यक्ति द्वारा निरीक्षण के लिए उपलब्ध होंगे और उनकी प्रतियां, उस रीति में जो आयोग विहित करे उपलब्ध की जाएंगी। (११) आयोग की कार्यवाहियां, जब तक आयोग द्वारा साधारण या विशेष आदेश द्वारा अन्यथा विनिर्दिष्ट न हो, जनता के लिए खुली रहेंगी।
12. राज्य सरकार की सामान्य शक्ति
(१) राज्य सरकार को राज्य में विद्युत् संबंधी विषयों पर, उन उपायों को सम्मिलित करते हुए जो राज्य सरकार राज्य में विद्युत् उद्योग के विकास के लिए राज्य योजना तथा समन्वय के लिए आवश्यक समझे, नीति निर्देश जारी करने की शक्ति होगी। (२) उपधारा (१) के अधीन नीति निर्देश लिखित में होंगे तथा इस अधिनियम द्वारा प्राप्त किए जाने हेतु चाहे गए उद्देश्यों से संगत होंगे, और वे आयोग के उन कृत्यों तथा शक्तियों पर प्रतिकूल रूप से प्रभाव नहीं डालेंगे या उनमें हस्ताक्षेप नहीं करेंगे, जिनमें इस अधिनियम के अधीन आयोग में निहित अनुज्ञापन तथा टैरिफ का अवधारण करने की शक्ति भी सम्मिलित है किन्तु यह यहां तक सीमित नहीं है। (३) राज्य सरकार विद्युत् उद्योग को प्रभावित करने वाले किसी भी नीति निर्देश, जो वह जारी करती है या कोई विधान जो अधिनियमित किया जाना प्रस्तावित है, के संबंध में आयोग से परामर्श करेगी तथा वह उन सिफारिशों पर यदि कोई आयोग द्वारा दी गई हो, ऐसे समय के भीतर जो राज्य सरकार विनिर्दिष्ट करे, सम्यक् रूप से विचार में लेगी।
13. राज्य सरकार और आयोग के बीच विवाद का माध्यस्थम्
(१) यदि धारा १२ में विनिर्दिष्ट विषयों पर राज्य सरकार और आयोग के बीच कोई विवाद या मतभेद होता है तो उसको विनिश्चय के लिए केन्द्रीय आयोग को निर्दिष्ट किया जाएगा। (२) ऐसा निर्देश किए जाने पर, नियुक्त किया गया व्यक्ति यथासंभव १० दिन के भीतर निर्देश का विनिश्चय करेगा तथा उस विषय पर उसका विनिश्चय अंतिम तथा आबद्धकर होगा।
14. अनुज्ञापन
(१) कोई व्यक्ति जो ऐसा करने के लिए अनुज्ञप्ति द्वारा या इस अधिनियम के अधीन छूट के कारण प्राधिकृत है या जो भारतीय विद्युत् अधिनियम, १९१० (१९१० का सं. ९) या विद्युत् (प्रदाय) अधिनियम, १९४८ (१९४८ सं. ५४) के अधीन प्राधिकृत किया गया है या जिसे छूट दी गई है, से भिन्न कोई भी व्यक्ति राज्य में, - (क) विद्युत् पारेषण; या (ख) विद्युत् प्रदाय, जिसमें वृहद रूप (बल्क) में प्रदाय उप-पारेषण या वितरण सम्मिलित है, का कारोबार नहीं करेगा : परन्तु समस्त व्यक्ति जो भारतीय विद्युत् अधिनियम, १९१० (१९१० का सं. ९) या विद्युत् (प्रदाय) अधिनियम, १९४८ (१९४८ का सं. ५४) के अधीन प्राधिकृत हो या छूट दी गई है, के संबंध में यह समझा जाएगा कि वे उन निबंधनों तथा शर्तों पर जिन पर उसे पहले ही अनुज्ञप्ति या छूट दी जा चुकी है, इस अधिनियम के अधीन अनुज्ञप्तिधारी हैं, और किसी अनुज्ञप्तिधारी को लागू इस अधिनियम के उपबंध यथा आवश्यक परिवर्तनों सहित ऐसे व्यक्ति पर लागू होंगे। (२) जहां कोई प्रश्न उद्भूत होता है कि क्या कोई व्यक्ति, उपधारा (१) में यथावर्णित विद्युत् पारेषण या प्रदाय करने के कारोबार में लगा है या नहीं लगा है, ऐसे प्रश्न पर आयोग का विनिश्चय अंतिम तथा आबद्धकारी होगा। (३) आयोग को किसी ऐसे व्यक्ति जिसे अनुज्ञप्ति नहीं दी गई है या अन्यथा प्राधिकृत नहीं किया गया है, को यह आदेशित करने की शक्ति होगी कि वह राज्य में विद्युत् पारेषण, उप-पारेषण, वितरण या प्रदाय करना बंद कर दे तथा उनसे संबंधित अपने साधित्र को विच्छेदित कर दे। (४) इस अधिनियम में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी और अधिनियम के प्रारंभ होने से छह मास की कालावधि के दौरान, राज्य सरकार को राज्य में विद्युत् पारेषण या प्रदाय करने के कारोबार के लिए किसी व्यक्ति या व्यक्तियों को बारह मास से अनधिक की अवधि तक ऐसे निबंधन तथा शर्तों पर जो राज्य सरकार इस अधिनियम के उपबंधों से संगत अवधारित करे निम्नलिखित शर्तों के अध्यधीन रहते हुए अंतिम अनुज्ञप्ति प्रदान करने की शक्ति होगी, - (क) राज्य सरकार द्वारा प्रदान की गई प्रत्येक अनंतिम अनुज्ञप्ति तत्काल आयोग के समक्ष रखी जाएगी और उसे इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन आयोग द्वारा अनुज्ञप्ति प्रदान किए जाने के लिए किया गया आवेदन समझा जाएगा; और (ख) इस धारा के अधीन प्रदान की गई प्रत्येक अनंतिम अनुज्ञप्ति उस तारीख से विधिमान्य नहीं रहेगी जो आयोग उपरोक्त खण्ड (क) में वर्णित अनुज्ञप्ति के लिए आवेदन पर अपने आदेश में विनिर्दिष्ट करे।
15. आयोग द्वारा अनुज्ञप्ति प्रदान किया जाना.
(१) आयोग, विहित प्ररूप में आवेदन किया जाने तथा ऐसी फीस का संदाय करने पर, जो कि आयोग विहित करे, किसी व्यक्ति को,-- (क) पारेषण के किसी विनिर्दिष्ट क्षेत्र में विद्युत् पारेषण करने के लिए; या (ख) विद्युत् या विद्युत् प्रदाय वृहद् रूप (बल्क) में किसी विनिर्दिष्ट क्षेत्र में विद्युत् प्रदाय करने के लिए किसी अन्य अनुज्ञप्तिधारी या व्यक्ति को उसका (विद्युत् का) उप-पारेषण या वितरण या प्रदाय करने हेतु प्राधिकृत करते हुए अनुज्ञप्ति प्रदान कर सकेगा. (२) ऐसी किसी भी अनुज्ञप्ति को प्रदान करने के संबंध में निम्नलिखित उपबंध लागू होंगे,-- (क) अनुज्ञप्ति के लिए आवेदन करने वाला कोई ऐसा व्यक्ति आवेदन करने के पश्चात् १४ दिन के भीतर ऐसी रीति में तथा ऐसी विशिष्टियों सहित जो कि आयोग द्वारा विहित की जाएं, आवेदन की सूचना का प्रकाशन करेगा; (ख) आयोग तब तक अनुज्ञप्ति प्रदान नहीं करेगा जब तक कि-- (एक) अनुज्ञप्ति के लिए आवेदन से संबंधित प्राप्त समस्त आक्षेपों पर आयोग द्वारा विचार न कर लिया गया हो : परंतु किसी भी आक्षेप पर आयोग तब तक विचार नहीं कर सकेगा जब तक कि वह खण्ड (क) के अधीन सूचना के प्रथम प्रकाशन की तारीख से ऐसे समय के भीतर जो आयोग द्वारा विहित किए जाएं, जो कि ३० दिन से कम का नहीं होगा, प्राप्त नहीं हो जाए; और (दो) किसी ऐसे क्षेत्र में, जिसमें किसी छावनी, हवाई अड्डे, दुर्ग, आयुधशाला या कैम्प या रक्षा प्रयोजनों के लिए केन्द्र सरकार के अधिभोग में के किसी भवन या स्थान का संपूर्ण या कोई भाग सम्मिलित है, प्रदाय या पारेषण की अनुज्ञप्ति के लिए किसी आवेदन-पत्र के मामले में आयोग ने यह अभिनिश्चित न कर लिया हो कि वहां केन्द्र सरकार की ओर से अनुज्ञप्ति दिए जाने में कोई आपत्ति नहीं है. (३) भारतीय विद्युत् अधिनियम, १९१० (१९१० का सं. ९) की धारा ५२ या विद्युत् (प्रदाय) अधिनियम, १९४८ (१९४८ का सं. ५४) की धारा ३ की उपधारा (१) के खण्ड (दो) तथा धारा ७६ में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी इस अधिनियम के अधीन समस्त अनुज्ञप्तियों को प्रदान किए जाने की यह शर्त होगी कि आयोग को इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार विवादों का न्यायनिर्णयन करने या उन्हें तय करने के लिए मध्यस्थ के रूप में कार्य करने या मध्यस्थ को नामनिर्दिष्ट करने की शक्ति होगी. (४) (क)अनुज्ञप्ति में ऐसी अवधि सीमा जिस तक और ऐसे निबंधन तथा शर्तें जिनके अधीन विद्युत् का पारेषण या प्रदाय किया जाना हो, अंतर्विष्ट होंगी और उसमें ऐसी अन्य शर्तें भी अंतर्विष्ट होंगी जिन्हें आयोग इस अधिनियम के प्रयोजनों को प्राप्त करने के लिए समुचित समझे. (ख) खण्ड (क) के उपबंधों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, अनुज्ञप्तिधारी से यह अपेक्षित होगा कि वह-- (एक) अपने (अनुज्ञप्तिधारी) द्वारा संचालित विद्युत् लाइनें, विद्युत् संयंत्र और सह उपस्कर के उपयोग के लिए किसी अन्य व्यक्ति से विनिर्दिष्ट निबंधनों पर करार करें; (दो) ऐसी जानकारी तथा दस्तावेजें जिनका आयोग अपने प्रयोजन के लिए या केन्द्रीय या राज्य सरकार या केन्द्रीय आयोग या केन्द्रीय विद्युत् प्राधिकारी के प्रयोजनों के लिए अपेक्षा करें, उपलब्ध कराए; (तीन) भारतीय विद्युत् अधिनियम, १९१० (१९१० का सं. ९) तथा विद्युत् (प्रदाय) अधिनियम, १९४८ (१९४८ का सं. ४) के अधीन बोर्ड के ऐसे कृत्यों और बाध्यताओं का, जैसा आयोग विनिर्दिष्ट करे, जिम्मा ले; (चार) ऐसी बातों पर जो अनुज्ञप्ति की शर्तों के अधीन या अपेक्षित हैं या उनसे विचलन के लिए अपेक्षित हैं, आयोग का अनुमोदन अभिप्राप्त करे; (पांच) कोई स्कीम जिसे अनुज्ञप्तिधारी लेना प्रस्तावित कर रहा है, जिसमें इस अधिनियम के उपबंधों और विद्युत् (प्रदाय) अधिनियम, १९४८ (१९४८ का सं. ५४) के लागू उपबंधों के अनुसार स्कीम भी सम्मिलित है, आयोग को अधिसूचित करे; (छह) मितव्ययी रीति में विद्युत् का क्रय करे जिसमें विद्युत् शक्ति की न्यूनतम लागत क्षमता के सिद्धांत का विचार और दर्शायी विद्युत् (शक्ति) क्रय उपशमन प्रक्रिया सम्मिलित है; (सात) विद्युत् प्रदाय के लिये मीटर लगाने के प्लाँइट्स तथा विद्युत् के पारेषण तथा प्रदाय में होने वाले नुकसान को कम करने के उपायों के लिये स्कीम प्रस्तुत करे; (आठ) अन्य अनुज्ञप्तिधारियों या उपभोक्ताओं को विद्युत् वृहद् रूप (बल्क) में प्रदाय करे; (नौ) आयोग द्वारा दिए गए निदेशों का अनुपालन करे; (दस) अनुज्ञप्ति के निबंधन के अनुरूप कार्य करें; (ग्यारह) इस अधिनियम, विनियमों, भारतीय विद्युत् अधिनियम, १९१० (१९१० का सं. ९) तथा विद्युत् (प्रदाय) अधिनियम, १९४८ (१९४८ का सं. ५४) या उनके अधीन विरचित नियमों की अपेक्षाओं जहां तक वे लागू हों, का अनुपालन करे. (५) उपधारा (४) में अंतर्विष्ट उपबंधों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, आयोग द्वारा प्रदान की गई अनुज्ञप्ति में सम्मिलित शर्तों के अधीन अनुज्ञप्तिधारी से अपेक्षा की जा सकेगी कि वह टैरिफ स्थापित करे और समय-समय पर इस अधिनियम के उपबंधों से संगत अपने प्रभारों की गणना करे. (६) भारतीय विद्युत् अधिनियम, १९१० (१९१० का सं. ९) की अनुसूची में अंतर्विष्ट उपबंध सिवाय जहां तक कि अनुज्ञप्ति द्वारा उसे अभिव्यक्त रूप से परिवर्तित किया हो या उनमें छूट दी गई हो इस भाग के अधीन दी गई प्रत्येक प्रदाय अनुज्ञप्ति के साथ सम्मिलित समझे जाएंगे और उसके भाग बन जाएंगे और इस अधिनियम के प्रयोजनों की पहुंच में रहते हुए ऐसे परिवर्तन या अपवाद के अधीन रहते हुए, जिन्हें आयोग कर सकता है, राज्य में अपने क्रियाकलापों के संबंध में अनुज्ञप्ति द्वारा प्राधिकृत उपक्रम पर लागू होंगे : परंतु जहां आयोग द्वारा अन्य अनुज्ञप्तिधारियों को उनके द्वारा वितरण के लिए विद्युत् का प्रदाय करने के लिये प्रदाय अनुज्ञप्ति दी गई हो, जहां उक्त अनुसूची के खण्ड चार, पांच, छह, सात, आठ तथा बारह के उपबंध, जहां तक ऐसी अनुज्ञप्ति का ऐसे प्रदाय से संबंध हो, प्रदाय अनुज्ञप्ति में सम्मिलित किए गए नहीं समझे जाएंगे. (७) किसी अनुज्ञप्ति में सम्मिलित शर्तों में किसी शर्त के असंगत पर, ऐसी रीति में और ऐसी परिस्थितियों में जैसी कि उसमें विनिर्दिष्ट की जाएं या शर्तें द्वारा या उनके अधीन अवधारित की जाएं, प्रभावहीन हो जाने या उसे उपार्जित किए जाने की शर्तें द्वारा उपवााप्त किया जा सकेगा. (८) किसी अनुज्ञप्ति में उपधारा (७) के आधार पर सम्मिलित कोई उपबंध इस अधिनियम की धारा १७ तथा धारा १८ की उपधारा (५) के द्वारा किए गए उपबंधों के अतिरिक्त प्रभावी होंगे. (९) जब तक किसी अनुज्ञप्ति के निबंधनों में विनिर्दिष्ट रूप से अन्यथा उपबंधित न हो तब तक किसी व्यक्ति को अनुज्ञप्ति का दिया जाना प्रदाय के उसी क्षेत्र के भीतर किसी अन्य व्यक्ति को समान प्रयोजन के लिए अनुज्ञप्ति प्रदान करने में बाधक नहीं होगा और अनुज्ञप्तिधारी किसी अनन्यता का दावा नहीं करेगा. (१०) इस अधिनियम के अनुसार आयोग द्वारा दी गई अनुज्ञप्ति में यह उपबंध हो सकेगा कि अनुज्ञप्तिधारी को, विद्युत् प्रदाय के मीटरिंग पाइंट, राजस्व वसूली, विद्युत् के असंयोजन, चोरी के लिये अभियोजन, मीटर बिगाड़ने, विद्युत् के अपयोजन और विद्युत् के पारेषण, उप पारेषण, वितरण या प्रदाय को प्रभावित करने वाले समस्त और उसी प्रकार के विषयों पर आयोग जैसा कि विहित करे कार्रवाई करने की शक्ति तथा प्राधिकार होगा. (११) आयोग, अनुज्ञप्तिधारियों तथा अन्य व्यक्तियों को ऐसी शक्ति और प्राधिकार का प्रयोग करने के लिये प्राधिकृत करने का हकदार होगा जो कि उन्हें भारतीय विद्युत् अधिनियम, १९१० (१९१० का सं. ९) तथा विद्युत् (प्रदाय) अधिनियम, १९४८ (१९४८ का सं. ५४) के उपबंधों के अधीन दी जा सकती है/दिया जा सकता है.
16. अनुज्ञप्ति रखने की आवश्यकता से छूट.
(१) आयोग अनुज्ञप्ति रखने की आवश्यकता से छूट प्रदान करने के लिये किन-एसी शर्तों, यदि कोई हों, जैसा कि आयोग द्वारा विनिर्दिष्ट की जाएं, के अनुपालन के अध्यधीन रहते हुए विनियम बना सकेगा : परंतु जहां आयोग छूट देने के आदेश के अधीन या विनियमों के अधीन विनिर्दिष्ट रूप से अन्यथा उपबंधित करने के सिवाय, छूट प्राप्त व्यक्ति से यह अपेक्षा की जाएगी कि वह उन सभी अपेक्षाओं का अनुपालन करे जिनका अनुपालन करना किसी अनुज्ञप्तिधारी से अनुज्ञप्ति के अधीन या इस अधिनियम या विनियमों के उपबंधों के अधीन अपेक्षित है. (२) आयोग ऐसे किसी भी विनियम के अधीन निम्नलिखित को सहमति के सिवाय छूट प्रदान नहीं करेगा:-- (एक) उस क्षेत्र में गठित स्थानीय प्राधिकरण, यदि कोई हो, की जहां विद्युत् प्रदाय की जानी हो; (दो) किसी ऐसे मामले में, जहां किसी क्षेत्र में विद्युत् प्रदाय किया जाना हो वह किसी छावनी, हवाई अड्डा, दुर्ग, आयुधशाला या कैम्प का भाग हो या ऐसे किसी भवन या स्थान का भाग हो जो रक्षा प्रयोजनों के लिये केन्द्रीय सरकार के अधिभोग में हो, वहां केन्द्रीय सरकार की; (तीन) पारेषण या प्रदाय के क्षेत्र के भीतर आने वाली किसी क्षेत्र में ऐसे क्षेत्र के अनुज्ञप्तिधारी की: परंतु यह और कि उपखंड (दो) के अधीन आने वाले किसी मामले के सिवाय, यदि आयोग का यह समाधान हो जाता है कि सहमति अनुचित रूप से रोकी गई है तो ऐसी सहमति आवश्यक नहीं होगी. (३) (क) किसी विशिष्ट प्रकार के व्यक्ति को; या (ख) किसी विशिष्ट व्यक्ति को; या (ग) किसी विशिष्ट कालावधि के लिए, छूट दी जा सकेगी. (४) प्रदान की गई कोई छूट, ऐसी रीति में प्रकाशित की जाएगी जैसी कि आयोग को समुचित लगे. (५) आयोग प्रदान की गई छूट को ऐसे कारणों सहित जो लिखित में लेखबद्ध किए जाएंगे, किसी भी समय प्रतिसंहृत कर सकेगा. (६) कोई छूट जब तक कि उसे पूर्व में प्रतिसंहृत न किया गया हो तब तक वह उस कालावधि के लिये जैसा कि छूट प्रदान करने के आदेश द्वारा या के अधीन विनिर्दिष्ट किया जाए या अवधारित किया जाए, प्रवृत्त बनी रहेगी.
17. अनुज्ञप्ति की शर्तों का संशोधन.
(१) आयोग, अनुज्ञप्तिधारी द्वारा आवेदन पर या यदि अनुज्ञप्तिधारी स्थानीय प्राधिकारी नहीं हो तो संबंधित स्थानीय प्राधिकारी के आवेदन पर या अन्यथा इस अधिनियम के उद्देश्यों और प्रयोजनों को ध्यान में रखते हुए किसी अनुज्ञप्ति के निबंधन तथा शर्तों में जो वह उचित समझे, ऐसे परिवर्तन या संशोधन इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार कर सकेगा जो उसकी राय में लोकहित में ऐसा करने की अनुज्ञा देते हों या अपेक्षा करते हों : परंतु धारा १५ की उपधारा (७) या धारा १८ की उपधारा (५) में निर्दिष्ट अनुज्ञप्ति की शर्तों के अनुसरण में किए गए परिवर्तन या संशोधन से भिन्न कोई ऐसा परिवर्तन या संशोधन अनुज्ञप्तिधारी की सहमति के बिना नहीं किया जाएगा. (२) जहां अनुज्ञप्तिधारी ने अपनी अनुज्ञप्ति की शर्तों में कोई परिवर्तन या संशोधन प्रस्तावित करते हुए उपधारा (१) के अधीन कोई आवेदन किया हो तो वहां निम्नलिखित उपबंध लागू होंगे:-- (क) अनुज्ञप्तिधारी, आवेदन की एक सूचना, ऐसी रीति में और ऐसी विशिष्टियों के साथ जैसे कि आयोग द्वारा विहित किए जाएं प्रकाशित करेगा; (ख) आयोग तब तक कोई परिवर्तन या संशोधन नहीं करेगा जब तक कि सूचना के प्रथम प्रकाशन की तारीख से कम से कम तीस दिन के ऐसे समय के भीतर, जैसा आयोग विनिर्दिष्ट करे, आवेदन के संदर्भ में प्राप्त आपत्तियों पर विचार न कर लिया गया हो; और (ग) प्रदाय के किसी ऐसे क्षेत्र में जिसमें छावनी, हवाई अड्डा, दुर्ग, आयुधशाला या कैम्प या कोई ऐसा भवन या स्थान समाविष्ट है या उसमें उसका कोई भाग पूर्णतः या अंशतः रक्षा प्रयोजनों के लिये केन्द्रीय सरकार के अधिभोग में हो, प्रदाय की गई अनुज्ञप्ति की शर्तों को प्रस्तावित करने वाले किसी भी परिवर्तन या संशोधन के आवेदन की दशा में, आयोग, केन्द्रीय सरकार की सहमति के बिना, किसी प्रकार का कोई परिवर्तन या संशोधन नहीं करेगा. (३) अनुज्ञप्तिधारी के आवेदन के बिना, अनुज्ञप्ति की किसी शर्त में कोई परिवर्तन या संशोधन करने से पूर्व, आयोग प्रस्तावित परिवर्तनों या संशोधनों को प्रकाशित करेगा और प्रस्तावित परिवर्तन या संशोधन के संदर्भ में उसके द्वारा प्राप्त सभी आपत्तियों पर ऐसे समय के भीतर, जैसा आयोग विनिर्दिष्ट करे, जो कि ३० दिन से कम का नहीं होगा, विचार करेगा.
18. अनुज्ञप्ति का प्रतिसंहरण.
(१) आयोग, इस अधिनियम या इसके अधीन विरचित विनियमों में अनुज्ञप्ति के निबंधनों तथा शर्तों के अधीन बाध्यताओं को निभाने में किसी अनुज्ञप्तिधारी के आचरण या कृत्य की जांच, - (क) किसी उपभोक्ता या उपभोक्ता संगम या किसी व्यापारिक संगम से किसी शिकायत के प्राप्त होने पर; या
20. अनुज्ञप्तिधारक तथा उत्पादक कंपनियों के साधारण कर्तव्य तथा शक्तियां
(1) किसी अनुज्ञप्ति के धारक का यह कर्तव्य होगा कि वह यथास्थिति पारेषण के क्षेत्र या विद्युत् प्रदाय या विद्युत् के वृहदरूप (बल्क) में प्रदाय के क्षेत्र में, जिसके लिए अनुज्ञप्ति प्रदान की गई है, विद्युत् पारेषण, उप-पारेषण, वितरण या प्रदाय की एक दक्षतापूर्ण, समन्वय, तथा मितव्ययी प्रणाली का निकास करे तथा उसको बनाए रखना। (2) प्रत्येक अनुज्ञप्तिधारी तथा प्रत्येक उत्पादक कम्पनी, ऊर्जा प्रणाली तथा विद्युत् प्रदाय की लाइनों के प्रचलन तथा अनुरक्षण के संबंध में समय-समय पर विहित विनियमों के उपबंधों का पालन करेगी। (3) आयोग, नियमन, अनाद तथा शर्तें यदि कोई हों, के अध्यधीन रहते हुए, भारतीय विद्युत् अधिनियम, १९१० (१९१० का सं. ९) की धारा १२ से १९ तक विनिर्दिष्ट कर सकेगा जिसका संबंध कार्य करने से है, इस अधिनियम के अधीन किसी अनुज्ञप्ति द्वारा विद्युत् का पारेषण या प्रदाय करने के लिए प्राधिकृत किसी व्यक्ति के संबंध में इस प्रकार प्रभावी होंगे मानो कि वह व्यक्ति उक्त अधिनियम में एक अनुज्ञप्तिधारी है।
21. अनुज्ञप्तिधारियों तथा उत्पादक कंपनियों पर निबंधन
(1) कोई भी अनुज्ञप्तिधारी या उत्पादक कम्पनी किसी भी जगह जहां तक विद्युत् के उत्पादन, पारेषण, उप-पारेषण, वितरण या प्रदाय का काम का संबंध है, आयोग की लिखित पूर्व सहमति के बिना, किसी भी अन्य ऐसे अनुज्ञप्तिधारी या व्यक्ति की अनुज्ञप्ति या उपक्रम को जो विद्युत् का उत्पादन, पारेषण, प्रदाय कर रहा है या उत्पादन, पारेषण, उप-पारेषण या विद्युत् प्रदाय करने का आशय रखता हो, क्रय द्वारा या अन्यथा अर्जित नहीं करेगा या उसके साथ सहयुवत नहीं होगा : परन्तु ऐसी सहमति के लिए आवेदन करने से पूर्व अनुज्ञप्तिधारी अपने आवेदन की- (क) आयोग को; और (ख) यदि अनुज्ञप्तिधारी प्रदाय अनुज्ञप्ति धारण करता है, अनुज्ञप्तिधारी के प्रदाय के क्षेत्र में प्रत्येक स्थानीय प्राधिकरण को तथा उस क्षेत्र में भी, यदि कोई हो, जिसमें ऐसा अन्य व्यक्ति विद्युत् प्रदाय करता है या विद्युत् प्रदाय करने का आशय रखता है, के स्थानीय प्राधिकरण को, कम से कम एक मास की सूचना देगा। स्पष्टीकरण.- इस धारा के प्रयोजन के लिए कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति के साथ सहयुवत समझा जाएगा यदि वह किसी के स्वामित्व, प्रबंधन के कारण या किसी अन्य रीति से जुड़ा हुआ हो और अन्य व्यक्ति के साथ संयुक्त कारवार का हित रखता हो। (2) अनुज्ञप्तिधारी किसी भी समय, आयोग की लिखित पूर्व सहमति के बिना विक्रय, बन्धक, पट्टा, विनिमय द्वारा या अन्यथा अपनी अनुज्ञप्ति को समनुदेशित नहीं करेगा या अपने उपक्रम या उसके किसी भाग का अंतरण नहीं करेगा। (3) इस अधिनियम के प्रवृत्त होने के पश्चात् विद्युत् (प्रदाय) अधिनियम, १९४८ (१९४८ का सं. ५४) की धारा ४४ के उपबंध राज्य में निम्नलिखित संशोधनों सहित लागू होंगे :- (क) उक्त धारा में अपेक्षित सहमति, उक्त धारा के अधीन यथाउपबंधि मंडल से अभिप्राप्त की जाने वाली ऐसी सहमति के स्थान पर वह आयोग से ली जाएगी; (ख) उक्त धारा ४४ की उपधारा (१) के परंतु के खण्ड (क), (ख) तथा (ग) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, आयोग को यह अधिकार होगा कि वह सहमति देने से इंकार कर दे, यदि आयोग की यह राय हो कि सहमति देने से राज्य में ऊर्जा प्रणाली के दक्षतापूर्ण रीति से प्रचलन में या विद्युत् उद्योग के निकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा या अन्यथा लोकहित पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा; और (ग) उक्त धारा ४४ की उपधारा (३) के उपबंध राज्य में लागू नहीं होंगे। (4) किसी प्रदाय अनुज्ञप्ति का धारक, जब तक कि उसकी अनुज्ञप्ति के निबंधनों द्वारा या आयोग द्वारा पारित किसी सामान्य या विशेष आदेश द्वारा अभिव्यक्त रूप से प्रतिषिद्ध न हो, निम्नलिखित से विद्युत् का क्रय करने के लिए इंतजाम कर सकेगा :- (क) किसी प्रदाय अनुज्ञप्ति के धारक से जो ऐसी अनुज्ञप्ति के धारक को, अन्य अनुज्ञप्तिधारियों को उनके द्वारा वितरण के लिए विद्युत् प्रदाय करने की अनुज्ञा देता है; और (ख) ऊर्जा क्रय उपापन प्रक्रिया को शासित करने वाले आयोग द्वारा विहित विनियमों के अनुसार किसी भी विद्युत् उत्पादक कम्पनी से या अन्य विद्युत् प्रदायकों से। (5) यदि उपधारा (१), (२), (३) या (४) में वर्णित प्रकृति के किसी भी संव्यवहार से संबंधित कोई करार, जब तक वह उक्त उपबंधों में अंतर्विष्ट उपबंध के अनुसार उनके अध्यधीन नहीं किया जाता है, तो वह शून्य होगा।
22. अनुज्ञप्तिधारियों के वार्षिक लेखा
प्रत्येक अनुज्ञप्तिधारी, जब तक कि उसे आयोग द्वारा अभिव्यक्त रूप से छूट प्राप्त न हो, अपने उपक्रम की और ऐसी तारीख को बनाई गई प्रत्येक ऐसी गुणक कारवार की इकाई के लेखा का एक वार्षिक विवरण या विवरणियां, ऐसे प्रारूप में और ऐसी विशिष्टियां अंतर्विष्ट करते हुए और संपरीक्षित या सत्यापित करके, जैसा आयोग निद्देशित करे, आयोग द्वारा विनिर्दिष्ट की जाने वाली तारीख के पूर्व तैयार करेगा और आयोग को प्रस्तुत करेगा और उसके ऐसे विवरण या उद्धरण आयोग द्वारा विनिर्दिष्ट की गई रीति में प्रकाशित किए जाएंगे।
23. मध्यपदेश विद्युत् मंडल की संपत्तियों, कृत्यों और कर्तव्यों का पुनर्गठन
(1) राज्य सरकार, अंतरण स्कीम के लिए मंडल को पुनर्गठित करने और मंडल या उसके ऐसे भाग के जो कि उसकी आस्तियां, संपत्तियां, संपत्तियों में हित, कार्यवाहियों और दायित्वों से मिलकर बना हो, कृत्यों, कर्तव्यों, शक्तियों तथा बाध्यताओं के अंतरण को उन निबंधनों तथा शर्तों पर जो कि राज्य सरकार अंतरण स्कीम में उपबंधित करे, प्रभावी करने के हेतु समय-समय पर नियम विरचित कर सकेगी। (2) जिस तारीख को तथा से उपधारा (१) के अधीन अंतरण स्कीम प्रकाशित की जाती है या उस तारीख को और से ऐसी अन्य तारीख से (जो इसमें इसके पश्चात् प्रभावी तारीख के नाम से निर्दिष्ट है) जैसी कि ऐसी अंतरण स्कीम में विनिर्दिष्ट की जाए, राज्य सरकार यह उपबंध कर सकेगी कि आस्तियों, संपत्तियों, संपत्तियों में हित, कार्यवाहियों, दायित्वों, अधिकारों और बाध्यताओं से मिलकर बनने वाले मंडल के ऐसे उपक्रम या उसके ऐसे भाग जो प्रभावी तारीख के अव्यहित पूर्व मंडल के हैं, अंतरण स्कीम में विनिर्दिष्ट निबंधनों तथा शर्तों पर, बोर्ड या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा किए जाने वाले किसी और कृत्य, विलेख या बात के बिना, राज्य सरकार को अंतरित हो जाएंगे और उसमें निहित हो जाएंगे। (3) राज्य सरकार, समय-समय पर, अंतरण स्कीम के लिए, उन उपक्रमों के अंतरण को प्रभावशील करने के लिए जो कि उपधारा (२) के अधीन राज्य में निहित है, ऐसी कंपनियों या व्यक्ति या प्राधिकारी (जिसे इसमें इसके पश्चात् "अंतरिती" कहा गया है) को, ऐसे निबंधत तथा शर्तों पर जैसा कि राज्य सरकार अंतरण स्कीम में उपबंधित करे, का उपबंध करने हेतु नियम विरचित कर सकेगी और ऐसा अंतरण तथा अंतरिती में ऐसा निहित किया जाना किसी व्यक्ति द्वारा किए जाने वाले किसी और कृत्य, विलेख या बात के बिना अंतरण स्कीम में विनिर्दिष्ट तारीख से प्रभावी होगा। (4) राज्य सरकार, ऐसे अंतरिती से (जो इसमें इसके पश्चात् प्रथम अंतरिती के नाम से निर्दिष्ट है) परामर्श करने के पश्चात् जिसे कि पूर्वगामी उपबंधों के अनुसार यथास्थिति कृत्य, कर्तव्य, अधिकार, शक्तियां या उपक्रम अंतरित किए गए हैं और उसमें निहित हो गए हैं, किसी अन्य कंपनी या निगमित निकाय या व्यक्ति या प्राधिकारी को (जो कि राज्य सरकार विनिर्दिष्ट करे, प्रथम अंतरिती से द्वितीय अंतरिती के नाम से निर्दिष्ट है) उपक्रमों का ऐसा भाग ऐसे निबंधनों तथा शर्तों पर, जैसा कि राज्य सरकार विनिर्दिष्ट करे, प्रथम अंतरिती से द्वितीय अंतरिती को अंतरित करने के लिए नियम विरचित कर सकेगी और ऐसा अंतरण किसी व्यक्ति द्वारा किए जाने वाले किसी और कृत्य, विलेख या बात के बिना अंतरण स्कीम में विनिर्दिष्ट तारीख से प्रभावी होगा। (5) राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा, यह उपबंध कर सकेगी कि भारतीय विद्युत् अधिनियम, १९१० (१९१० का सं. ९) या विद्युत् (प्रदाय) अधिनियम, १९४८ (१९४८ का सं. ५४) या उसके अधीन मंडल द्वारा प्रयोक्तव्य ऐसे कृत्य, कर्तव्य, शक्तियां और बाध्यताएं, ऐसे प्रथम अंतरिती या द्वितीय अंतरिती या अन्य कंपनियों या निगमित निकायों या व्यक्ति या प्राधिकारी द्वारा प्रयोनय होंगे जैसा कि राज्य सरकार विनिर्दिष्ट करे। (6) इस धारा में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, जहां इस भाग के अधीन अंतरण स्कीम के अनुसरण में किसी भी प्रकार का संव्यवहार किया जाता है, वहां वह समस्त व्यक्तियों पर जिसमें तृतीय पक्षकार भी सम्मिलित है, आबद्धकर होगा। (7) अंतरण स्कीम में :- (क) अंतरित की जाने वाली संपत्ति, संपत्ति में हित, अधिकार और दायित्व को; (एक) प्रश्नगत सम्पत्ति, अधिकार और दायित्वों को विनिर्दिष्ट या वर्णित करते हुए;
24. Provisions relating to personnel
(1) The State Government may provide for the transfer of the personnel of the Board to the First Transferee or the Second Transferee, as the case may be, in the event of the transfer of any part of the undertaking of the Board transferred under Section 23 and such transfer shall be effective in the same manner as in the case of transfer under Section 23. (2) Such transfer shall be to the personnel, as the case may be, the First or Second Transferee, under such terms and conditions as may be determined in the Reorganization Scheme and shall hold office or service subject to the following, namely :— (a) the terms and conditions of service applicable to them in the service of the Board immediately before the transfer shall not be less favourable or inferior to the terms and conditions of service applicable to them under the First or Second Transferee; (b) continuity of service in all respects of the personnel shall be maintained; and (c) all service benefits accrued prior to the transfer shall be recognized and taken into account, including payment for any or all service benefits. (3) Notwithstanding anything contained in the Industrial Disputes Act, 1947 (14 of 1947) or any other law for the time being in force, and except for the provisions contained in this Act, the personnel shall not be entitled to any compensation or damages under this Act or any other Central or State law or general law due to the transfer of employment by reason of the provisions of this part. Explanation.—For the purposes of this part and the Reorganization Scheme, "personnel" means all persons who are employees of the Board on the effective date by whatever name they are known.
25. Variation in transfer
The State Government may provide that transfers made under the terms of Sections 23 and 24 shall be provisional for a period of up to twelve months from the effective date and shall be liable to revocation, alteration, addition or other modification in such manner as the State Government may deem appropriate and shall reserve the right to do so.
26. Tariff
(1) Notwithstanding anything contained in any other law, the tariff for transmission, grid, bulk or retail supply of electricity in the State (hereinafter referred to as "Tariff") shall be subject to the provisions of this Act and determined by the Commission: Provided that notwithstanding any order or directive of the Madhya Pradesh Electricity Regulatory Commission constituted under Section 17 of the Central Act, the tariffs and charges determined by the Commission vide its orders No. 192/B-1, No. 05-01/G/192/B-2, No. 05-01/G/192/C-1, No. 05-01/G/192/C-2, No. 05-01/G/192/C-3, No. 05-01/G/192/D-1, No. 05-01/G/192/D-2, No. 05-01/G/192/D-3, No. 05-01/G/192/E and No. 05-01/G/192/F, shall be valid and effective from 1st March, 1999. (2) The Commission shall determine by regulations the terms and conditions for the fixation of tariff and in doing so shall be guided by the following factors, namely:— (a) the generation of electricity at efficient, adequate and quality levels which truly reflects the cost of supply of electricity; (b) factors which promote efficient use of resources, good performance, optimum investment and other matters which the State Commission deems appropriate for the purposes of this Act; (c) the generation, transmission, distribution and supply of electricity is done on commercial principles; (d) the interests of consumers are protected and at the same time consumers pay for the use of electricity in a reasonable manner; (e) the principles and their applications provided in Sections 46 and 57 and the Sixth Schedule of the Electricity (Supply) Act, 1948 (54 of 1948); and (f) in the case of the Board, the principles under Section 59 of the Electricity (Supply) Act, 1948 are complied with: Provided that where the Commission does not follow the factors specified in Clause (f), it shall record the reasons for the same. (3) Every licensee and other person, including the Board or its successor entity, engaged in transmission, sale, distribution or supply of electricity in bulk or retail in the State, shall calculate the expected revenue from charges in accordance with the procedures and processes specified by the Commission from time to time, as authorized for collecting such revenues while recovering and determining the tariff. (4) If the State Government requires the State Commission to grant a subsidy to any consumer or class of consumers under this tariff determined under this section, the State Government shall pay the amount in the form of a condition to the licensee or any other person concerned in the manner directed by the Commission to compensate the person affected by the provision of the subsidy, to implement the subsidy made available by the State Government. (5) Any retail tariff determined or implemented under this Act shall:— (a) not disclose separately the asymmetrical advantage to any consumer of electricity but may vary according to the consumer's load factor, power factor and for the total consumption of electricity during a specified period or the time at which supply is required or the geographical location of the area, the nature of usage, and the purpose for which usage is required or according to the capacity to pay and mutual assistance requirements of the consumer category; (b) except in the case of financially weak consumers, for whom a lower tariff for a limited quantity of electricity for meeting basic needs shall be done in such a manner that a higher tariff charged to any class or category of consumers from any other class or category of consumers being provided existing subsidy is reduced and within a period of five years from the commencement of this Act, the consumer of that category shall reflect the percentage of the cost of electricity supply to the licensee; (c) be fair and reasonable and shall be such as to promote efficiency in the generation and use of electricity; (d) meet all other relevant provisions of the Act, Rules and the conditions of the license. (6) Every licensee who has reason to believe that the charges to be collected under the tariff are to be determined shall provide to the Commission such information as may be required by the Commission to determine such calculation, at such time and in such manner as may be specified by the Commission. (7) (a) The Commission shall determine the tariff to be charged by the licensee after public hearing of the licensee and other interested parties, at intervals not exceeding one year in such manner as may be specified by the Commission. (b) The Commission shall be entitled to include in the licensee's tariff the expenses deemed necessary for the implementation of projects to support the supply of electricity to consumers in various locations in the licensee's area of supply from time to time, to be deployed in specific funds. (8) Except for any change for which the revised tariff is explicitly permitted and defined as part of the order to be issued by the Commission (e.g. fuel surcharge), no tariff or part of a tariff determined by the Commission and implemented shall be revised more than once in a financial year at the instance of the licensee. The licensee shall provide the proposal for revision of tariff to the Commission along with other information as required by the Commission. The Commission, after receipt of all information and hearing of the interested parties, shall take its decision on the proposed revision in tariff. (9) The licensee shall publish the tariff for electricity transmission or electricity supply within the area of transmission or supply in a daily newspaper operating in that region and shall make it available on the request of the public and such tariff shall be effective seven days after the date of such publication. (10) The licensee shall not revise or amend any tariff until it has been approved by the Commission and the revised tariff published in the manner provided in sub-section (9). (11) Notwithstanding anything contained in Sections 56, 57, 57-A and 57-B of the Electricity (Supply) Act, 1948 (54 of 1948), no rating committee shall be constituted after the date of commencement of this Act and the Commission shall ensure that the licensee has followed the relevant provisions regarding the sale of both bulk and retail electricity and the integration of their assets or systems in accordance with the provisions of this Act.
27. Financial assistance by State Government
राज्य सरकार, ऐसी रकम को और ऐसे निबंधन तथा शर्तों पर जो कि राज्य सरकार, अनुज्ञप्तिधारी द्वारा विनिर्दिष्ट परियोजनाओं के क्रियान्वयन हेतु समर्थ बनाने के लिए अवधारित करे, आर्थिक सहायता दे सकेगी जो राज्य सरकार लोकहित में आवश्यक समझे।
28. Orders to ensure compliance
(१) जहां आयोग का यह समाधान हो जाता है कि कोई अनुज्ञप्तिधारी किसी सुसंगत शर्त या अपेक्षा का उल्लंघन कर रहा है या उसका उल्लंघन करने वाला है तो वह धारा २९ के अधीन अंतिम आदेश द्वारा, और यदि वह उपधारा (२) के अनुसार समुचित समझे तो इस धारा के अधीन अंतरिम आदेश द्वारा ऐसे निदेश जारी करेगा जैसे कि वह अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए उचित समझे। (२) यह अवधारित करने में कि क्या यह समुचित होगा कि अंतरिम आदेश किया जाए, आयोग, विशिष्टतया निम्नलिखित का ध्यान रखेगा - (क) वह सीमा, जिस तक अनुज्ञप्तिधारी द्वारा उल्लंघन या संभाव्य उल्लंघन, इस अधिनियम के उद्देश्यों और प्रयोजनों को उपलब्धि को प्रभावित करेगा; (ख) वह सीमा, जिस तक अंतिम आदेश किए जाने के पूर्व सुसंगत शर्त या अपेक्षा के उल्लंघन में किसी ऐसी बात के परिणामस्वरूप जो की जानी है या किए जाने से छोड़ दी गई है, किसी व्यक्ति को हानि या नुकसान होना संभाव्य है; और (ग) वह सीमा जिस तक (इस धारा में इसके पश्चात् उपबंधित उपबंधों को ध्यान में रखते हुए) किसी सुसंगत शर्त या अपेक्षा के अभिकथित उल्लंघन के संबंध में कोई अन्य उपचार उपलब्ध है। (३) यदि आयोग कोई अंतरिम आदेश किया जाना प्रस्तावित करता है तो वह, - (क) यह कथन करते हुए कि वह आदेश करना प्रस्तावित करता है; (ख) निम्नलिखित बातें उपवर्णित करते हुए:- (एक) ऐसी सुसंगत शर्तों या अपेक्षाएं जिनका अनुपालन किया जाना प्रस्तावित आदेश द्वारा आशयित है; (दो) ऐसे कृत्य या लोप जिनरो उसकी राय में उस शर्त या अपेक्षा का उल्लंघन होता है; (तीन) ऐसे अन्य तथ्य जो उनकी राय में प्रस्तावित आदेश किया जाने को न्यायोचित ठहराते हैं; और (चार) प्रस्तावित आदेश के प्रभाव, और वह कालावधि विनिर्दिष्ट करते हुए जो कि सूचना की तारीख से ५ दिन से कम की नहीं होगी, जिसके भीतर अनुज्ञप्तिधारी प्रस्तावित आदेश के विरुद्ध अभ्यावेदन या आक्षेप कर सकता है, अनुज्ञप्तिधारी को सूचना देगा। (४) उपधारा (५) के अध्याय रहते हुए और अनुज्ञप्तिधारी से उपधारा (३) के अनुसरण में प्राप्त अभ्यावेदनों या आक्षेपों पर विचार ले लेने के पश्चात्, आयोग (अनुज्ञप्तिधारी के अभ्यावेदनों या आक्षेपों के कारण प्रस्तावित आदेश को उपांतरित करते हुए), उपधारा (३) में निर्दिष्ट कालावधि का अवसान होने के पश्चात्, किसी भी समय अंतरिम आदेश कर सकेगा यदि :- (क) आयोग के पास यह विश्वास करने का ठोस कारण है कि, उस अनुज्ञप्तिधारी ने जिससे कि आदेश संबंधित है, किसी सुसंगत शर्त या अपेक्षा का उल्लंघन किया है या उल्लंघन कर रहा है या वह उनका उल्लंघन करने वाला है; और (ख) आदेश द्वारा किए गए उपबंध उस शर्त या अपेक्षा का अनुपालन सुनिश्चित करने के प्रयोजन से अपेक्षित है। (५) आयोग, कोई अंतरिम आदेश नहीं कर सकेगा यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि अनुज्ञप्तिधारी ऐसे सभी कदम उठाने के लिए सहमत हो गया है और वह ऐसे कदम उठा भी रहा है जिन्हें कि आयोग समझता है कि उस प्रश्नाधीन शर्त या अपेक्षा का अनुपालन सुनिश्चित करने या उसे सुकर बनाने के लिए अनुज्ञप्तिधारी को कदम उठाना चाहिए; (६) अंतरिम आदेश, - (क) द्वारा ऐसे अनुज्ञप्तिधारी से जिससे कि वह संबंधित है, (मामले की प्रकृति के अनुसार) यह अपेक्षा की जा सकेगी कि वह ऐसी बातें करें या न करें जैसी कि आदेश में विनिर्दिष्ट है या जो इस प्रकार विनिर्दिष्ट किए गए प्रकार की है। (ख) शीघ्रतम साध्य ऐसे समय से प्रभावशील होगा जो कि आदेश द्वारा अवधारित किया गया हो; और (ग) आयोग द्वारा किसी भी समय प्रतिसंहत, उपांतरित या त्रिखंडित किया जा सकेगा, परंतु किसी भी दशा में ऐसी कालावधि के समाप्त होने पर जैसी कि आदेश में कथित है, तब प्रभावहीन हो जाएगा जब तक कि आयोग, धारा २९ में उपवर्णित प्रक्रिया का अनुसरण करके, उस अंतरिम आदेश को अंतिम आदेश के रूप में घोषित न कर दे। (७) अंतरिम आदेश के पश्चात् आयोग यथासाध्य शीघ्रता से, - (क) आदेश को एक प्रति उस अनुज्ञप्तिधारी पर तामील करेगा जिससे कि वह आदेश संबंधित है; (ख) आदेश को ऐसी रीति में प्रकाशित करेगा जैसा कि वह उसे उन व्यक्तियों की जानकारी में लाने के प्रयोजन के लिए, जिनके कि उससे प्रभावित होने की संभावना है, समुचित समझे; और (ग) अंतरिम आदेश को धारा २९ के अनुसार अंतिम आदेश के रूप में घोषित करने की कार्यवाहियां प्रारंभ करेगा।
29. Orders to ensure final compliance
(१) यदि आयोग अंतिम आदेश करना या अंतरिम आदेश को अंतिम आदेश के रूप में घोषित करना प्रस्तावित करता है, तो आयोग, - (क) यह कथन करते हुए कि वह अंतिम आदेश करना या अंतरिम आदेश को अंतिम आदेश के रूप में घोषित करना प्रस्तावित करता है; (ख) प्रस्तावित अंतिम आदेश के संबंध में धारा २८ की उपधारा (३) के खण्ड (ख) में निर्दिष्ट जानकारी उपवर्णित करते हुए; और (ग) वह कालावधि विनिर्दिष्ट करते हुए (जो सूचना के प्रकाशन की तारीख से ६० दिन से कम की नहीं होगी) जिसके भीतर प्रस्तावित आदेश के विरुद्ध अभ्यावेदन या आक्षेप किए जा सकेंगे, सूचना देगा और उन अभ्यावेदनों या आक्षेपों पर विचार जो साक्यरूप से किए गए हैं और वापस नहीं लिए गए हैं। आयोग ऐसे अभ्यावेदनों या आक्षेपों की सूचना प्रकाशित करेगा और वह कालावधि (जो सूचना के प्रकाशन की तारीख से ३० दिन से कम की नहीं होगी) विनिर्दिष्ट करेगा, जिसके भीतर और अभ्यावेदन या आक्षेप किए जा सकेंगे। (२) उपधारा (१) के अधीन, - (क) ऐसी रीति में सूचना प्रकाशित करते हुए, जैसी कि मामलों को उन व्यक्तियों की जिनरो सूचना संबंधित हो, और जिनका कि उससे प्रभावित होना संभाव्य हो, जानकारी में लाने के प्रयोजन के लिए आयोग समुचित समझे; और (ख) उस अनुज्ञप्तिधारी को जिससे कि आदेश संबंधित हो, सूचना और प्रस्तावित अंतिम आदेश की एक-एक प्रति तामील कराते हुए, एक सूचना दी जाएगी। (३) आयोग, - (क) उस अनुज्ञप्तिधारी की सहमति के सिवाय जिससे कि प्रस्तावित अंतिम आदेश संबंधित हो; और (ख) उपधारा (४) की अपेक्षाओं का अनुपालन कर लिए जाने के पश्चात् के सिवाय, प्रस्तावित अंतिम आदेश को उपधारा (१) में निर्दिष्ट सूचना के प्रकाशन के अनुसरण में प्राप्त अभ्यावेदनों या आक्षेपों के परिणामस्वरूप उपांतरित नहीं करेगा। (४) आयोग, - (क) उस अनुज्ञप्तिधारी पर, जिससे कि प्रस्तावित अंतिम आदेश संबंधित हो, ऐसी सूचना जैसा कि आयोग को प्रस्तावित अंतिम आदेश को उपांतरित करने के लिए अपेक्षित प्रतीत हो, उपांतरणों के ब्योरे के साथ तामील करेगा; (ख) उस सूचना में वह कालावधि विनिर्दिष्ट करेगा (जो सूचना की तामीली की तारीख से ३० दिन से कम की नहीं होगी) जिसके भीतर प्रस्तावित उपांतरणों के विरुद्ध अभ्यावेदन या आक्षेप किए जा सकेंगे; और (ग) उन अभ्यावेदनों या आक्षेपों पर विचार करेगा जो विनिर्दिष्ट समय के भीतर साक्यरूप से किए गए हैं और वापस नहीं लिए गए हैं। (५) धारा २८ की उपधारा (६) के खण्ड (क) और (ख) के उपबंध अंतिम आदेशों को लागू होंगे। (६) अंतिम आदेश किया जाने के पश्चात्, आयोग, यथासाध्य शीघ्रता से, अंतिम आदेश की बाबत धारा २८ की उपधारा (७) के खण्ड (क) और (ख) में उपवर्णित प्रक्रिया का अनुसरण करेगा। (७) आयोग, अंतिम आदेश को किसी भी समय प्रतिसंहत कर सकेगा किंतु किसी अंतिम आदेश के प्रतिसंहार के पूर्व आयोग, - (क) यह कथित करते हुए कि वह आदेश को प्रतिसंहत करना प्रस्तावित करता है और इसके प्रभावों को उपवर्णित करते हुए; और (ख) वह कालावधि विनिर्दिष्ट करते हुए (जो सूचना का परिदान किए जाने की तारीख से ३० दिन से कम की नहीं होगी) जिसके भीतर प्रस्तावित प्रतिसंहार के विरुद्ध अभ्यावेदन या आक्षेप किए जा सकेंगे, सूचना देगा और उन अभ्यावेदनों या आक्षेपों पर विचार जो विनिर्दिष्ट समय के भीतर सम्यकरूप से किए गए हैं और वापस नहीं लिए गए हैं। (८) यदि उपधारा (७) के अधीन सूचना देने के पश्चात् आयोग, उस अंतिम आदेश को जिससे कि सूचना संबंधित हो, प्रतिसंहत न करने का विनिश्चय करता है तो वह अपने विनिश्चय की संबद्ध व्यक्तियों को सूचना देगा। (९) उपधारा (७) और (८) के अधीन सूचना, धारा २८ की उपधारा (७) के खण्ड (क) और (ख) में उपवर्णित प्रक्रिया के अनुसार दी जाएगी।
30. Emergency provisions
(१) आयोग, अनुज्ञप्तिधारी के किसी उपक्रम का प्रबंधन और उसका नियंत्रण, उपक्रम की आस्तियों, हितों और अधिकारों सहित किसी व्यक्ति में निहित करने के लिए निदेश देने का हकदार होगा, यदि आयोग ऐसा समझता है तो वह इस अधिनियम के उद्देश्यों और प्रयोजनों और उपभोक्ता को विद्युत की दशा और सुरक्षित रीति में निरंतर प्रदाय बनाए रखने की आवश्यकता पर विचार करते हुए तत्काल निदेश दे सकेगा। (२) उपधारा (१) के अधीन जारी किए गए निदेश इस आधार पर प्रश्नगत नहीं किए जाएंगे कि निदेश दिए जाने की या निदेश पारित किए जाने के आशय की सुनवाई की कोई पूर्व सूचना अनुज्ञप्तिधारी को नहीं दी गई, किन्तु आयोग इस अधिनियम की धारा २८ तथा २९ के निबंधन के अनुसार और आदेश पारित करने के पूर्व अनुज्ञप्तिधारी को अवधर देगा तथा अनुज्ञप्तिधारी को सुनेगा।
31. Effect and enforcement of interim and final orders
(१) आयोग द्वारा पारित सभी अंतरिम या अंतिम आदेश और दिए गए सभी निदेश विधि द्वारा उसी प्रकार प्रवर्तनीय होंगे, मानो कि वे सिविल न्यायालय द्वारा पारित डिक्री हों। (२) आयोग, राज्य में पुलिस और अन्य प्राधिकारियों की ऐसी सहायता लेने का हकदार होगा जैसी कि आयोग द्वारा दिए गए आदेशों और निदेशों की प्रभावी प्रवर्तन के लिए अपेक्षित हो। (३) आयोग ऐसे जुर्माने और प्रभार अधिरोपित करने का हकदार होगा, जैसे कि उत्पादन करने वाली कंपनियों, अनुज्ञप्तिधारियों या अन्य व्यक्तियों के द्वारा इस अधिनियम या इसके अधीन विरचित विनियमों के उपबंधों या अपेक्षाओं या आयोग द्वारा समय-समय पर दिए गए निदेशों या आदेशों के अनुपालन या उनके उल्लंघन के लिए आयोग द्वारा विनियमों में विहित किए जाएं। वह जुर्माना, जिसे अधिरोपित करने का आयोग, हकदार होगा, एक बार अनुपालन या उल्लंघन करने के लिए १,००,००० रुपये (एक लाख रुपये) तक का और उस दिन के लिए जिसके कि दौरान अनुपालन या उल्लंघन चालू रहता है, ६,००० रुपये (छः हजार रुपये) से अनधिक और राशि तक का हो सकेगा।
32. आयोग का सामान्य नियंत्रण
(१) अनुज्ञप्तिधारी, उत्पादन करने वाली कंपनी और समस्त अन्य, आयोग द्वारा ऊर्जा प्रणाली (पावर सिस्टम) और विद्युत् प्रदाय लाइनों के, प्रचालन और उनके अनुरक्षण के लिए निबंधन और शर्तें विनियमित करने के लिए समय-समय पर विरचित विनियमों के उपबंधों का अनुपालन करेंगे। (२) अधिनियम के प्रवृत्त होने के पश्चात्, राज्य में, उन विद्युत् उद्योगों को, चाहे वे अधिनियम के प्रारंभ होने के पूर्व या उसके पश्चात् स्थापित हों, भाग रूप या उनके संबंध में प्रयुक्त समस्त आस्तियां संपत्तियां, रं गति में हित और अन्य सुविधाएं, आयोग द्वारा अधिनियम के उद्देश्यों और प्रयोजनों को प्राप्त करने के लिए और विशिष्टतया ऊर्जा प्रणाली (पावर सिस्टम) और विद्युत् प्रदाय लाइनों का निरंतर प्रचालन और अनुरक्षण बनाए रखने की आवश्यकता के लिए विरचित किए जाने वाले विनियमों के अध्यधीन होंगी।
33. राज्य सलाहकार समिति
(१) आयोग, राज्य सरकार के परामर्श से, राज्य सलाहकार समिति के नाम से एक समिति का गठन करेगा जिसमें ९ से न्यून और १५ से अधिक उतनी संख्या में व्यक्ति होंगे, जितने व्यक्तियों की नियुक्ति आयोग निम्नलिखित हितों अर्थात् राज्य में प्रदाय अनुज्ञप्ति के धारकों, राज्य में पारेषण अनुज्ञप्ति के धारकों, राज्य में कार्यरत उत्पादन करने वाली कंपनियों, अशासकीय संगठन, उपभोक्ता और उपभोक्ता समूह, शैक्षणिक संस्थाएं, अनुसंधान निकाय, वाणिज्य, उद्योग, परिवहन, कृषि और विद्युत् उद्योग में नियोजित श्रमिकों का प्रतिनिधित्व करने वाले ऐसे प्रतिनिधियों या निकायों से करने के पश्चात की जाएगी जैसा कि आयोग उपयुक्त समझे। (२) आयोग के अध्यक्ष (चेयरपर्सन) और सदस्य, राज्य सलाहकार समिति के पदेन अध्यक्ष (चेयरपर्सन) और सदस्य होंगे। (३) राज्य सलाहकार समिति प्रत्येक ३ मास में कम से कम एक बार अपना सम्मलेन करेगी। (४) राज्य सलाहकार समिति की अवधि तीन वर्ष की होगी। (५) राज्य सलाहकार समिति के कृत्य निम्नानुसार होंगे :-(क) राज्य में विद्युत् उद्योग से संबंधित नीति के प्रमुख प्रश्नों पर आयोग को सलाह देना; और (ख) ऐसे मामलों पर आयोग को सलाह देना जो कि आयोग उसके समक्ष रखे, जिसमें अनुज्ञप्तिधारियों द्वारा प्रदान की गई सेवा की गुणवत्ता, निरंतरता और विस्तार तथा अनुज्ञप्तिधारियों द्वारा उनकी अनुज्ञप्ति की शर्तों और अपेक्षाओं के अनुपालन से संबंधित मामले भी सम्मिलित हैं।
34. विद्युत् प्रदाय कार्य करने के मानक
(१) आयोग, अनुज्ञप्तिधारियों, राज्य सलाहकार समिति से और उन व्यक्तियों या निकायों से, जो कि उसके समक्ष उन व्यक्तियों के प्रतिनिधित्व के रूप में उपसंजात हो रहे हों, जिनके कि प्रभावित होने की संभावना हो, परामर्श करने के पश्चात्, समय-समय पर,-(क) विद्युत् प्रदाय सेवाओं के उपबंधों के संबंध में और उपभोक्ताओं द्वारा विद्युत् के ऐसे दक्षतापूर्ण उपयोग के उन्नयन के संबंध में, जो कि उसकी राय में दक्षतापूर्ण हैं और ऐसे अनुज्ञप्तिधारियों द्वारा प्राप्त किए जाने चाहिए कार्य करने के मानक अवधारित कर सकेगा : परन्तु ऐसे मानक केन्द्रीय सरकार द्वारा गठित प्राधिकरण द्वारा विद्युत् उद्योग के लिए स्थापित मानकों के संगत होंगे और किसी भी दशा में ऐसे मानकों से निम्नतर नहीं होंगे।(ख) अनुज्ञप्तिधारियों, उत्पादन करने वाली कंपनियों तथा अन्य के द्वारा प्रचालन के लिए ऊर्जा प्रणाली (पावर सिस्टम) प्रचालन कोड विहित कर सकेगा, जिसमें ग्रिड प्रचालन कोड, वितरण कोड, प्रदाय कोड और प्रदाय विनियम सम्मिलित हैं, किन्तु वे राज्य के भीतर तक ही सीमित नहीं होंगे;(ग) विद्युत् के उपयोग में और ऊर्जा प्रणाली के प्रचालन के लिए सुरक्षा विनियम विहित कर सकेगा; और(घ) मानकों, कोड्स, विनियमों तथा खंड (क), (ख) और (ग) के अधीन इस प्रकार अवधारित अन्य मामलों के प्रकाशन का ऐसे प्रारूप में तथा ऐसी रीति में इंतजाम करेगा जैसी कि वह समुचित समझे। (२) आयोग, भिन्न-भिन्न अनुज्ञप्तिधारियों के लिए भिन्न-भिन्न मानक और कोड्स अवधारित कर सकेगा।
35. कार्य करने के मानकों की जानकारी
आयोग, (क) अनुज्ञप्तियों के धारकों से तथा (ख) आयोग के समक्ष उन व्यक्तियों और व्यक्तियों के प्रवर्गों के, जिनके कि प्रभावित होने की संभावना हो, प्रतिनिधि के रूप में उपसंजात होने वाले व्यक्तियों या निकायों से और (ग) राज्य सलाहकार समिति से परामर्श करने के पश्चात्, निम्नलिखित को विहित करते हुए विनियम, विरचित कर सकेगा,-(एक) उपभोक्ताओं और आम जनता के लिए चार्टर, अनुज्ञप्तिधारियों के कामकाज के बारे में जानकारी का उनका अधिकार;(दो) वे परिस्थितियां जिनमें कि ऐसे अनुज्ञप्तिधारियों द्वारा उपभोक्ताओं को उनके अधिकारों और ऐसे अनुज्ञप्तिधारियों की ओर से होने वाले किसी विलंब या व्यतिक्रम के लिए, उपभोक्ताओं को प्रतिकर के भुगतान की जानकारी दी जाएगी;(तीन) उपभोक्ताओं को विद्युत् प्रदाय से संबंध खंड (एक) के अर्थ के भीतर उद्भूत किसी कर्तव्य के संबंध में कार्य करने के मानक; और(चार) वे परिस्थितियां जिनमें अनुज्ञप्तिधारियों को इस धारा या विनियमों की किन्हीं अपेक्षाओं से छूट दी जानी है, और वह भिन्न-भिन्न अनुज्ञप्तिधारियों के लिए भिन्न-भिन्न उपबंध कर सकेगा।
36. उपभोक्ता संरक्षण विधियों के लिए व्यावृत्ति
इस अधिनियम की कोई भी बात, उपभोक्ताओं के अन्य विधियों के अधीन अधिकारों और विशेषाधिकारों पर जिसमें उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, १९८६ (१९८६ का सं. ६८) भी सम्मिलित है, किसी भी प्रकार से प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालेगी या उन्हें प्रभावित नहीं करेगी।
37. कार्य करने के स्तरों के संबंध में जानकारी
(१) आयोग, समय-समय पर, निम्नलिखित के संबंध में जानकारी एकत्र करेगा,-(क) इस अधिनियम के अधीन अनुज्ञप्तिधारियों से उद्गृहीत जुर्माने या शास्तियां;(ख) ऐसे अनुज्ञप्तिधारियों द्वारा प्राप्त किए गए पारेषण और विद्युत् सेवाओं के उपबंधों से संबद्ध कार्य करने के मानक; और(ग) ऐसे अनुज्ञप्तिधारियों द्वारा प्राप्त किए गए, उपभोक्ताओं द्वारा विद्युत् के दक्ष उपयोग के उन्नयन से संबद्ध कार्य करने के मानक। (२) प्रत्येक अनुज्ञप्तिधारी प्रतिवर्ष ऐसी तारीख को या उसके पूर्व जैसे, कि आयोग द्वारा दिए गए निर्देश में विनिर्दिष्ट की जाए, आयोग को, निम्नलिखित जानकारी देगा,-(क) विहित किए गए प्रत्येक मानक की बाबत उन मामलों की संख्या जिनमें कि शास्ति उद्गृहीत की गई हो और उन शास्तियों के मूल्य की संकलित रक़म; और(ख) अवधारित किए गए प्रत्येक मानक की बाबत और अनुज्ञप्तिधारी द्वारा प्राप्त किए गए कार्य करने के स्तर की बाबत ऐसी जानकारी जैसी कि इस प्रकार विनिर्दिष्ट की जाए। (३) आयोग, प्रतिवर्ष कम से कम एक बार इस धारा के अधीन उसके द्वारा एकत्रित की गई या उसे दी गई ऐसी जानकारी को, जैसी कि आयोग को इस प्रकार अपेक्षित प्रतीत हो, ऐसे प्रारूप में और ऐसी रीति में, जैसी कि वह समुचित समझे, प्रकाशन करने के लिए इंतजाम करेगा।
38. जानकारी के प्रकटीकरण का प्रतिषेध
इस अधिनियम के उपबंधों के अध्यधीन रहते हुए, आयोग, अभिलिखित किए जाने वाले कारणों से यह निदेश दे सकेगा कि अनुज्ञप्तिधारियों, उत्पादन करने वाली कंपनियों या किसी अन्य व्यक्ति की बाबत कोई जानकारी गोपनीय मानी जाएगी और उसका प्रकटीकरण प्रतिषिद्ध होगा।
39. आयोग द्वारा माध्यस्थम्
(१) (क) माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, १९९६ (१९९६ का सं. २६) में या माध्यस्थम् से संबंधित, किसी अन्य विधि में अंतर्विष्ट किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, अनुज्ञप्तिधारियों के बीच उद्भूत होने वाला कोई विवाद आयोग को निर्दिष्ट किया जाएगा। (ख) आयोग, माध्यस्थ के रूप में कार्य करने के लिए अग्रसर हो सकेगा और विवाद का न्यायनिर्णयन करने और निपटारा करने के लिए पंचाट कर सकेगा या मध्यस्थों को नामनिर्दिष्ट कर सकेगा। (ग) ऐसे किसी न्यायनिर्णयन और निपटारे के संबंध में अनुसरित की जाने वाली पद्धति और प्रक्रिया ऐसी होगी जैसी कि विनियमों द्वारा विहित की जाए। (२) जहां कि आयोग द्वारा नियुक्त किसी मध्यस्थ द्वारा पंचाट दिया गया हो वहां इसे आयोग के समक्ष फाइल किया जाएगा और आयोग पंचाट पर समुचित आदेश पारित कर सकेगा, जिनमें,-(क) पंचाट की पुष्टि करने और उसे प्रवर्तित करने;(ख) पंचाट को अपास्त या उपांतरित करने; या(ग) मध्यस्थ द्वारा पुनर्विचार किए जाने के लिए पंचाट को विप्रेषित करने, के आदेश भी सम्मिलित होंगे। (३) उपधारा (२) के अधीन आयोग द्वारा दिया गया कोई पंचाट या आयोग द्वारा पारित कोई आदेश, आयोग का विनिश्चय या आदेश होगा तथा इस अधिनियम में यथा उपबंधित के अनुसार अपील करने योग्य होगा। (४) आयोग द्वारा उपधारा (२) के अधीन दिया गया कोई पंचाट, या आयोग द्वारा पारित किया गया कोई आदेश, उसी प्रकार प्रवर्तनीय होगा जैसे कि वह किसी सिविल न्यायालय की डिक्री हो। (५) आयोग, इस भाग के अधीन कार्यवाहियों के प्रारंभ होने के पूर्व किसी भी समय या कार्यवाहियों के लंबित रहने के दौरान, किसी भी समय ऐसे अंतरिम आदेश कर सकेगा जैसे कि आयोग समुचित समझे।
40. विद्युत् निरीक्षकों के विनिश्चयों के विरुद्ध अपीलें
भारतीय विद्युत् अधिनियम, १९१० (१९१० का सं. ९) या विद्युत् (प्रदाय) अधिनियम, १९४८ (१९४८ का सं. ५४) में या उनके अधीन बनाये गये किसी नियम में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, केन्द्रीय सरकार या केन्द्रीय विद्युत् प्राधिकरण के किसी निरीक्षक से भिन्न किसी विद्युत् निरीक्षक के विनिश्चय के विरुद्ध अपील आयोग को की जाएगी।
41. आयोग के आदेशों के विरुद्ध अपीलें
इस अधिनियम के अधीन आयोग के द्वारा पारित किसी विनिश्चय या आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति, उस व्यक्ति को आयोग का विनिश्चय या आदेश संसूचित किए जाने की तारीख से साठ दिन के भीतर, उच्च न्यायालय को, ऐसे आदेश से उद्भूत होने वाली विधि के प्रश्न पर, अपील फाइल कर सकेगा: परन्तु यदि उच्च न्यायालय का यह समाधान हो जाता है कि व्यथित व्यक्ति के पास साठ दिन की कालावधि के भीतर अपील प्रस्तुत न कर पाने का पर्याप्त कारण था तो वह साठ दिन की कालावधि के अवसान हो जाने के पश्चात् ९० दिन से अनधिक की और कालावधि के भीतर अपील ग्रहण कर सकेगा।
42. आयोग का बजट
आयोग, प्रत्येक वित्तीय वर्ष में ऐसे प्रारूप में तथा ऐसे समय पर, जो कि विहित किया जाए, आयोग को प्राक्कलित प्राप्तियों तथा व्यय को दर्शित हुए अगले वित्तीय वर्ष के लिए अपना बजट तैयार करेगा और उसे अनुमोदन के लिए राज्य सरकार को अग्रेषित करेगा।
43. आयोग का लेखा और उसकी संपरीक्षा
(१) आयोग, उचित लेखा तथा अन्य सुसंगत अभिलेख संधारित करेगा तथा ऐसे प्रारूप में, जैसा कि भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक के परामर्श से राज्य सरकार द्वारा विहित किया जाएं, लेखाओं का वार्षिक विवरण तैयार करेगा। (२) आयोग के लेखाओं की संपरीक्षा नियंत्रक और महालेखा परीक्षक द्वारा नियुक्त किसी व्यक्ति द्वारा ऐसे अंतरालों पर की जाएगी, जैसा कि उसके द्वारा विनिश्चित किया जाए और ऐसी संपरीक्षा के संबंध में कोई व्यय आयोग द्वारा नियंत्रक और महालेखा परीक्षक को देय होगा। (३) नियंत्रक और महालेखा परीक्षक तथा उसके द्वारा इस अधिनियम के अधीन आयोग के लेखाओं की संपरीक्षा के संबंध में नियुक्त किसी व्यक्ति को ऐसे ही अधिकार और विशेषाधिकार तथा प्राधिकार प्राप्त होंगे जो नियंत्रक और महालेखा परीक्षक को सरकारी लेखाओं की संपरीक्षा के संबंध में साधारणतया होते हैं, और विशिष्टतया उसे बहियों, लेखाओं, संबंधित वाउचरों तथा अन्य दस्तावेजों तथा कागज़-पत्रों को पेश किए जाने को मांग करने तथा आयोग के किसी भी कार्यालय का निरीक्षण करने का अधिकार प्राप्त होगा। (४) नियंत्रक और महालेखा परीक्षक अथवा इस निमित्त नियुक्त किए गए किसी अन्य व्यक्ति द्वारा यथा प्रमाणित आयोग के लेखाओं को उस पर संपरीक्षा रिपोर्ट के साथ आयोग द्वारा प्रतिवर्ष राज्य सरकार को अग्रेषित किया जाएगा और राज्य सरकार उनके प्राप्त होने के पश्चात् यथाशक्यशीघ्र संपरीक्षा रिपोर्ट को राज्य विधान सभा के पटल पर रखवाएगी।
44. आयोग को वार्षिक रिपोर्ट
(1) आयोग, प्रतिवर्ष एक बार ऐसे प्ररूप में तथा ऐसे समय पर जैसा कि विहित किया जाए पूर्ववर्ती वर्ष के दौरान के अपने क्रियाकलापों का संक्षिप्त विवरण देते हुए एक वार्षिक रिपोर्ट तैयार करेगा, तथा रिपोर्ट की प्रतियां राज्य सरकार को अग्रेषित की जाएंगी। (2) उपधारा (1) के अधीन प्राप्त रिपोर्ट की एक प्रति उसके प्राप्त होने के पश्चात यथाशक्यशीघ्र राज्य विधान सभा के पटल पर रखी जाएगी।
45. धारा 14 के उल्लंघन के लिये शास्ति
जो कोई इस अधिनियम के उपबंधों या इस अधिनियम के अधीन विरचित विनियमों या किसी अन्य प्रयोज्य विधि के उपबंधों के उल्लंघन में विद्युत के उपयोग या पारेषण या प्रदाय के कारबार में लगेगा, वह कारावास से जो छह मास तक का हो सकेगा या जुर्माने के रूप में शास्ति से जो Rs. 1,00,000 (एक लाख) तक की हो सकेगी या दोनों से तथा ऐसी और शास्ति से जो प्रथम दिन के पश्चात ऐसे प्रत्येक दिन के लिए जिसके कि दौरान अपराध चालू रहता है Rs. 6,000 (छह हजार) तक की हो सकेगी, दण्डनीय होगा।
46. अन्य उपबंधों के उल्लंघन के लिये शास्तियां
यदि कोई अनुज्ञप्तिधारी या कोई अन्य व्यक्ति जो इस अधिनियम के किन्हीं उपबंधों के अधीन दिए गए किसी निदेश, आदेश या की गई किसी अपेक्षा का अनुपालन करने से या उन्हें कार्यान्वित करने से किसी युक्तियुक्त कारण के बिना इंकार करता है या उसमें असफल रहता है, वह कारावास से जो 3 मास तक का हो सकेगा या जुर्माने के रूप में शास्ति से जो Rs. 1,00,000 (एक लाख) तक की हो सकेगी या दोनों से तथा ऐसी और शास्ति से, जो प्रथम दिन के पश्चात प्रत्येक दिन के लिए जिसके कि दौरान अपराध चालू रहता है Rs. 4,000 (चार हजार) तक की हो सकेगी, दण्डनीय होगा।
47. कंपनियों द्वारा अपराध
(1) जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कंपनी द्वारा किया गया है, वहां प्रत्येक ऐसा व्यक्ति जो उस अपराध के किए जाने के समय उस कंपनी के कारबार के संचालन के लिए उस कंपनी का भारसाधक था और उसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह कंपनी भी, उस अपराध के दोषी समझे जाएंगे और तदनुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने के दायी होंगे: परन्तु इस उपधारा में अंतर्विष्ट कोई भी बात किसी ऐसे व्यक्ति को किसी दंड का दायी नहीं बनाएगी यदि वह यह साबित कर देता है कि वह अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या यह कि उसने ऐसे अपराध के किए जाने का निवारण करने के लिए समस्त सम्यक तत्परता बरती थी। (2) उपधारा (1) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कंपनी द्वारा किया गया है और यह साबित हो जाता है कि वह अपराध कंपनी के किसी निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से या उसकी किसी उपेक्षा के फलस्वरूप किया गया माना जा सकता है, वहां ऐसा निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और तदनुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने का दायी होगा। इस धारा के प्रयोजनों के लिए— (क) "कंपनी" से अभिप्रेत है कोई निगमित निकाय और उसके अंतर्गत कोई फर्म या व्यक्तियों के अन्य संगम भी आते हैं; और (ख) "निदेशक" से किसी फर्म के संबंध में उस फर्म का भागीदार अभिप्रेत है।
48. अपराधों का संज्ञान और उनके प्रथम की शक्ति
(1) कोई भी न्यायालय इस अधिनियम के अधीन दंडनीय किसी अपराध का, आयोग द्वारा इस निमित्त साधारणतया या विशिष्टतया प्राधिकृत किए गए आयोग के किसी अधिकारी द्वारा लिखित में किए गए परिवाद पर ही संज्ञान करेगा अन्यथा नहीं और प्रथम वर्ग के न्यायिक मजिस्ट्रेट के न्यायालय या उससे वरिष्ठ किसी न्यायालय से भिन्न कोई न्यायालय ऐसे अपराध का विचारण नहीं करेगा। (2) दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का सं. 2) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, कोई मजिस्ट्रेट, यदि उसे ऐसा करने का कारण प्रतीत हो, परिवाद फाइल करने वाले आयोग के अधिकारी को वैयक्तिक हाजरी से अभिमुक्ति प्रदान कर सकेगा। (3) आयोग, लिखित में अभिलिखित किए जाने वाले कारणों से, आयोग के द्वारा किए गए किसी आदेश के उल्लंघन से संबंधित किसी अपराध का, कार्यवाहियों के संस्थित किए जाने के पूर्व या पश्चात शमन कर सकेगा।
49. शास्तियां और कार्यवाहियां अन्य कार्यवाहियों पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालेंगी
इस अधिनियम के उपबंधों या विनियमों या आयोग द्वारा पारित किए गए आदेशों का उल्लंघन करने वाले किसी व्यक्ति के विरुद्ध इस अधिनियम के अधीन कार्यवाहियां और कार्यवाहियां उन कार्यवाहियों के अतिरिक्त और उन पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना होंगी जो भी अन्य अधिनियमों के अधीन आरंभ की जाएं।
50. फीस, जुर्माने और प्रभारों की वसूली
आयोग, इस अधिनियम के अधीन देय समस्त राशियां, चाहे वे अनुज्ञप्ति फीस और प्रभारों के रूप में शोध्य हों, मध्यप्रदेश लोक धन (शोध्य राशियों की वसूली) अधिनियम, 1988 (क्रमांक 2 सन् 1988) के उपबंधों के अनुसार उसी प्रकार वसूल करने का हकदार होगा मानो कि ऐसी राशि उस अधिनियम में परिभाषित लोक मांग हो और शोध्य रकम को संबंधित व्यक्ति या प्राधिकारी को सौंप देगा।
51. जुर्माने और प्रभारों का उपयोजन
इस अधिनियम के अधीन जुर्माना और प्रभार अधिरोपित करने वाला आयोग या न्यायालय यह निदेश दे सकेगा कि वह संपूर्ण या उसका कोई भाग कार्यवाहियों के व्ययों के भुगतान में या उस प्रयोजन के लिए प्रयुक्त किया जाए।
52. अधिरोपित जुर्माने या शास्तियों का कोई भी भाग संक्रांत नहीं किया जाएगा
ऐसे अनुज्ञप्तिधारी, उत्पादन करने वाली कंपनियां और अन्य जिन पर इस अधिनियम के अधीन जुर्माने, प्रभार या शास्तियां अधिरोपित की गई हों, टैरिफ या देय प्रभारों के रूप में उन्हें प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः उपभोक्ताओं को संक्रांत नहीं करेंगे।
53. अधिकारिता का वर्जन
इस अधिनियम या उसके अधीन विरचित नियमों या विनियमों के अधीन किया गया कोई आदेश या विनिश्चय इस अधिनियम में यथा उपबंधित के सिवाय अपीलनीय नहीं होगा और किसी भी सिविल न्यायालय को, जिसमें तत्समय प्रवृत्त किसी माध्यस्थम विधि के अधीन कोई न्यायालय या अधिकरण भी सम्मिलित है, किसी ऐसे मामले के संबंध में, जिसके लिए इस अधिनियम के अधीन या उसके द्वारा आयोग को सशक्त किया गया है, कोई अधिकारिता नहीं होगी।
54. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति
यदि इस अधिनियम के उपबंधों या उसके अधीन बनाए गए नियमों, विनियमों, स्कीम या आदेशों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उद्भूत हो तो राज्य सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, इस अधिनियम के उपबंधों से संगत ऐसे उपबंध जो उसे कठिनाई को दूर करने के लिए आवश्यक या समीचीन प्रतीत हों, कर सकेगी।
55. विनियम बनाने की शक्ति
(1) आयोग, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के अधीन अपने कार्यों के पालन के लिए विनियम बना सकेगा। (2) विशिष्टतया तथा पूर्वगामी उपबंधों तथा इस अधिनियम के में विनिर्दिष्ट रूप से उपबंधित विषयों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे विनियमों में निम्नलिखित समस्त विषयों या किसी विषय के लिए उपबंध किए जा सकते (क) आयोग के कामकाज का प्रशासन, जिसमें उसकी प्रशासनिक, अर्द्ध न्यायिक तथा न्यायिक शक्तियों का प्रयोग, माध्यस्थम तथा प्रक्रिया, आयोग का सम्मिलन बुलाना तथा सम्मिलन आयोजित करना, समय तथा स्थान जिस पर सम्मिलन आयोजित किया जाएगा और आयोग के कारबार का संचालन सम्मिलित है; (ख) आयोग के सचिव, अधिकारियों तथा कर्मचारियों के कर्तव्य; (ग) अनुज्ञप्तिधारियों को और इस अधिनियम की धारा 16 के अधीन छूट प्राप्त व्यक्तियों को तथा विद्युत के उत्पादन, क्रय, पारेषण, वितरण एवं प्रदाय में अंतर्ग्रस्त अन्य व्यक्तियों को समनुदेशित किए जाने वाले कृत्यों का अवधारण, ऐसी रीति जिसमें ऐसे कृत्यों का निर्वहन किया जाएगा और ऊर्जा प्रणाली तथा विद्युत प्रदाय लाइनों के संबंध में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया तथा कोड, ऐसे व्यक्तियों द्वारा अनुपालन की जाने वाली शर्तों का तथा उससे संबंधित अन्य मामलों का अवधारण; (घ) पारेषण, उप-पारेषण, वितरण, तथा प्रदाय के लिए अनुज्ञप्ति देने की प्रक्रिया, अनुज्ञप्ति प्रदान करने की शर्तें और अनुज्ञप्ति के लिए आवेदन करने वाले व्यक्तियों द्वारा उपलब्ध कराई जाने वाली विशिष्टियां और दस्तावेजें, मानक और सामान्य शर्तें जिसके अध्यधीन रहते हुए अनुज्ञप्ति दी जाएगी, अनुज्ञप्ति देने से छूट दी जाना, अनुज्ञप्तियों का प्रतिसंहरण और संशोधन तथा उसका प्रभाव और उपरोक्त से संबंधित समस्त विषय; (ङ) अनुज्ञप्तिधारी के कर्तव्य, शक्तियां, अधिकार तथा बाध्यताएं; (च) विद्युत के उत्पादन, पारेषण, वितरण, प्रदाय में अंतर्ग्रस्त तथा उसका उपयोग करने वाले व्यक्तियों द्वारा प्रस्तुत की जाने वाली विशिष्टियां, उनसे जानकारी, लेखाओं तथा बहियों का संग्रह, वह प्ररूप तथा यह रीति जिसमें उन्हें प्रस्तुत किया जाना है और उन्हें प्रवर्तित करवाना तथा पेश करने के लिए उन्हें बाध्य करना; (छ) अनुज्ञप्तिधारी के राजस्वों, टैरिफ नियतन के लिए अवधारण का ढंग तथा रीति, ऐसा अवधारण तथा नियतन करने में विचार किए जाने वाले विषय; (ज) अनुज्ञप्तिधारियों द्वारा अनुसरण की जाने हेतु ऊर्जा क्रय तथा उत्पादन प्रक्रिया; (झ) राज्य सलाहकार समिति का गठन; (ञ) राज्य में विद्युत के उत्पादन, पारेषण, उप-पारेषण, वितरण, प्रदाय में अंतर्ग्रस्त तथा उपयोग करने वाले व्यक्तियों के लिए आचार संहिता तथा उनके कार्य का स्तर; (ट) इस अधिनियम के उपबंधों के अतिक्रमण के लिए अधिरोपित किए जाने वाले जुर्माने तथा प्रभार की रकम जिसमें जुर्माने और प्रभार अधिरोपित करने तथा उसका संग्रह करने का ढंग और रीति सम्मिलित है; (ठ) संदेह फीस तथा प्रभार की रकम; (ड) वह प्ररूप तथा रीति विहित करना, जिसमें आयोग के लेखे रखे जाएंगे; (ढ) ऊर्जा प्रणाली तथा विद्युत प्रदाय लाइनों का प्रचालन तथा अनुरक्षण विनियमित करना; (ण) राज्य में विद्युत उद्योग के लिए या उसके संबंध में उपयोग में लाई गई संपत्तियों, आस्तियों तथा संपत्तियों में हित को विनियमित करना; और (त) कोई अन्य विषय, जिसका इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन विनियमों द्वारा विहित किया जाना अपेक्षित है।
57. आयोग के सदस्य तथा कर्मचारीवृन्द लोकसेवक होंगे
(1) आयोग के अध्यक्ष (चेयरपर्सन), सदस्यों, अधिकारियों तथा अन्य कर्मचारियों को जब वे इस अधिनियम के किसी उपबंध के अनुसार कार्य कर रहे हों या कार्य करने के लिए तात्पर्यित हों, भारतीय दंड संहिता, 1860 (1860 का सं. 45) की धारा 21 के अर्थ के अंतर्गत लोक सेवक समझा जाएगा। (2) इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों या विनियमों या किए गए किसी आदेश के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या किए जाने के लिए आशयित किसी बात के संबंध में आयोग के विरुद्ध या आयोग के सदस्यों या आयोग के कर्मचारीवृन्द या प्रतिनिधियों के विरुद्ध कोई वाद या विधिक कार्यवाही नहीं होगी।
58. आयोग के समक्ष की जाने वाली कार्यवाहियां न्यायिक कार्यवाहियां होगी
आयोग के समक्ष समस्त कार्यवाहियां भारतीय दंड संहिता, 1860 (1860 का सं. 45) की धारा 193, 219 तथा 228 के अर्थ के अंतर्गत न्यायिक कार्यवाहियां समझी जाएंगी और आयोग को दंड प्रक्रिया संहिता, 1903 (1904 का सं. 2) की धारा 195 तथा अध्याय छब्बीस के प्रयोजनों के लिए एक सिविल न्यायालय समझा जाएगा।
59. भारतीय विद्युत अधिनियम, 1910 और विद्युत (प्रदाय) अधिनियम, 1948 पर इस अधिनियम का प्रभाव
(1) धारा 61 में यथा उपबंधित के सिवाय, इस अधिनियम के उपबंध, भारतीय विद्युत अधिनियम, 1910 (1910 का सं. 9) या विद्युत (प्रदाय) अधिनियम, 1948 (1948 का सं. 54) के उपबंधों से असंगत या प्रतिकूल होते हुए भी अभिभावी होंगे। (2) उपधारा (1) के उपबंधों के अध्यधीन रहते हुए, भारतीय विद्युत अधिनियम, 1910 (1910 का सं. 9) और विद्युत (प्रदाय) अधिनियम, 1948 (1948 का सं. 54) के के समस्त विषय जिनसे मंडल कार्य करता है निम्नलिखित के अध्यधीन रहते हुए होंगे:— (क) समस्त नियामक कृत्य आयोग के जिम्मे होंगे; (ख) मंडल ऐसे कृत्यों का जिम्मा नहीं लेगा जिनका निर्वहन इस अधिनियम के अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों के उपबंधों के अनुसार आयोग द्वारा किया जाना है।
60. Effect of the Act on Indian Electricity Act, 1910 and Electricity (Supply) Act, 1948
(1) Upon the commencement of this Act, the State Electricity Regulatory Commission constituted under Section 17 of the Central Act shall exercise all powers and perform all functions as per the provisions of this Act and not under the Central Act. (2) Save as provided in sub-section (1), the provisions of the Central Act shall not apply in the State in so far as they relate to the State Commission.
61. Savings
(1) Notwithstanding anything contained in this Act, all powers, rights and functions of the Central Commission, Regional Electricity Board, Central Electricity Authority, Central Government and authorities under the Central Government shall remain unaffected and continue to be in force under the Indian Electricity Act, 1910 or the Electricity (Supply) Act, 1948 or the rules made thereunder. (2) Nothing contained in this Act shall apply to the transmission of electricity among States or to the Power Grid Corporation of India Limited or other bodies or licensees or generating companies controlled by the Central Government or undertakings owned by the Central Government. (3) All actions taken by any person or authority including the Board under the Indian Electricity Act, 1910 or the Electricity (Supply) Act, 1948 before the commencement of this Act shall be valid and operative notwithstanding the modifications made in the said Acts by this Act.
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