Bare Act
Uttarakhand Para Chikitsa Parishad Adhiniyam, 2009
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ
- (1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम उत्तराखण्ड परा-चिकित्सा परिषद् अधिनियम, 2009 है।
- (2) इसका विस्तार सम्पूर्ण उत्तराखण्ड राज्य पर है।
- (3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा, जो राज्य सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करे।
2. परिभाषाएं
इस अधिनियम में, जब तक कि सन्दर्भ से अपेक्षित न हो :- (क) “अधिसूचना” से राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना अभिप्रेत है; (ख) “आयुर्विज्ञान प्रयोगशाला” से ऐसी प्रयोगशाला अभिप्रेत है, जो अर्हंत तकनीकी व्यक्तियों द्वारा नैदानिक, उपचारार्थ और अनुसंधान प्रयोजनों के लिए चलाई जा रही है; (ग) “तकनीशियन” से ऐसा कोई व्यक्ति अभिप्रेत है, जिसका नाम रजिस्टर में अंकित है; (घ) “निधि” से धारा 32 की उपधारा
- (1) के अधीन स्थापित परिषद की निधि अभिप्रेत है; (ङ) “परिषद” से धारा 3 के अन्तर्गत गठित उत्तराखण्ड परा-चिकित्सा परिषद अभिप्रेत है; (च) “परा-चिकित्सा शिक्षा” से शिक्षा अनुसंधान या प्रशिक्षण के कार्यक्रम या क्षेत्र अभिप्रेत है, जो राज्य सरकार यथास्थिति, परा-चिकित्सा परिषद के परामर्श से अधिसूचना द्वारा आयुर्विज्ञान प्रयोगशाला, प्रौद्योगिकी या विकिरण निदान या विकिरण चिकित्सा या नाभिकीय चिकित्सा या भौतिक चिकित्सा की विद्या घोषित करे; (छ) “परा-चिकित्सा व्यवसायी” से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है, जिसका नाम रजिस्टर में दर्ज हो; (ज) “परा-चिकित्सा विषय” से ऐसे विषय अभिप्रेत है, जिन्हें विनियमों द्वारा विहित किया जाय; (झ) “परा-चिकित्सा अर्हता” से ऐसी अर्हता अभिप्रेत है, जिन्हें विनियमों में विहित किया जाय; (ञ) “भौतिक चिकित्सा” से भौतिक कारकों के माध्यम से, इसके अन्तर्गत ताप, शीत, प्रकाश, जल मालिश, किसी व्यक्ति को निःशक्तता के निवारण या सुधार करने के उद्देश्य से विद्युत या शारीरिक व्यायाम भी है, चिकित्सीय रूप से निदेशित चिकित्सा अभिप्रेत है, जिसके अन्तर्गत व्यवसायिक चिकित्सा भी है; (ट) “मजिस्ट्रेट” से प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट अभिप्रेत है; (ठ) “मुख्य कार्यपालक अधिकारी” से धारा 16 में नियुक्त सचिव/रजिस्ट्रार अभिप्रेत है; (ड) “रजिस्टर” से धारा 25 की उपधारा
- (1) के अधीन रखा गया रजिस्टर अभिप्रेत है; (ढ) “विश्वविद्यालय” से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम, 1956 की धारा 2 के खण्ड (च) के अधीन परिभाषित राज्य में स्थित किसी विश्वविद्यालय से (केन्द्रीय विश्वविद्यालय को छोड़कर) अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत राज्य में स्थित कोई संस्था भी है, जिसे उक्त अधिनियम की धारा 3 के अधीन सम विश्वविद्यालय घोषित किया गया है; (ण) "विकिरण निदान" से आयनकारी विकिरण (एक्सरे) अन्तर्वलित करते हुए सभी प्रकार की नैदानिक क्रियाविधियां अभिप्रेत है; (त) "विकिरण चिकित्सा" से सील किया हुआ आयनकारी विकिरण स्रोतों को अन्तर्वलित करते हुए किसी प्रकार की उपचारार्थ किया विधि अभिप्रेत है; (थ) "विनियमों" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियम अभिप्रेत है; (द) "विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है; (ध) "सरकार" से उत्तराखण्ड सरकार अभिप्रेत है; (न) "सदस्य" से परिषद का सदस्य अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत उसका अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष भी है; (प) "संस्था" से कोई संस्था अभिप्रेत है, चाहे वह किसी नाम से ज्ञात हो, जो इस अधिनियम के अधीन शिक्षा प्रदान करने के लिए विधि द्वारा स्थापित अथवा मान्यता प्राप्त हो; (फ) "समिति" से धारा 13 के अधीन गठित समिति अभिप्रेत है।
3. परिषद का गठन
- (1) राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए उत्तराखण्ड परा-चिकित्सा परिषद का गठन करेगी।
- (2) उत्तराखण्ड परा-चिकित्सा परिषद एक निगमित निकाय होगी, जिसका पाश्चत उत्तराधिकार और एक सामान्य मुद्रा होगी और उसको जंगम और स्थावर सम्पत्ति को अर्जित करने, धारित करने और उसका निपटारा करने तथा संविदा करने की शक्ति होगी तथा वह उक्त नाम से वाद ला सकेगी या उसके विरुद्ध वाद लाया जा सकेगा।
- (3) परिषद का मुख्यालय ऐसे स्थान पर होगा, जो राज्य सरकार द्वारा अधिसूचना द्वारा विनिश्चित किया जाए।
- (4) परिषद निम्नलिखित सदस्यों से मिलकर बनेगी; अर्थात् :- (क) अध्यक्ष, जो राज्य सरकार द्वारा परिषद के सदस्यों में से, नियुक्त किया जाए; (ख) उपाध्यक्ष, जो राज्य सरकार द्वारा परिषद के सदस्यों में से नियुक्त किया जाए; (ग) स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय के अपर निदेशक स्तर का एक अधिकारी, जो परा-चिकित्सा से सम्बन्धित होगा; (घ) राज्य सरकार का स्वास्थ्य विभाग का एक ऐसा अधिकारी, जो उपसचिव के स्तर से न्यून न हो; (ङ) राज्य सरकार का वित्त विभाग का एक ऐसा अधिकारी, जो उपसचिव के स्तर से न्यून न हो; (च) राज्य सरकार का चिकित्सा शिक्षा विभाग का एक सदस्य, जो उपसचिव के स्तर से न्यून न हो; (छ) तीन सदस्य, जो निम्नलिखित का प्रतिनिधित्व करने के लिए राज्य सरकार द्वारा नियुक्त किए जाएं :- (एक) उत्तराखण्ड विद्यालयी शिक्षा परिषद; (दो) उत्तराखण्ड तकनीकी शिक्षा परिषद; और (तीन) उत्तराखण्ड आयुर्विज्ञान परिषद; (ज) राज्य सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त परा-चिकित्सा संस्थाओं के अध्यापकों में से राज्य सरकार द्वारा नामित किए जाने वाले चार सदस्य; (झ) परा-चिकित्सा शिक्षा संस्था को सम्बद्धता प्रदान करने वाले प्रत्येक विश्वविद्यालय द्वारा नामित एक-एक सदस्य; (ञ) राजकीय मेडिकल कॉलेज एवं राज्य के आयुर्विज्ञान के मेडिकल प्रैक्टिशनर्स में से राज्य सरकार द्वारा नामित चार सदस्य, जो परा-चिकित्सा विषय के ज्ञाता हों; (ट) पंजीकृत परा-चिकित्सा व्यवसायियों में से पांच सदस्य, जो आयुर्विज्ञान प्रयोगशाला, प्रौद्योगिकी, विकिरण चिकित्सा प्रौद्योगिकी, भौतिक चिकित्सा व्यवसाय से हो, प्रत्येक से न्यूनतम एक निर्वाचित सदस्य : परन्तु यह कि अधिनियम के प्रारम्भ होने के पश्चात् प्रथम बार परिषद का गठन होने की दशा में इस प्रवर्ग के अंतर्गत सदस्यों को, राज्य सरकार द्वारा तीन वर्ष के लिए नामित किया जाएगा।
4. पदावधि और आकस्मिक रिक्ति
- (1) परिषद का कोई सदस्य, उसकी नियुक्ति की तारीख से पांच वर्ष की अवधि के लिए पदधारण करेगा।
- (2) किसी सदस्य का पद रिक्त हुआ समझा जायेगा, यदि परिषद की राय में वह परिषद के तीन लगातार सामान्य बैठकों में बिना पर्याप्त कारणों के अनुपस्थित रहा है या वह धारा 5 के अधीन सदस्य नहीं रह जाता है।
- (3) परिषद में कोई आकस्मिक रिक्ति नई नियुक्ति द्वारा भरी जाएगी और रिक्ति को भरने के लिए इस प्रकार नियुक्त व्यक्ति केवल उस सदस्य की शेष अवधि के लिए पद धारण करेगा, जिसके स्थान पर वह नियुक्त हुआ है।
- (4) परिषद का कोई सदस्य पुनः नियुक्ति का पात्र होगा।
5. सदस्यता की समाप्ति
- (1) धारा 3 की उपधारा
- (4) के खण्ड (ग) से (झ) तक के अधीन राज्य सरकार द्वारा नामित/नियुक्त कोई सदस्य उसकी उस सेवा समाप्त होने पर, जिसके कारण वह नियुक्त किया गया था, परिषद का सदस्य नहीं रहेगा।
- (2) धारा 3 की उपधारा
- (4) के खण्ड (ट) के अधीन निर्वाचित कोई सदस्य रजिस्टर से उसका नाम हटाए जाने पर परिषद का सदस्य नहीं रहेगा।
6. सदस्य द्वारा त्याग-पत्र
सरकार द्वारा धारा 3 की उपधारा
- (4) के खण्ड (क), (ख) और (छ) से (ट) के अधीन नियुक्त कोई सदस्य राज्य सरकार को सम्बोधित लिखित रूप में अपने हस्ताक्षर से अपनी सदस्यता से किसी भी समय त्याग-पत्र दे सकेगा : परन्तु यह कि ऐसा सदस्य, जिसने इस धारा के अधीन अपना त्याग-पत्र प्रस्तुत किया है, तब तक परिषद का पद धारण करता रहेगा, जब तक राज्य सरकार द्वारा उसका त्याग-पत्र स्वीकार नहीं कर लिया जाता।
7. सदस्यता से हटाया जाना और रिक्ति
- (1) परिषद उपधारा
- (2) के उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना उसके कुल सदस्यों के बहुमत और उपस्थित तथा मत देने वाले सदस्यों के दो तिहाई से अन्यून बहुमत द्वारा किसी समय राज्य सरकार को किसी सदस्य को उसके पद से हटाए जाने की सिफारिश कर सकेगी, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि किसी कारण से परिषद में उस सदस्य का बना रहना लोक हित में नहीं है या उक्त व्यक्ति परिषद के हित पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला है और इस सम्बन्ध में राज्य सरकार का विनिश्चय अन्तिम होगा।
- (2) राज्य सरकार, परिषद के किसी सदस्य को हटा सकेगी, यदि वह- (क) किसी ऐसे अपराध के लिए सिद्ध दोष ठहराया गया है, जिसमें नैतिक अधमता, अन्तर्वलित हो; या (ख) सक्षम न्यायालय द्वारा अनुमोदि दिवालिया घोषित किया गया है; या (ग) विकृतचित्त का हो जाता है और सक्षम न्यायालय द्वारा ऐसा घोषित कर दिया गया है; या (घ) सदस्य के रूप में कार्य करने से इंकार करता है या कार्य करने के लिए असमर्थ हो गया है; या (ङ) परिषद के लगातार तीन बैठकों में बिना पर्याप्त कारण के अनुपस्थित रहा है; या (च) उसने, यथास्थिति, अध्यक्ष, उपाध्यक्ष या सदस्य के रूप में अपने पद का दुरुपयोग किया है, जिससे उसका पद पर बना रहना लोक हित के प्रतिकूल होगा; या (छ) धारा 3 की उपधारा
- (4) के खण्ड (ट) के अधीन चयनित सदस्य का नाम रजिस्टर से निकाल दिया गया हो : परन्तु यह कि कोई व्यक्ति उपधारा
- (2) के खण्ड (घ), खण्ड (ङ) तथा खण्ड (च) के अधीन तब तक नहीं हटाया जायेगा, जब तक सदस्यों को सुनवाई का समुचित अवसर न दे दिया गया हो।
8. परिषद् की बैठक
- (1) परिषद् की बैठक ऐसे समय और स्थान पर होगी और वह अपनी बैठकों के कारवार के संव्यबहार के सम्बन्ध में प्रक्रिया के ऐसे नियमों का, जिसके अन्तर्गत बैठकों में गणपूर्ति भी है, अनुपालन करेगी, जो विनियमों द्वारा अवधारित किया जाये : परन्तु यह कि परिषद् एक वर्ष में न्यूनतम एक बार बैठक करेगी।
- (2) परिषद् का अध्यक्ष बैठकों की अध्यक्षता करेगा और उसकी अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष अध्यक्षता करेगा।
- (3) यदि किसी कारण से अध्यक्ष या उपाध्यक्ष, परिषद् की किसी बैठक में उपस्थित होने में असमर्थ हो तो बैठक में उपस्थित सदस्यों द्वारा निर्वाचित कोई अन्य सदस्य इस बैठक की अध्यक्षता करेगा।
- (4) ऐसे सभी प्रश्न, जो परिषद् की किसी बैठक के समक्ष आते हैं, उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के बहुमत द्वारा विनिश्चित किए जायेंगे और बराबर मत होने की दशा में अध्यक्षता करने वाले व्यक्ति का द्वितीय और निर्णायक मत होगा और वह उसका प्रयोग करेगा।
9. रिक्ति आदि परिषद् की कार्रवाइयों को अविधिमान्य करेगी
परिषद् का कोई कार्य या कार्रवाई :- (क) परिषद् में किसी रिक्ति या उसके गठन में किसी त्रुटि; या (ख) परिषद् में उसके सदस्य के रूप में कार्य करने वाले व्यक्ति की नियुक्ति में किसी त्रुटि; या (ग) परिषद् की प्रक्रिया में मामले के गुणागुण पर प्रभाव न डालने वाली किसी अनियमितता के कारण ही अविधिमान्य नहीं होगी।
10. बैठक का कार्यवृत्त एवं कार्यवाही की वैधता
- (1) परिषद् की प्रत्येक बैठक का कार्यवृत्त गोपनीय होगा एवं कोई भी व्यक्ति परिषद् के पूर्व संकल्प के बिना बैठक की कार्यवाही अथवा उसके अंश को प्रकट नहीं करेगा : परन्तु यह कि कोई व्यक्ति परिषद् की बैठक के उन निर्णयों को प्रकट अथवा प्रकाशित कर सकेगा, जिसके लिए परिषद् द्वारा संकल्प लिया जा चुका है एवं यदि परिषद् के किसी संकल्प द्वारा प्रकाशन को सर्वथा गोपनीय रखने का संकल्प न लिया गया हो।
- (2) किसी भी व्यक्ति द्वारा परिषद् की सदस्यता अथवा अध्यक्षता, उपाध्यक्षता अथवा किसी बैठक के पीठासीन अधिकारी की हैसियत से किए गए कार्य, उनके चुनाव अथवा नामांकन के दोष अथवा निरर्हता के कारण समाप्त नहीं होगी अथवा परिषद् के उन बैठकों की कार्यवाही, जिसमें उनके द्वारा अध्यक्षता की गई हो, भी बाधित नहीं होगी, यदि बैठक के निर्णय सदस्यों के बहुमत के आधार पर लिए हों।
- (3) जब परिषद् का कोई पद रिक्त हो तो परिषद् के निरन्तर बने सदस्य इस प्रकार कार्य करेंगे, जैसे कि वह रिक्ति घटित न हुई हो।
- (4) परिषद् द्वारा किए गए किसी भी कार्य पर मात्र इस आशय से प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया जा सकेगा कि उसमें कोई रिक्ति रह गई हो अथवा परिषद् के गठन में किसी प्रकार दोष हो।
- (5) परिषद् की प्रत्येक बैठक की कार्यवाहियों के कार्यवृत्त इस प्रयोजन के लिए रखी जाने वाली पुस्तिका में अभिलिखित किए जायेंगे, जिसमें उपस्थित परिषद् के सदस्यों के नाम, कार्यवृत्त दर्ज किए जायेंगे और उसमें पीठासीन अधिकारी द्वारा या उसी या ठीक आगामी बैठक में पुष्टिकरण के लिए हस्ताक्षर किए जायेंगे।
- (6) जब तक प्रतिकूल साबित न हो जाए, बैठक के कार्यवृत्त पर इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार हस्ताक्षर कर दिए हों परिषद् की बैठक सम्यक रूप से बुलाई गई समझी जायेगी।
11. परिषद् के सदस्यों के भत्ते
परिषद् के सदस्यों को ऐसी यात्रा और अन्य भत्ते प्राप्त होंगे, जैसे कि विनियमों द्वारा विहित किए जाएं : परन्तु यह कि परिषद् के सदस्य, जो सरकारी कर्मचारी हों, ऐसे अन्य भत्ते प्राप्त करने के हकदार नहीं होंगे।
12. विशिष्ट प्रयोजनों के लिए परिषद् के साथ व्यक्तियों को सहयोग करने की शक्ति
- (1) परिषद्, ऐसी रीति से और ऐसे प्रयोजनों के लिए, जो विनियमों द्वारा अवधारित किए जाएं, अपने साथ ऐसे व्यक्ति को, जिसकी सहायता या सलाह, वह इस अधिनियम के उपबन्धों में से किसी को कार्यान्वित करने के लिए अपेक्षित समझे, सहयोगित कर सकेगी।
- (2) किसी प्रयोजन के लिए उपधारा
- (1) के अधीन परिषद् के साथ सहयोगित कोई व्यक्ति उस प्रयोजन के लिए सुसंगत किसी चर्चा में भाग लेने का अधिकार रखेगा, किन्तु उसे परिषद् की किसी बैठक में मत देने का अधिकार नहीं होगा और वह किसी अन्य प्रयोजन के लिए सदस्य नहीं होगा।
- (3) सहयोगित व्यक्ति, ऐसे भत्ते प्राप्त करने के अधिकारी होंगे, जैसे विनियमों द्वारा अवधारित किए जाएं।
13. परिषद् की समितियां
- (1) परिषद्, यथासम्भव शीघ्र अपने सदस्यों में ऐसे साधारण और विशिष्ट प्रयोजनों के लिए, जो वह इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के कार्यान्वयन के लिए आवश्यक समझे, ऐसी कार्यपालक समिति, अनुशासन समिति या किसी अन्य समिति का गठन करेगी, जो विनियमों द्वारा अवधारित की जाए।
- (2) किसी समिति का गठन, कार्यकाल और कृत्य ऐसे होंगे, जो विनियमों द्वारा अवधारित किए जाएं।
- (3) इस धारा के अधीन गठित प्रत्येक समिति अपने अध्यक्ष का चयन करेगी: परन्तु यह कि - (क) जहां अध्यक्ष ऐसी समिति का सदस्य है, वहां वह ऐसी समिति का अध्यक्ष होगा और उसकी अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष, यदि वह ऐसी समिति का सदस्य है, उसका अध्यक्ष होगा; और दोनों की अनुपस्थिति में उस समिति के सदस्यों द्वारा चयनित कोई सदस्य उसका अध्यक्ष होगा; (ख) जहां अध्यक्ष, ऐसी समिति का सदस्य नहीं है किन्तु उपाध्यक्ष सदस्य है, वहां वह उसका अध्यक्ष होगा और उसकी अनुपस्थिति में उस समिति के सदस्यों द्वारा निर्वाचित कोई सदस्य उसका अध्यक्ष होगा।
14. परिषद के कृत्य
- (1) परिषद का यह कर्तव्य होगा कि वह ऐसी कार्यवाही करे, जो परा-चिकित्सा शिक्षा और मानकों के अनुरक्षण के समेकित और एकीकृत विकास को सुनिश्चित करने के लिए ठीक समझे।
- (2) विशिष्टतया और पूर्वगामी पंक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना परिषद के कृत्यों में निम्नलिखित होंगे :- (क) रजिस्टर में नामों की प्रविष्टि, हटाए जाना या उसकी पुनः प्रविष्टि; (ख) परा-चिकित्सा विधा में व्यवसाय करने के लिए व्यक्तियों का रजिस्टर रखा जाना; (ग) परा चिकित्सा शिक्षा, प्रशिक्षण, अनुसंधान एवं वृत्तिक आचरण या यथास्थिति परा-चिकित्सा व्यवसायी के सदाचार के मानकों का अवधारण; (घ) केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार से दान, अनुदान, संदान, पूर्तदान प्राप्त करना, वसीयतों और संदानों को प्राप्त करना तथा यथास्थिति वसीयतकर्ताओं, दानकर्ताओं या अन्तरणकर्ताओं से जंगम या स्थावर सम्पत्तियों का अन्तरण; (ङ) इस अधिनियम द्वारा प्रदत्त आनुशासनिक शक्तियों का प्रयोग; (च) ऐसी सभी बातें करना, जो परिषद के सभी या किसी उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए आवश्यक या आनुषंगिक या सहायक हों।
15. परिषद के सचिव / रजिस्ट्रार, अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति
- (1) इस अधिनियम के अधीन उसके कृत्यों के दक्षतापूर्ण निर्वहन करने के प्रयोजन के लिए परिषद, ऐसे विनियमों के अधीन रहते हुए, जो इस निमित्त बनाए जाए, एक सचिव/रजिस्ट्रार उतने अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति करेगी, जो वह आवश्यक समझे : परन्तु यह कि परिषद का पहला सचिव/रजिस्ट्रार राज्य सरकार द्वारा, ऐसे निबन्धनों और शर्तों पर नियुक्त किया जायेगा, जो राज्य सरकार ठीक समझे और वह ऐसा सचिव तीन वर्ष की अवधि के लिए पद धारण करेगा।
- (2) परिषद द्वारा नियुक्त सचिव/रजिस्ट्रार, अधिकारी या अन्य कर्मचारी सेवा की ऐसी शर्तों के अधीन होंगे, जो ऐसे पारिश्रमिक के हकदार होंगे, जो विनियमों द्वारा अवधारित किए जाएं।
- (3) परिषद द्वारा इस अधिनियम के अधीन तैनात किया गया रजिस्ट्रार या अन्य कोई अधिकारी या सेवक भारतीय दण्ड संहिता, 1860 (1860 का सं0 45) की धारा 21 के अर्थान्तर्गत लोक सेवक समझे जायेंगे।
16. सचिव/रजिस्ट्रार का परिषद के मुख्य कार्यपालक अधिकारी के रूप में कार्य करना
धारा 15 के उपधारा
- (1) के अधीन नियुक्त सचिव/रजिस्ट्रार परिषद का मुख्य कार्यपालक अधिकारी होगा।
17. सचिव/रजिस्ट्रार के कर्तव्य
सचिव/रजिस्ट्रार के कर्तव्य ऐसे होंगे, जैसे विनियमों में अवधारित किए जाये।
18. परिषद के आदेशों और अन्य लिखतों का अधिप्रमाणन
परिषद के सभी आदेश और विनिश्चय अध्यक्ष या इस निमित्त उक्त परिषद द्वारा प्राधिकृत किसी अन्य सदस्य के हस्ताक्षर से अधिप्रमाणित किए जायेंगे और उक्त परिषद द्वारा जारी सभी अन्य लिखतें मुख्य कार्यपालक अधिकारी या उक्त परिषद के किसी अन्य अधिकारी के हस्ताक्षर से अधिप्रमाणित की जायेंगी।
19. परा-चिकित्सा शिक्षा प्रदान करने के लिए राज्य सरकार की अनुमति
तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, किसी विश्वविद्यालय या संस्था को राज्य के अन्दर परा-चिकित्सा शिक्षा प्रदान करने के लिए राज्य सरकार की पूर्व अनुमति प्राप्त करनी होगी। राज्य सरकार ऐसी अनुमति ऐसे निबन्धनों के अधीन, जो वह आवश्यक समझे, दे सकेगी।
20. परा-चिकित्सा शिक्षा की अर्हता घोषित किया जाना
- (1) सरकार, परिषद से परामर्श करने के पश्चात् समय-समय पर अधिसूचना द्वारा, किसी विश्वविद्यालय या संस्था द्वारा अनुदत्त शिक्षा को इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए मान्यता प्राप्त अर्हता के रूप में घोषित कर सकेगी।
24. मान्यता वापस लिया जाना
जहां परिषद् ने राज्य सरकार को यह रिपोर्ट दी है कि परा-चिकित्सा शिक्षा का कोई मान्यता प्राप्त पाठ्यक्रम या कोई अनुमोदित परीक्षा विनियमों के अनुरूप नहीं चल रही है, वहां राज्य सरकार सम्बद्ध विश्वविद्यालय या संस्था को, यथास्थिति, परा-चिकित्सा शिक्षा के पाठ्यक्रम या परीक्षा को दी गई मान्यता को वापस लेने के प्रश्न पर विचार करने के अपने आशय की सूचना देगी और यथास्थिति, उक्त विश्वविद्यालय या संस्था ऐसी सूचना की प्राप्ति से तीन मास के भीतर राज्य सरकार को इस विषय में ऐसा अभ्यावेदन भेजेगी, जो वह उचित समझे। उक्त अभ्यावेदन पर राज्य सरकार विनिश्चय करेगी और उसका विनिश्चय अन्तिम होगा।
25. परा-चिकित्सा व्यवसायी का रजिस्टर
- (1) परिषद्, एक रजिस्टर रखेगी और इसमें विनियमों द्वारा अवधारित रीति से परा-चिकित्सा व्यवसायियों के नाम दर्ज करेगी।
- (2) इस अधिनियम के अन्य उपबन्धों के अधीन रहते हुए, कोई व्यक्ति, जो ऐसी परा-चिकित्सा शिक्षा रखता है, जो राज्य सरकार द्वारा धारा 20 के अधीन अधिसूचित की जाए, रजिस्टर में अपना नाम दर्ज कराने और उससे व्यवसाय प्रमाण-पत्र प्राप्त करने का पात्र होगा।
- (3) इस अधिनियम के अधीन कोई व्यक्ति, तब तक व्यवसाय करने का हकदार नहीं होगा, जब तक कि उसका नाम रजिस्टर में दर्ज न कर दिया गया हो : परन्तु यह कि ऐसे किसी व्यक्ति का नाम, जो राज्य सरकार द्वारा धारा 20 के अधीन अधिसूचित रूप में परा-चिकित्सा शिक्षा रखता है, रजिस्टर में ऐसी अधिसूचना की तारीख से उसके किसी आवेदन का परिषद् द्वारा निपटान किए जाने तक रजिस्टर में दर्ज किया माना जाएगा, यदि उसने परिषद् को अपना नाम रजिस्टर में दर्ज कराने के लिए आवेदन ऐसी अधिसूचना के प्रवृत्त होने से छ: माह के भीतर किया हो।
- (4) ऐसा रजिस्टर, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (अधिनियम सं0 1 सन् 1872) के अधीन लोक दस्तावेज समझा जाएगा।
26. रजिस्टर में नाम दर्ज करना
- (1) परिषद् किसी भी व्यक्ति द्वारा ऐसी रीति से, ऐसी फीस के संदाय पर, जो दो हजार रुपये से अधिक न हो अथवा जैसा विनियमों द्वारा अवधारित की जाए, किए गए आवेदन की प्राप्ति पर रजिस्टर में उसका नाम दर्ज कर सकेगी, यदि परिषद् का यह समाधान हो जाता है कि ऐसा व्यक्ति ऐसी परा-चिकित्सा शिक्षा रखता है।
- (2) कोई व्यक्ति, जिसका नाम रजिस्टर में प्रविष्ट किया गया है, यथास्थिति, सम्बन्धित विषय का परा भौतिक, चिकित्सा व्यवसायी या आयुर्विज्ञान प्रयोगशाला तकनीशियन या विकिरण चिकित्सा तकनीशियन कहलाने का हकदार होगा या भविष्य में राज्य सरकार द्वारा अन्य विधाओं को, जो राज्य सरकार अधिसूचना द्वारा सम्मिलित करे।
- (3) परिषद् किसी व्यक्ति का नाम रजिस्टर में दर्ज करने से लेखबद्ध कारणों और विनियमों द्वारा अवधारित रीति से इंकार कर सकेगी।
27. वृत्तिक 'आचरण' और रजिस्टर से नाम का हटाया जाना
- (1) परिषद् इस अधिनियम के अधीन विनियमों द्वारा व्यवसायों के लिए वृत्तिक आचरण और शिष्टाचार तथा सदाचार संहिता के मानक अवधारित करेगी।
- (2) उपधारा
- (1) के अधीन परिषद् द्वारा बनाए गए विनियम यह विनिर्दिष्ट कर सकेंगे कि कौन से अधिक्रमण वृत्तिक अवचार का गठन करते हैं और ऐसे उपबन्ध तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी प्रभावी होंगे।
- (3) परिषद्, किसी भी व्यक्ति को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर देने के पश्चात् और ऐसी अतिरिक्त जांच के पश्चात्, यदि कोई हो, करना ठीक समझे, जहां उसका समाधान हो जाता है, किसी व्यक्ति का नाम धारा 25 की उपधारा
- (1) के अधीन रखे गए रजिस्टर से आदेश द्वारा हटा सकेगी :- (क) रजिस्टर में उसका नाम त्रुटि से या दुर्व्यपदेशन या सारवान तथ्य को छिपाने के कारण प्रविष्ट किया गया है; (ख) वह किसी अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया गया है या वृत्तिक रूप से किसी अवचार का दोषी रहा है या उसने उपधारा
- (1) के अधीन अवधारित वृत्तिक आचरण या शिष्टाचार या सदाचार संहिता के मानकों का अधिक्रमण किया है, जो परिषद् की राय में उसके नाम को रजिस्टर में बनाए रखने को अनुचित ठहराते हैं।
- (4) उपधारा
- (3) के अधीन कोई आदेश यह विनिर्दिष्ट कर सकेगा कि कोई व्यक्ति, जिसके नाम को रजिस्टर से हटाने के लिए आदेश किया गया है, इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकरण के लिए स्थायी रूप से या ऐसी अवधि के लिए, जो विनिर्दिष्ट की जाए, पात्र नहीं होगा।
28. अवचार से सम्बन्धित जांचों की प्रक्रिया
- (1) जहां परिषद् की, किसी सूचना की प्राप्ति पर या उसे की गई किसी शिकायत पर प्रथम दृष्टया यह राय है कि कोई परा-चिकित्सा व्यवसायी किसी वृत्तिक या अन्य अवचार का दोषी है, वहां परिषद् मामले को धारा 13 की उपधारा
- (1) के अधीन गठित अनुशासन समिति को निर्दिष्ट करेगी और तदुपरान्त अनुशासन समिति ऐसी जांच ऐसी रीति से करेगी, जो विनियमों द्वारा अवधारित की जाये और ऐसी जांच के परिणाम की परिषद् को रिपोर्ट करेगी।
- (2) यदि ऐसी रिपोर्ट की प्राप्ति पर परिषद् का यह निष्कर्ष है कि परा-चिकित्सा व्यवसायी किसी वृत्तिक या अन्य अवचार का दोषी नहीं है तो वह तदनुसार अपना निष्कर्ष उल्लिखित करेगी और यथास्थिति, कार्यवाही फाइल की जाए या शिकायत खारिज की जाए, के निर्देश देगी।
- (3) यदि परिषद्, ऐसी रिपोर्ट की प्राप्ति पर, यह पाती है कि यथास्थिति, कोई परा-चिकित्सा व्यवसायी अपनी किसी वृत्तिक प्रतिष्ठा में किसी अवचार का दोषी है या उसने वृत्तिक आचरण या शिष्टाचार या इस अधिनियम के अधीन विहित सदाचार संहिता के मानदण्डों का अधिक्रमण किया है, तो वह ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध धारा 27 की उपधारा
- (3) और
- (4) के उपबन्धों के अनुसार कार्यवाही करेगी। स्पष्टीकरण - इस प्रयोजनों के लिए 'परा-चिकित्सा व्यवसायी' के अन्तर्गत वह व्यक्ति भी है, जो अभिकथित अवचार की तारीख को, यथास्थिति, परा-चिकित्सा व्यवसायी था, भले ही वह जांच के समय उस रूप में न रहा हो।
- (4) इस धारा के अधीन किसी जांच के प्रयोजनों के लिए परिषद् और उसकी अनुशासन समिति को निम्नलिखित विषयों की बाबत् वही शक्तियां होगी, जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के अधीन सिविल न्यायालय में निहित होती है; अर्थात् :- (क) किसी व्यक्ति को समन करना और उसे हाजिर कराना तथा शपथ पर उसकी परीक्षा करना; (ख) किसी दस्तावेज की खोज और उसको प्रस्तुत करना; और (ग) शपथ पत्रों पर साक्ष्य ग्रहण करना।
29. रजिस्टर में पुनः प्रविष्ट
परिषद्, किसी ऐसे व्यक्ति के नाम को, जिसका नाम धारा 27 की उपधारा
- (4) के अधीन रजिस्टर से स्थायी रूप से नहीं हटाया गया है, किसी आदेश द्वारा, ऐसी रीति से और दो हजार रुपये से अनधिक की ऐसी फीस के संदाय पर तथा ऐसी शर्तों और अपेक्षाओं को पूरा करने के पश्चात्, जो विनियमों द्वारा अवधारित की जाये, रजिस्टर में पुनः दर्ज कर सकेगी।
30. परिषद द्वारा किए गए आदेशों के विरूद्ध अपील
- (1) जहां इस अधिनियम के अधीन परिषद ने :- (क) रजिस्टर में किसी व्यक्ति के नाम को दर्ज करने के इंकार कर दिया है; या (ख) रजिस्टर में किसी व्यक्ति के नाम को हटाने का आदेश कर दिया है, वहां ऐसा व्यक्ति परिषद के आदेश की प्राप्ति की तारीख से 30 दिन की उक्त अवधि के भीतर ऐसी रीति से, जो विहित की जाए, राज्य सरकार को अपील कर सकेगा : परन्तु यह कि राज्य सरकार, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि ऐसा व्यक्ति पर्याप्त कारणों से अपील फाईल नहीं कर सका था तो 30 दिन की समाप्ति के पश्चात भी ऐसी अपील ग्रहण कर सकेगी।
- (2) राज्य सरकार, उपधारा
- (1) के अधीन की गई अपील का निपटारा, ऐसी प्रक्रिया के अनुसार करेगी, जो विहित की जाए।
- (3) उपधारा
- (2) के अधीन राज्य सरकार का विनिश्चय अन्तिम होगा।
31. राज्य सरकार द्वारा संदाय
राज्य सरकार विधि द्वारा इस निमित्त किए गए सम्यक विनियोग के पश्चात् परिषद को प्रत्येक वित्तीय वर्ष में ऐसी धनराशियों का संदाय कर सकेगी, जो इस अधिनियम के अधीन परिषद के कृत्यों के निर्वहन के लिए आवश्यक समझी जाए।
32. परिषद की निधि
- (1) परिषद की अपनी स्वयं की निधि होगी और ऐसी सभी राशियां, जो उसे राज्य सरकार द्वारा समय-समय पर संदत की जाए तथा परिषद की सभी प्राप्तियां (जिसके अन्तर्गत ऐसी धनराशि भी है, जिसे कोई अन्य प्राधिकारी अथवा कोई व्यक्ति, परिषद को सौंप सकेगा) निधि में जमा की जायेगी और परिषद द्वारा सभी संदाय निधि से किए जाएंगे।
- (2) निधि से सम्बन्धित सभी धन, ऐसे बैंकों में ऐसे रीति से, जो परिषद द्वारा विनिश्चित किए जाए, राज्य सरकार के अनुमोदन के अधीन रहते हुए जमा किए जायेंगे और उसमें निहित किये जायेंगे।
- (3) परिषद इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के निर्वहन के लिए ऐसी धनराशियां खर्च कर सकेगी, जिन्हें वह उचित समझे और ऐसी धनराशियों को परिषद की निधि से संदेय व्यय माना जायेगा।
33. बजट
- (1) परिषद आगामी वित्तीय वर्ष की बाबत बजट ऐसे प्रारूप में और प्रत्येक वर्ष ऐसे समय पर, जो विहित किया जाये, तैयार करेगी, जिसमें प्राक्कलित प्राप्तियां और व्यय दर्शित किये जाये।
- (2) ऐसी बैठक, जिसमें बजट पातिर किया गया हो, के पन्द्रह दिन के भीतर, राज्य सरकार को अग्रेशित किया जायेगा।
- (3) यदि राज्य सरकार की यह राय हो कि उसका इस प्रकार अग्रेशित किए गए बजट के प्राविधान इस अधिनियम के प्रयोजन को कार्यान्वित करने के लिए पर्याप्त नहीं तो वह बजट को उसमें ऐसे उपान्तरण करने के लिए उपाय जैसे कि राज्य सरकार द्वारा सुझाए जाये, परिषद को वापस कर देगी।
- (4) परिषद इस बात के लिए सक्षम होगी कि ऐसी धनराशि का, जो आवश्यक हो, एक शीर्ष से दूसरे शीर्ष और ऐसे शीर्ष और गौण शीर्षों में पुनर्विनियोग करे।
- (5) परिषद, जैसा और जब अपेक्षित हो अनुपूरक बजट, ऐसे प्रारूप में और ऐसे दिनांक तक, जो विहित की जाये, पारित कर सकेगी और उपधारा (2), (3),
- (4) के उपबन्ध ऐसे अनुपूरक बजट में लागू होंगे।
34. वार्षिक रिपोर्ट
परिषद, प्रत्येक वर्ष में एक बार, ऐसे प्रारूप और ऐसे समय पर, जो विहित किया जाये, वार्षिक रिपोर्ट तैयार करेगी, जिसमें पूर्ववर्ती वर्ष के दौरान उसके क्रियाकलापों का सही और पूरा लेखा-जोखा दिया जायेगा तथा उसकी प्रतियां राज्य सरकार को अग्रेशित की जाएगी और सरकार उसको विधान सभा के समक्ष रखवायेगी।
35. लेखा और संपरीक्षा
- (1) परिषद अपने वार्षिक लेखा बंद करने के पश्चात्, यथाशीघ्र, ऐसे प्रारूप में लेखाओं का विवरण तैयार करेगी और उसे महालेखाकार को ऐसी तारीख तक अग्रेशित करेगी, जो राज्य सरकार उत्तराखण्ड के महालेखाकार के परामर्श से विहित करे।
- (2) परिषद के लेखाओं की महालेखाकार द्वारा ऐसे समय पर और ऐसी रीति से, जिन्हें वह उचित समझे, संपरीक्षा कराई जायेगी।
- (3) परिषद द्वारा महालेखाकार या उसके द्वारा इस निमित्त नियुक्त किसी अन्य व्यक्ति द्वारा यथाप्रमाणित लेखे तथा उन पर संपरीक्षा रिपोर्ट राज्य सरकार को वार्षिक रूप में अग्रेशित की जायेगी, जिसे सरकार द्वारा विधान सभा के समक्ष रखा जायेगा।
36. क्लीनिकल स्थापन द्वारा परा-चिकित्सा व्यवसायी के रूप में नियोजन पर प्रतिषेध
कोई भी क्लीनिकल स्थापन, जैसे अस्पताल, नर्सिंग होम या स्वास्थ्य देखरेख से सम्बन्ध में अन्य संस्थाएं, किसी व्यक्ति को परा-चिकित्सा व्यवसायी के रूप में तभी नियुक्त करेगी, जब उसका नाम परिषद के रजिस्टर में दर्ज कर दिया गया हो।
37. परा-चिकित्सा व्यवसायी की रिपोर्ट को संज्ञान में न लिया जाना तथा स्वतंत्र व्यवसाय पर प्रतिबन्ध
परा-चिकित्सा व्यवसायी की रिपोर्ट तब तक वैध नहीं समझी जायेगी जब तक कि ऐसी रिपोर्ट को विषय विशेषज्ञ चिकित्सक द्वारा प्रतिहस्ताक्षर न कर दिया गया हो। परा-चिकित्सा व्यवसायी निजी व्यवसाय स्वतंत्र रूप से नहीं कर सकेगा।
38. इस अधिनियम के उपबन्धों के अधिक्रमण के लिए शास्ति
ऐसा कोई विश्वविद्यालय या संस्था का प्राधिकृत प्राधिकारी, जो इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम अथवा विनियमों के उपबन्धों के उल्लंघन में कार्य करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी न्यूनतम अवधि छ: माह तथा अधिकतम अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी तथा जुर्माने से, जो पांच लाख रुपये तक का हो सकेगा, से दण्डित किया जायेगा।
39. गैर वृत्तिक द्वारा वृत्तिक के रूप में व्यवसाय करने के लिए शास्ति
ऐसा व्यक्ति, जिसका नाम इस अधिनियम के अधीन परिषद के रजिस्टर में प्रविष्ट नहीं किया गया है या जिसका नाम प्रविष्ट किया नहीं समझा जाता है और वह, यथास्थिति, परा-चिकित्सा व्यवसायी के रूप में व्यवसाय कर रहा है, वह दोनों में से, किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक हो सकेगी तथा जुर्माने से, जो बीस हजार रुपये तक का हो सकेगा, से दण्डित किया जायेगा।
40. प्रमाण-पत्रों आदि का बेईमानी से उपयोग करने के लिए दण्ड
कोई व्यक्ति :-
- (1) जो इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रजिस्टर में अपनी प्रविष्टि का बेईमानी से उपयोग करता है; या
- (2) जो लिखित में अथवा अन्यथा, कोई मिथ्या या कपटपूर्ण घोषणा या अभ्यावेदन करके या प्रस्तुत करके या कराके इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन व्यवसाय करने की बेईमानी से प्रयास करता है; या
- (3) जो इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रजिस्टर से सम्बन्धित किसी विषय में स्वैच्छया मिथ्या अभ्यावेदन करता है; या
- (4) जिसका नाम रजिस्टर से हटा दिया गया है और वह, यथास्थिति, परा-चिकित्सक व्यवसायी के रूप में स्वैच्छया व्यवसाय करता है, वह दोनों में से, किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक हो सकेगी या जुर्माने से, जो पचास हजार रुपये तक हो सकेगा अथवा दोनों से दण्डित किया जायेगा और किसी पश्चातवर्ती अपराध के लिए दोनों में से, किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक हो सकेगी या जुर्माने से, जो एक लाख रुपये तक हो सकेगा अथवा दोनों से दण्डित किया जायेगा।
41. अपराधों का संज्ञान
- (1) कोई भी न्यायालय इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का संज्ञान परिषद के सचिव/रजिस्ट्रार द्वारा या परिषद द्वारा इस निमित परिषद द्वारा साधारण या विशेष आदेश द्वारा प्राधिकृत किया गया हो, लिखित में किए गए परिषद पर संज्ञान करेगा, अन्यथा नहीं।
- (2) प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट के न्यायालय से निम्न श्रेणी का कोई भी न्यायालय इस अधिनियम के अधीन किसी भी दण्डनीय अपराध का संज्ञान नहीं लेगा।
42. राज्य सरकार द्वारा निर्देश
- (1) राज्य सरकार, समय-समय पर परिषद को ऐसे निर्देश जारी कर सकेगी, जो सरकार की राय में इस अधिनियम के उद्देश्यों की पूर्ति में और उसके कृत्यों के निर्वहन के लिए सहायक है और वह परिषद किन्हीं, ऐसे निर्देशों को कार्यान्वित करने के लिए आबद्ध होगी।
- (2) उपधारा
- (1) के अधीन जारी निर्देशों में, कोई विनियम बनाने या पहले से बनाए गए किन्हीं विनियमों में संशोधन करने या उनको प्रतिसंहृत करने के लिए परिषद को दिए गए निर्देश भी सम्मिलित है।
- (3) यदि राज्य सरकार की राय में, परिषद ने इस धारा के अधीन जारी किए गए निर्देशों को प्रभावी करने में लगातार व्यतिक्रम किया है तो राज्य सरकार, परिषद को अपना पक्ष प्रस्तुत करने के लिए अवसर देने के पश्चात्, आदेश द्वारा परिषद को विघटित कर सकेगी और उसके पश्चात् एक नई परिषद का ऐसी तारीख से, जो सरकार द्वारा अधिसूचित की जाए, इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार गठन कर सकेगी।
- (4) जहां राज्य सरकार उपधारा
- (3) के अधीन परिषद का विघटन करने वाला कोई आदेश पारित करती है, वहां वह इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार परिषद के गठन के लम्बित रहने तक किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के किसी निकाय को परिषद के कार्यों का प्रबन्ध ग्रहण करने या ऐसे कृत्यों का निर्वहन के लिए प्राधिकृत कर सकेगी, जो राज्य सरकार द्वारा इस निमित विनिर्दिष्ट किए जाये।
43. सद्भावपूर्वक की गई कार्यवाही का संरक्षण
इस अधिनियम के अधीन सद्भावपूर्वक की गई कार्यवाही या किए जाने के लिए आपायित किसी बात की बाबत कोई बात, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही राज्य सरकार, परिषद, परिषद के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सदस्य, सचिव या परिषद के किसी अधिकारी या अन्य कर्मचारी के विरूद्ध नहीं होगी।
44. नियम बनाने की शक्ति
- (1) राज्य सरकार इस अधिनियम के उपबन्धों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, अधिसूचना द्वारा बना सकेगी।
- (2) विशिष्टतया पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना नियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबन्ध किया जा सकेगा; अर्थात् :- (क) धारा 30 की उपधारा
- (1) के अधीन अपील फाईल करने की रीति; (ख) धारा 30 की उपधारा
- (2) के अधीन अपील का निपटारा करने के लिए प्रक्रिया; (ग) धारा 33 के अधीन परिषद का बजट तैयार करने के लिए प्ररूप और समय; (घ) धारा 34 के अधीन परिषद की वार्षिक रिपोर्ट तैयार करने के लिए प्ररूप और समय; (ङ) धारा 35 के अधीन लेखा बही रखने जाने का प्ररूप और रीति; और (च) कोई अन्य विषय, जो विहित किए जाने के लिए अपेक्षित हो, या विहित किया जाए।
45. विनियम बनाने की शक्ति
- (1) परिषद, राज्य सरकार के पूर्वानुमोदन से इस अधिनियम के उपबन्धों को क्रियान्वित करने के लिए इस अधिनियम और तदधीन बनाए गए नियमों से संगत विनियम, अधिसूचना द्वारा बना सकेगी।
- (2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना नियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबन्ध किया जा सकेगा; अर्थात् :- (क) धारा 8 की उपधारा
- (1) के अधीन परिषद की बैठक व समय, स्थान उसकी प्रक्रिया और गणपूर्ति; (ख) धारा 12 की उपधारा
- (1) के अधीन परिषद के गैर सदस्य सहयोजित करने की रीति और प्रयोजन; (ग) धारा 13 की उपधारा
- (1) के अधीन किसी समिति की संरचना कालावधि और कृत्य; (घ) धारा 15 की उपधारा
- (1) के अधीन सचिव/रजिस्ट्रार अन्य कर्मचारी, नियुक्ति, सेवा शर्तें और पारिश्रमिक; (ङ) धारा 17 के अधीन सचिव-रजिस्ट्रार के कर्तव्यों के लिए विनियम; (च) धारा 20 तथा 21 के अधीन मान्यता प्राप्त अर्हताऐं अनूदत्त करने हेतु शिक्षा के न्यूनतम मानक; (छ) धारा 25 की उपधारा
- (1) के अधीन रजिस्टर का अनुरक्षण; (ज) धारा 26 की उपधारा
- (1) के अधीन रजिस्टर में नाम की प्रविष्टि के लिए रीति और फीस का संदाय; (झ) धारा 26 की उपधारा
- (3) के अधीन नाम प्रविष्टि करने के इंकार करने की रीति; (ञ) धारा 27 की उपधारा
- (1) के अधीन वृत्तिक आचरण और शिष्टाचार तथा सदाचार संहिता के मानदंड; (ट) धारा 28 की उपधारा
- (1) के अधीन अनुशासन समिति द्वारा जांच की रीति; (ठ) धारा 29 के अधीन पुनः प्रविष्टि करने की रीति उसकी फीस का संदाय, शर्त और अपेक्षाएं; (ड) परा-चिकित्सा व्यवसायों में से पांच सदस्यों के निर्वाचन करने की रीति; और (ढ) अध्यक्ष और उपाध्यक्ष की शक्तियां तथा कर्तव्य।
46. नियमों और विनियमों का विधान सभा में रखा जाना
इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम तथा विनियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र विधान सभा के समक्ष रखे जायेंगे।
47. कठिनाईयों को दूर करने की शक्ति
- (1) यदि इस अधिनियम के उपबन्धों को कार्यान्वित करने के लिए कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो राज्य सरकार राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, ऐसे उपबन्ध कर सकेगी, जो इस अधिनियम के उपबन्धों से असंगत न हो और जो इस कठिनाई को दूर करने के लिए आवश्यक प्रतीत हो : परन्तु यह कि ऐसा आदेश इस अधिनियम के प्रवृत्त होने की तारीख से दो वर्ष के बाद जारी नहीं किया जा सकेगा।
- (2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र विधान सभा के समक्ष रखा जाएगा।
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