The Rashtriya Vidhi Sansthan Vishwavidyalaya Adhiniyam, 1997
The Rashtriya Vidhi Sansthan Vishwavidyalaya Adhiniyam, 1997
1. Short title and commencement
(1) This Act may be called the Rashtriya Vidhi Sansthan Vishwavidyalaya Adhiniyam, 1997. (2) It shall come into force on such date as the State Government may, by notification, appoint.
2. Definitions
In this Act, unless the context otherwise requires,- (one) "Vidya Parishad" means the Vidya Parishad of the Institute; (two) "Director" means the Director of the Institute; (three) "Karya Parishad" means the Karya Parishad of the Institute; (four) "Sadharan Parishad" means the Sadharan Parishad of the Institute; (five) "Kul Sachiv" means the Kul Sachiv of the Institute; (six) "Regulations" means the Regulations of the Institute made under section 31; (seven) "Institute" means the Rashtriya Vidhi Sansthan Vishwavidyalaya established under section 3; and (eight) "Kuladhyaksh" means the Kuladhyaksh (Visitor) of the Institute.
3. Establishment and incorporation of the Rashtriya Vidhi Sansthan
(1) With effect from such date as the State Government may, by notification, appoint, there shall be established an Institute by the name of "Rashtriya Vidhi Sansthan Vishwavidyalaya" in the State of Madhya Pradesh. (2) The Institute shall be a body corporate by the aforesaid name, having perpetual succession and a common seal with power, subject to the provisions of this Act, to acquire and hold property and to contract, and shall, by the said name, sue or be sued. (3) All suits and other legal proceedings by or against the Institute shall be instituted, signed and verified by the Kul Sachiv or any other representative appointed by them in this behalf or by a person specifically authorised in their name and all orders in such suits and proceedings shall be issued to and served upon the Kul Sachiv. (4) The headquarters of the Institute shall be at Bhopal.
4. Objects of the Institute
The objects of the Institute shall be as follows: (one) to advance and disseminate learning and knowledge of law and legal processes and their role in national development; (two) to develop in the student and research scholars a sense of responsibility to serve society in the field of law by developing skills in regard to advocacy, legal services, legislation and law reforms; (three) to organise lectures, seminars, symposia and conferences to promote legal knowledge and to make law and legal processes effective instruments of social change; (four) to conduct examinations and confer degrees and other academic distinctions; and (five) to do all such things as are incidental, necessary or conductive to the attainment of all or any of the objects of the Institute.
5. Powers and functions of the Institute
The Institute shall have the following powers and functions: (one) to administer and manage the Institute and such centres for research, education and instruction as are necessary for the furtherance of the objects of the Institute; (two) to provide for instruction in such branches of knowledge or learning pertaining to law as the Institute may think fit and to make provision for research and for the advancement and dissemination of knowledge of law; (three) to undertake and sponsor research work on all aspects of law, justice and social development; (four) to prescribe qualifications for courses of study for degrees and other academic distinctions and to regulate the admission of students to the Institute; (five) to organise and undertake extra-mural teaching and extension services; (six) to hold examinations and to grant and confer degrees or other academic distinctions to and on persons, subject to such conditions as the Institute may determine, and to withdraw any such degrees, diplomas, certificates, or other academic distinctions for good and sufficient cause; (seven) to confer honorary degrees or other distinctions in the manner laid down by the Regulations; (eight) to fix, demand and receive fees and other charges; (nine) to establish, maintain and manage halls and hostels for the residence of students and to recognise places of residence for students and to withdraw such recognition; (ten) to institute and appoint persons to professorships, readerships, lectureships and any other teaching, academic or research posts required by the Institute; (eleven) to create technical, administrative, ministerial and other posts and to make appointments thereto; (twelve) to regulate and enforce discipline among the students and employees of the Institute and to take such disciplinary measures as may be deemed necessary; (thirteen) to institute and award fellowships, scholarships, prizes and medals.
6. संस्थान में अध्यापन
(1) संस्थान की उपाधि, उपाधि-पत्रों तथा प्रमाण-पत्रों के संबंध में समस्त मान्यता प्राप्त अध्यापन, साधारण परिषद के नियंत्रण के अध्यधीन रहते हुए संस्थान के अध्यापकों द्वारा, ऐसे पाठ्य-विवरण के अनुसार संचालित किया जाएगा, जैसा कि विनियमों द्वारा विहित किया जाए। (2) पाठ्यक्रम तथा पाठ्यचर्या और ऐसा अध्यापन आयोजित करने के लिए उत्तरदायी प्राधिकारी ऐसे होंगे जैसा कि विनियमों द्वारा विहित किया जाए। (3) धारा 6(1) में अध्यापक से अभिप्रेत है, आचार्य, उपाचार्य, सहायक आचार्य, प्राध्यापक तथा ऐसे अन्य व्यक्ति जो विद्या परिषद के अनुमोदन से संस्थान द्वारा संचालित महाविद्यालय या संस्था में जिसे संस्थान द्वारा संचालित किया जाता है, शिक्षण देने के लिये गवेषणा कार्य का संचालन करने के लिये नियुक्त किये गये हों।
7. संस्थान का कुलाध्यक्ष
(1) भारत का मुख्य न्यायमूर्ति संस्थान का कुलाध्यक्ष (विजिटर) होगा। (2) कुलाध्यक्ष को यह अधिकार होगा कि वह ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा, जिसे वह निदेश दे संस्थान, उसके भवनों, पुस्तकालयों तथा उपकरणों का और संस्थान द्वारा संधारित किसी संस्था का और संस्थान द्वारा संचालित परीक्षाओं, अध्यापन तथा किए गए अन्य कार्यों का निरीक्षण करवाएं और उसी रीति में संस्थान के प्रशासन तथा वित्त व्यवस्था से संबंधित किसी मामले के संबंध में जांच करवाए। (3) कुलाध्यक्ष प्रत्येक मामलों में ऐसा निरीक्षण या जांच कराए जाने के अपने आशय की सूचना संस्थान को देगा और संस्थान इस हेतु हकदार होगा कि वह एक ऐसा प्रतिनिधि नियुक्त करे जिसे यह अधिकार होगा कि वह ऐसे निरीक्षण या जांच में उपस्थित रहे तथा उसकी सुनवाई की जाए। (4) कुलाध्यक्ष, ऐसे निरीक्षण या ऐसी जांच के परिणाम के संदर्भ में निदेशक को संबोधित कर सकेगा और निदेशक, कुलाध्यक्ष के विचार और उसके साथ उस पर की जाने वाली कार्रवाई के संबंध में कुलाध्यक्ष द्वारा दी गई सलाह साधारण परिषद को संसूचित करेगा। (5) साधारण परिषद, निदेशक के माध्यम से कुलाध्यक्ष को, ऐसी कार्रवाई, यदि कोई हो, जो उसके द्वारा ऐसे निरीक्षण या जांच के संबंध में की जाना प्रस्तावित है या जो की गई है, संसूचित करेगा।
8. संस्थान के प्राधिकारी
संस्थान के प्राधिकारीगण निम्नलिखित होंगे,- (1) साधारण परिषद ; (2) कार्य परिषद ; (3) विद्या परिषद ; (4) वित्त समिति; और (5) ऐसे अन्य प्राधिकारी जो विनियमों द्वारा विहित किए जाएं।
9. साधारण परिषद
संस्थान की एक साधारण परिषद होगी जिसमें निम्नलिखित सदस्य होंगे, अर्थात:-(एक) मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायमूर्ति; (दो) मध्यप्रदेश सरकार के विधि विभाग का भारसाधक मंत्री; (तीन) मध्यप्रदेश सरकार के उच्च शिक्षा विभाग का भारसाधक मंत्री; (चार) भारत का महान्यायवादी; (पांच) मध्यप्रदेश सरकार का मुख्य सचिव; (छह) मध्यप्रदेश का महाधिवक्ता; (सात) मध्यप्रदेश सरकार के विधि और विधायी कार्य विभाग का भार साधक सचिव; (आठ) मध्यप्रदेश सरकार के वित्त विभाग का भार साधक सचिव; (नौ) मध्यप्रदेश सरकार के उच्च शिक्षा विभाग का भार साधक सचिव; (दस) मध्यप्रदेश राज्य विधिज्ञ परिषद (बारकाउन्सिल) का अध्यक्ष; (ग्यारह) भारत सरकार की विधिज्ञ परिषद (बार काउन्सिल ऑफ इंडिया) का अध्यक्ष; (बारह) निदेशक, राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी, भोपाल; (तेरह) निदेशक, भारत का राष्ट्रीय विधि विद्यालय,विश्वविद्यालय, बंगलौर (डायरेक्टर, नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया, यूनिवर्सिटी बंगलौर); (चौदह) विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का अध्यक्ष ( चेयर पर्सन); (पंद्रह) कुलाध्यक्ष द्वारा नाम निर्देशित तीन विख्यात वकील; (सोलह) केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में विधि संकाय के संकायाध्यक्षों (डीन) में से विधि संकाय का एकसंकायाध्यक्ष (डीन) जो कुलाध्यक्ष द्वारा नाम निर्देशित किया जाएगा; (सत्रह) निदेशक।
10. अध्यक्ष तथा सचिव
(1) मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायमूर्ति, साधारण परिषद का अध्यक्ष होगा। (2) संस्थान का निदेशक, साधारण परिषद का सचिव होगा।
11. साधारण परिषद के सदस्यों की पदावधि
(1) साधारण परिषद के नामनिर्देशित सदस्यों की पदावधि उपखण्ड (2) तथा (3) के अध्यधीन रहते हुए, पांच वर्ष होगी। (2) जहां कोई सदस्य उसके द्वारा धारित पद या नियुक्ति के कारण साधारण परिषद का सदस्य हो जाता है या वह नामनिर्देशित सदस्य है, वहां उसकी सदस्यता तब समाप्त हो जाएगी जब यथास्थिति उसका ऐसा पद धारण करना या उसकी ऐसी नियुक्ति समाप्त हो जाए या उसका नामनिर्देशन वापस ले लिया जाए या रद्द कर दिया जाए। (3) साधारण परिषद का कोई सदस्य उस दशा में नही रह जाएगा यदि वह त्याग देता है या विकृतचित्त या दिवालिया हो जाता है या वह नैतिक अधमता अन्तर्वलित करने वाले किसी दाण्डिक अपराध के लिए सिद्धदोष ठहरा दिया जाता है, या यदि निदेशक से भिन्न कोई सदस्य संस्थान में पूर्णकालिक नियुक्ति स्वीकार कर लेता है या यदि वह साधारण परिषद के सभापति की अनुमति के बिना अनुपस्थित रहता है या संस्थान के हितों के विरूद्ध कार्य करता है। (4) साधारण परिषद का कोई सदस्य, अध्यक्ष को संबोधित पत्र द्वारा अपना पद त्याग सकेगा और ऐसा त्याग-पत्र, जैसे ही अध्यक्ष द्वारा उसे स्वीकार कर लिया जाता है, प्रभावी हो जाएगा। (5) साधारण परिषद मे कोई रिक्ति उसे भरने के लिए हकदार संबंधित प्राधिकारी द्वारा किसी व्यक्ति की, यथास्थिति, नियुक्ति या नामनिर्देशन द्वारा भरी जाएगी और इस प्रकार नियुक्त या नामनिर्देशित किया गया व्यक्ति केवल उस समय तक पद धारण करेगा जब तक वह सदस्य, जिसके स्थान पर वह नियुक्त या नामनिर्देशित किया गया है यदि ऐसी रिक्ति नही होती तो पद धारण करता।
12. साधारण परिषद की शक्तियाँ
साधारण परिषद की निम्नलिखित शक्तियां होंगी, अर्थात:-(1) धारा 5 में अधिकथित संस्थान की शक्तियों तथा कृत्यों का, सिवाय ऐसी शक्तियों के, जो संस्थान के किसी अन्य प्राधिकारी या अधिकारी को दी गई है, प्रयोग करना; (2) समय-समय पर संस्थान की व्यापक नीतियों तथा कार्यक्रम का पुनर्विलोकन करना और संस्थान के सुधार तथा विकास के लिए उपाय करना; (3) वार्षिक रिपोर्ट, वित्तीय प्राक्कलन, वार्षिक लेखे ओर ऐसे लेखाओं पर संपरीक्षा रिपोर्ट पर विचार करना और संकल्प पारित करना; (4) संस्थान के निदेशक या उसकी किसी समिति या उसकी उप समिति या उसके किसी एक या अधिक सदस्यों या किसी कर्मचारी को अपनी समस्त शक्तियां या उनमें से कोई शक्ति प्रत्यायोजित करना; और (5) ऐसे अन्य कृत्य करना जो संस्थान के दक्ष तथा प्रशासन के लिये वह आवश्यक समझे।
13. साधारण परिषद का सम्मिलन
(1) साधारण परिषद वर्ष में कम से कम एक बार सम्मिलन करेगी और उसके सम्मिलनों के लिए कम से कम पन्द्रह दिन की सूचना दी जाएगी।
14. कार्य परिषद्
(1) कार्य परिषद् संस्थान का मुख्य कार्यकारी निकाय होगा। (2) संस्थान का प्रशासन, प्रबंध तथा नियंत्रण और उसकी आय कार्य परिषद में निहित होगी जो संस्थान की सम्पत्ति तथा निधियों को नियंत्रित और प्रशासित करेगी।
15. कार्य परिषद् की सदस्यता
(1) कार्य परिषद् में निम्नलिखित सदस्य होंगे, अर्थात् :- (एक) निदेशक; (दो) साधारण परिषद् के एक सदस्य, जो साधारण परिषद् द्वारा नामनिर्देशित किए जाएंगे; (दो-क) मध्यप्रदेश सरकार का मुख्य सचिव; (दो-ख) मध्यप्रदेश का महाधिवक्ता; (तीन) मध्यप्रदेश सरकार के विधि और विधायी कार्य विभाग का भारसाधक सचिव; (चार) मध्यप्रदेश सरकार के वित्त विभाग का भारसाधक सचिव; (पांच) मध्यप्रदेश सरकार के उच्च शिक्षा विभाग का भारसाधक सचिव; (छह) राज्य विधिज्ञ परिषद् मध्यप्रदेश का अध्यक्ष; (सात) संस्थान के दो पूर्णकालिक अध्यापक, जो चक्रानुक्रम से ज्येष्ठता के आधार पर होंगे। (2) निदेशक, कार्य परिषद का अध्यक्ष होगा।
16. कार्य परिषद् की पदावधि
(1) जहां कोई व्यक्ति उसके द्वारा धारित पद या नियुक्ति के कारण कार्य परिषद् का सदस्य हो जाता है वहां उसकी सदस्यता तब समाप्त हो जाएगी जबकि उसका ऐसा पद धारण करना या उसकी ऐसी नियुक्ति समाप्त हो जाए। (2) कार्य परिषद् का कोई सदस्य उस दशा में सदस्य नहीं रह जाएगा यदि वह पद त्याग देता है या विकृति-चित्त या दिवालिया हो जाता है या वह नैतिक अधमता अंतर्वलित करने वाले किसी दाण्डिक अपराध के लिए सिद्धदोष ठहरा दिया जाता है या यदि निदेशक या संकाय के किसी सदस्य से भिन्न कोई सदस्य संस्थान में पूर्णकालिक नियुक्ति स्वीकार कर लेता है या यदि वह कार्य परिषद् के लगातार तीन सम्मिलनों में कार्य परिषद् के सभापति की अनुमति के बिना अनुपस्थित रहता है या संस्थान के हितों के विरुद्ध कार्य करता है। (3) जब तक कि कार्य परिषद् के सदस्य के रूप में उनकी सदस्यता उपधारा (1) या (2) में यथा उपबन्धित किए गए अनुसार पूर्व में ही समाप्त नहीं हो जाती है, कार्य परिषद् के सदस्य उस तारीख से, जिसको कि वे कार्य परिषद् के सदस्य हो जाते हैं, तीन वर्ष समाप्त हो जाने पर अपनी सदस्यता त्याग देंगे किन्तु वे यथास्थिति पुनर्नामनिर्देशन या पुनर्नियुक्ति के लिए पात्र होंगे। (4) कार्य परिषद् के पदेन सदस्य से भिन्न कार्य परिषद का कोई सदस्य कार्य परिषद के अध्यक्ष को संबोधित पत्र द्वारा अपना पद त्याग सकेगा ओर ऐसा त्याग-पत्र, जैसे ही कार्य परिषद् के अध्यक्ष द्वारा उसे स्वीकार कर लिया जाता है, प्रभावी हो जाएगा। (5) कार्य परिषद में कोई रिक्ति उसे भरने के लिये हकदार संबंधित प्राधिकारी द्वारा किसी व्यक्ति की यथास्थिति नियुक्ति या नामनिर्देशन द्वारा भरी जाएगी और जिस पद में रिक्ति हुई है उस पद की कालावधि समाप्त हो जाने पर ऐसी नियुक्ति या नामनिर्देशन प्रभावी नहीं रह जाएगा।
17. कार्य परिषद् की शक्तियां तथा कृत्य
धारा 12 के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, कार्य परिषद् की निम्नलिखित शक्तियां ओर कृत्य होंगे:- (एक) विद्या परिषद की सिफारिशों पर विचार करने के पश्चात् संस्थान में अध्यापन पदों को सृजित करना, समाप्त करना या वर्गीकृत करना, और उनसे संलग्न अर्हताएं, उपलब्धियां तथा कर्तव्य अवधारित करना; (दो) समय-समय पर कुलसचिव, पुस्तकालयाध्यक्ष, आचार्य, सह-आचार्य, सहायक आचार्य और अध्यापन कर्मचारीवृन्द के अन्य सदस्य, जैसा कि आवश्यक हो, विनियमों द्वारा इस प्रयोजन के लिए गठित की गई चयन समिति की सिफारिशों पर नियुक्ति करना: परन्तु- (क) किसी अधिसंख्य पद (सुपरन्यूमरी पोस्ट) पर; या (ख) उच्च विद्या संबंधी विशिष्टता, विख्यात तथा वृत्तिक कुशलता प्राप्त व्यक्ति की आचार्य के पद पर, नियुक्ति करने के लिये कोई चयन समिति गठित करना आवश्यक नहीं होगा; (तीन) प्रशासनिक, लिपिकीय तथा अन्य आवश्यक पद सृजित करना, ऐसे पदों की न्यूनतम अर्हताएं तथा उनकी उपलब्धियां अवधारित करना; (चार) संस्थान के वित्त लेखाओं, विनिधानों, संपत्ति कामकाज और अन्य समस्त प्रशासनिक कार्यकलापों की व्यवस्था करना और विनियमित करना और ऐसे प्रयोजन के लिये ऐसे अभिकर्ता नियुक्त करना, जैसा कि वह उचित समझे; (पांच) संस्थान के किसी धन का, जिसके अन्तर्गत कोई अनुपयोजित धन भी आता है ऐसे स्टाक, निधियों, अंशों या प्रतिभूतियों में, जैसा कि वह समय-समय पर उचित समझे या भारत में स्थावर सम्पत्ति के क्रय में विनिधान करना और ऐसे विनिधानों में इसी प्रकार की शक्ति के साथ समय-समय पर फेरफार करना; (छह) संस्थान की ओर से किसी जंगम या स्थावर सम्पत्ति का अन्तरण करना या अन्तरण प्रतिग्रहीत करना; (सात) संस्थान की ओर से संविदाएं करना, उनमें फेरफार करना, उनका कार्यान्वयन करना और उन्हें रद्द करना और उस प्रयोजन के लिये ऐसे अधिकारी नियुक्त करना, जैसा कि वह उचित समझे; (आठ) संस्थान का कार्य क्रियान्वित करने के लिये आवश्यक भवन, परिसर, फर्नीचर तथा उपकरण और अन्य साधन की व्यवस्था करना; (नौ) संस्थान के ऐसे अधिकारियों, अध्यापकों, छात्रों और संस्थान के कर्मचारियों को, जो कि किसी कारण से व्यथित अनुभव करते हैं, उनकी व्यथाएं ग्रहण करना, उन्हें न्यायनिर्णीत करना और उन्हें दूर करना; (दस) विद्या परिषद से परामर्श करके परीक्षक तथा अनुसीमक(मोडरेटर) नियुक्त करना और यदि आवश्यक हो तो उन्हें हटाना ओर उनकी फीस, उपलब्धियां तथा यात्रा और अन्य भत्ते नियत करना; (ग्यारह) संस्थान के लिये सामान्य मुद्रा का चयन करना और उस मुद्रा की अभिरक्षा की व्यवस्था करना; (बारह) अपनी शक्तियों में से किसी शक्ति को, सिवाय विनियम बनाने की शक्ति के, किसी अधिकारी या प्राधिकारी को या तो अस्थायी रूप से या स्थायी रूप से प्रत्यायोजित करना; और (तेरह) ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग करना और ऐसे अन्य कर्तव्यों का निर्वहन करना जो उसे इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन उसे प्रदत्त की जाएं या उस पर अधिेपित किए जाएं।
18. स्थानों का आरक्षण
कार्य परिषद विनियम द्वारा मध्यप्रदेश राज्य के निवासियों और अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों तथा अन्य पिछड़े वर्गों के सदस्यों के लिये स्थानों का आरक्षण हेतु उपबंध कर सकेंगी:- स्पष्टीकरण:- शब्द "अनुसूचित जातियों", अनुसूचित जनजातियों" तथा "अन्य पिछड़े वर्गों "का वही अर्थ होगा जो मध्यप्रदेश लोक सेवा (अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों ओर अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण) अधिनियम, 1994 (क्रमांक 21 सन् 1994) में उनके लिए दिया गया है।
19. कार्य परिषद् के सम्मिलन
(1) कार्य परिषद् का सम्मिलन तीन मास में कम से कम एक बार होगा। (2) कार्य परिषद् का अध्यक्ष कार्य परिषद के सम्मिलन की अध्यक्षता करेगा ओर उसकी अनुपस्थिति में उपस्थित सदस्य, सम्मिलन की अध्यक्षता करने के लिये अपने में से एक व्यक्ति को निर्वाचित करेंगे। (3) कार्य परिषद् के किसी सम्मिलन में उसके चार सदस्यों से गणपूर्ति होगी। (4) कार्य परिषद् के प्रत्येक सदस्य को एक मत देने का अधिकार होगा और यदि कार्य परिषद् द्वारा अवधारित किए जाने वाले किसी प्रश्न पर बराबर-बराबर मत हैं तो कार्य परिषद् के अध्यक्ष को या यथास्थिति, उस सम्मिलन की अध्यक्षता करने वाले सदस्य को उसके अतिरिक्त, एक निर्णायक मत होगा। (5) यदि कार्य परिषद् द्वारा तुरन्त कार्रवाई की जाना आवश्यक हो तो निदेशक, कार्य परिषद् के सदस्यों में कागज-पत्रों के परिचालन द्वारा कामकाज का संचालन किया जाना अनुज्ञात कर सकेगा। की जाने के लिये प्रस्तावित कार्रवाई तब तक नहीं की जाएगी जब तक कि कार्य परिषद के सदस्यों के बहुमत द्वारा उसकी सहमति नहीं दे दी जाती है। इस प्रकार की गई कार्रवाई की संसूचना कार्य परिषद् के समस्त सदस्यों को तुरन्त दी जाएगी संबंधित कागज-पत्र कार्य परिषद् के आगामी सम्मिलन में उसकी पुष्टि के लिये रखे जाएंगे।
20. स्थायी समिति का गठन ओर तदर्थ समितियों की नियुक्ति
(1) इस अधिनियम के या इस संबंध में बनाए गए विनियमों के उपबंधों के अध्यधीन रहते हुए कार्य परिषद् संकल्प द्वारा, ऐसी स्थायी समितियां, और तदर्थ समितियां, ऐसे प्रयोजनों के लिये तथा ऐसी शक्तियों सहित, जैसा कार्य परिषद् उचित समझे, संस्थान की किसी शक्ति का प्रयोग करने या संस्थान के किसी कृत्य का निर्वहन करने या संस्थान से संबंधित किसी विषय में जांच करने, उस पर रिपोर्ट देने या सलाह देने के लिये गठित कर सकेगी। (2) कार्य परिषद किसी स्थायी समिति या किसी तदर्थ समिति के लिये ऐसे व्यक्ति सहयोजित कर सकेगी जैसा कि वह उपयुक्त समझे और उन्हें कार्य परिषद् के सम्मिलनों में उपस्थित रहने के लिये अनुज्ञाप्त कर सकेगी।
21. विद्या परिषद्
विद्या परिषद् संस्थान की विद्या संबंधी निकाय होगी और इस अधिनियम के उपबंधों ओर विनियमों के उपबंधों के अध्यधीन रहते हुए उसे संस्थान के शिक्षण, शिक्षा और परीक्षा मानकों पर नियंत्रण तथा सामान्य विनियमन करने की शक्ति होगी ओर वह उन्हें बनाए रखने के लिए भी उत्तरदायी होगी और वह ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग तथा ऐसी अन्य कर्तव्यों का निर्वहन करेगी जो उसे इस अधिनियम या विनियमों द्वारा प्रदत्त की जाएं या उस पर अधिरोपित किए जाएं. उसे यह अधिकार होगा कि वह समस्त विद्या संबंधी मामलों पर कार्य परिषद् को सलाह दें,
22. विद्या परिषद् की सदस्यता
(1) विद्या परिषद् में निम्नलिखित सदस्य होंगे, अर्थात:- (एक) निदेशक जो उसका अध्यक्ष होगा; (दो) तीन व्यक्ति जो विख्यात शिक्षाविदों या विख्यात साहित्यिक व्यक्ति (मेन आफ लेटर्स) या विद्धत वृत्तियों के सदस्यों या प्रख्यात सामाजिक व्यक्तियों में से, जो संस्थान की सेवा में नही हैं साधारण परिषद् के परामर्श से अध्यक्ष द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाएंगे; (तीन) मध्यप्रदेश सरकार के विधि और विधायी कार्य विभाग का भारसाधक सचिव; (चार) राज्य विधिज्ञ परिषद् का एक नामनिर्दिष्टिती; (पांच) संस्थान के समस्त विभागाध्यक्ष; (छह) विभागाध्यक्षों से भिन्न समस्त आचार्य, यदि कोई हों; (सात) अध्यापन कर्मचारीवृन्द के दो सदस्य जो संस्थान के सह आचार्यों तथा सहायक आचार्यों के प्रतिनिधि होंगेहः (आठ) भारत की विधिज्ञ परिषद् (बार काउन्सिल ऑफ इंडिया) का एक नामनिर्दिष्टिती; परन्तु संस्थान का कोई कर्मचारी प्रवर्ग (दो) के अधीन नामनिर्दिष्ट किये जाने का पात्र नहीं होगा. (2) पदेन सदस्यों से भिन्न सदस्यों की पदावधि तीन वर्ष होगी: परन्तु प्रथम विद्या परिषद् की अवधि पांच वर्ष होगी.
23. विद्या परिषद् की शक्तियां तथा उसके कर्तव्य
इस अधिनियम के या विनियमों के उपबंधों के अध्यधीन रहते हुए विद्या परिषद् को उसमें विनहित की गई अन्य समस्त शक्तियों के अतिरिक्त निम्नलिखित शक्तियां होंगी अर्थात:- (एक) ऐसे किसी विषय पर जो साधारण परिषद् या कार्य परिषद् द्वारा उसे निर्दिष्ट या प्रत्यायोजित किया जाए रिपोर्ट करना; (दो) संस्थान में अध्ययन पदों के सृजन, समाप्ति या वर्गीकरण और उनसे संबद्ध अर्हताओं, उपलब्धियों तथा कर्तव्यों के संबंध में कार्य परिषद् को सिफारिशें करना; (तीन) संकायों के गठन के लिये स्कीमें बनाना तथा उनको उपान्तरित करना या पुनरीक्षित करना और ऐसे संकायों को उनके अलग-अलग संबंधित विषय सौंपना और किसी संकाय को समाप्त या उपविभाजित करने या एक संकाय को दूसरे संकाय के साथ संयोजित करने की समीचीनता के संबंध में भी कार्य परिषद् को रिपार्ट करना; (चार) संस्थान में नामांकित किए गए व्यक्तियों से भिन्न व्यक्तियों के शिक्षण तथा परीक्षा के लिये विनियमों के माध्यम से व्यवस्था करना; (पांच) संस्थान के भीतर गवेषणा को प्रोन्नत करना और ऐसी गवेषणा पर, समय-समय पर, रिपोर्ट दिए जाने की अपेक्षा करना; (छह) संकायों द्वारा प्रस्तुत किये गये प्रस्तावों पर विचार करना; (सात) संस्थान में प्रवेश हेतु समितियां नियुक्त करना; (आठ) अन्य विश्वविद्यालयों तथा संस्थाओं के उपाधि-पत्रों तथा उपाधियों को मान्यता देना और उनकी समतुल्यता संस्थान के उपाधि-पत्रों तथा उपाधियों के संबंध में अवधारित करना; (नौ) साधारण परिषद् द्वारा स्वीकृत किन्हीं शर्तों के अध्यधीन रहते हुए अध्येतावृत्ति, छात्रवृत्ति तथा अन्य पुरस्कारों के लिए प्रतियोगिताओं के समय, ढंग तथा शर्तें नियत करना तथा उन्हें प्रदान करना. (दस) परीक्षकों की नियुक्ति हो तथा यदि आवश्यक हो तो उनके हटाए जाने और उनकी फीस, उपलब्धियां तथा यात्रा तथा अन्य व्यय नियत करने के बारे में कार्य परिषद् को सिफारिशें करना; (ग्यारह) परीक्षाएं संचालित करने हेतु व्यवस्था करना ओर उनके आयोजन के लिये तारीखें नियत करना; (बारह) विभिन्न परीक्षाओं के परिणाम घोषित करना या ऐसा करने के लिये समितियां या अधिकारी नियुक्त करना और उपाधियों, सम्मानों, उपाधि-पत्रों, अनुज्ञापत्रों (लाइसेंस), अभिधानों(टाईटल्स) ओर सम्मान के प्रतीकों को प्रदान किए जाने या किए जाने के संबंध में सिफारिशें करना; (तेरह) वृत्तिका, छात्रवृत्ति पदक तथा पुरस्कार देना और अन्य अवार्ड (पुरस्कार) विनियमों या ऐसी अन्य शर्तों के अनुसार देना जो ऐसे अवार्ड (पुरस्कार) से सम्बद्ध की जाए; (चौदह) विहित की गई या सिफारिश की गई पाठ्य-पुस्तकों की सूची प्रकाशित करना और विहित किए गए अध्ययन पाठ्य-विवरण प्रकाशित करना; (पन्द्रह) ऐसे प्रारूप तथा रजिस्टर तैयार करना जो विनियमों द्वारा समय-समय पर, विहित किए जाएं; और (सोलह) विद्या संबंधी मामलों के संबंध में समस्त ऐसे कर्तव्यों का पालन करना और ऐसे समस्त कार्य करना जो इस अधिनियम तथा विनियमों के उपबंधों के उचित कार्यान्वयन के लिये आवश्यक है.
24. विद्या परिषद् के सम्मिलन
(1) विद्या परिषद्, उतनी बार, जितनी कि आवश्यक है, सम्मिलन करेगी किन्तु किसी एक शैक्षणिक वर्ष के दौरान कम से कम दो बार सम्मिलन करेगी. (2) विद्या परिषद् का अध्यक्ष, विद्या परिषद् के सम्मिलन की अध्यक्षता करेगा और उसकी अनुपस्थिति में सम्मिलन की अध्यक्षता करने के लिए उपस्थित सदस्य अपने में से एक व्यक्ति को निर्वाचित करेंगे. (3) विद्या परिषद् के सम्मिलन के लिए विद्या परिषद् के सदस्यों की कुल संख्या के आधे सदस्यों से गणपूर्ति होगी. (4) विद्या परिषद् के प्रत्येक सदस्य को, एक मत देने का अधिकार होगा और यदि विद्या परिषद् द्वारा अवधारित किए जाने वाले किसी प्रश्न पर बराबर-बराबर मत है तो विद्या परिषद् के अध्यक्ष को या यथास्थिति, सम्मिलन की अध्यक्षता करने वाले सदस्य को, उसके अतिरिक्त, एक निर्णायक मत होगा. (5) यदि विद्या परिषद् द्वारा तुरन्त कार्रवाई की जाना आवश्यक हो जाता है तो निदेशक, विद्या परिषद् के सदस्यों में कागज पत्रों के परिचालन द्वारा कामकाज का संचालन किया जाना अनुज्ञात कर सकेगा. की जाने के लिये प्रस्तावित कार्रवाई तब तक नहीं की जाएगी जब तक कि इस पर विद्या परिषद् के सदस्यों के बहुमत द्वारा उसकी सहमति नहीं दे दी जाती है. इस प्रकार की गई कार्रवाई की संसूचना विद्या परिषद् के समस्त सदस्यों को तुरन्त दी जाएगी. संबंधित कागज-पत्र विद्या परिषद् के आगामी सम्मिलन में उसकी पुष्टि के लिए रखे जाएंगे
25. वित्त समिति
(1) एक वित्त समिति होगी जिसमें निम्नलिखित होंगे; अर्थात:- (एक) निदेशक; (दो) एक सदस्य जो कार्य परिषद् द्वारा अपने सदस्यों में से नामनिर्दिष्ट किए जाएंगे; (तीन) मध्यप्रदेश सरकार के वित्त विभाग और उच्च शिक्षा विभाग के (उप सचिव से अनिम्न पद श्रेणी वाले) एक-एक अधिकारी जो राज्य सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाएंगे; (तीन-क) एक सदस्य जो साधारण परिषद् द्वारा नाम निर्देशित किया जाएगा; (2) वित्त समिति के सदस्य तीन वर्ष की अवधि के लिये पद धारण करेंगे. (3) वित्त समिति की शक्तियां, कर्तव्य तथा कृत्य निम्नानुसार होंगे, अर्थात:- (एक) संस्थान के वार्षिक बजट का परीक्षण और उसकी समीक्षा करना और वित्तीय मामलों में कार्य परिषद् को सिफारिशें करना; (दो) नवीन व्ययों के लिए समस्त प्रस्तावों पर विचार करना और कार्य परिषद् को सिफारिशें करना; (तीन) लेखाओं के नियतकालिक विवरणों पर विचार करना और संस्थान की वित्तीय स्थिति का समय समय पर पुनर्वीलोकन करना और पुनर्विनियोजन विवरणों तथा संपरीक्षा रिपोर्टों पर विचार करना और कार्य परिषद् को सिफारिशें कराना; (चार) संस्थान पर प्रभाव डालने वाले किसी वित्तीय विषय पर या तो स्वप्रेरणा से या कार्य परिषद् या निदेशक द्वारा निर्देश किए जाने पर अपने विचार प्रस्तुत करना ओर कार्य परिषद् को सिफारिशें करना; (4) वित्त समिति छ: मास में कम से कम एक बार अपने सम्मिलन करेगी वित्त समिति के तीन सदस्यों से गणपूर्ति होगी. (5) निदेशक वित्त समिति के सम्मिलनों की अध्यक्षता करेगा तथा उसकी अनुपस्थिति में सम्मिलन की अध्यक्षता करने के लिये, उपस्थित सदस्य अपने में से एक व्यक्ति को निर्वाचित करेंगे.
26. संस्था के अधिकारीगण
संस्था के निम्नलिखित अधिकारी होंगे अर्थात:- (एक) निदेशक; (दो) विभागाध्यक्ष; (तीन) कुलसचिव; और (चार) ऐसे अधिकारी, जैसा कि विनियमों द्वारा विहित किया जाये.
27. निदेशक
(1) संस्थान का निदेशक, इस निमित्त बनाए गए विनियमों के अनुसार साधारण परिषद् द्वारा नियुक्त किया जाएगा: परन्तु प्रथम निदेशक, साधारण परिषद् के अध्यक्ष द्वारा नियुक्त किया जाएगा. (2) निदेशक पांच वर्ष की अवधि के लिए पद धारण करेगा, जो साधारण परिषद् द्वारा इस प्रभाव के संकल्प पारित कर दिए जाने पर नवीकरणीय होगी, उसकी अवधि के समाप्त हो जाने पर वह तब तक अपने पद पर बना रहेगा जब तक कि उसका उत्तराधिकारी नियुक्त नहीं कर दिया जाता है और वह अपना पद ग्रहण नहीं कर लेता है. (3) निदेशक- (एक) यह सुनिश्चित करेगा कि इस अधिनियम और विनियमों के उपबंधों का सम्यक् रूप से पालन किया जाता है; (दो) को संस्थान में उचित रूप से अनुशासन बनाए रखने संबंधी समस्त शक्तियां प्राप्त होंगी. (4) यदि निदेशक की राय में, कोई आपात स्थिति उत्पन्न हो गई है जिसमें यह अपेक्षित है कि तुरन्त कार्रवाई की जाए तो वह ऐसी कार्रवाई करेगा जैसा कि वह आवश्यक समझे और उसकी रिपोर्ट उस प्राधिकारी के, जो साधारण स्थिति में उस विषय में कार्रवाई करता, आगामी सम्मिलन में उसकी पुष्टि हेतु रखेगा.
28. विभागाध्यक्ष
(1) संस्थान के विभागों में से प्रत्येक विभाग के लिए एक विभागाध्यक्ष होगा. (2) विभागाध्यक्षों की शक्तियां, उनके कृत्य, नियुक्तियां और सेवा शर्ते ऐसी होंगी, जैसा कि विनियमों द्वारा विहित किया जाए,
29. कुल सचिव
(1) कुलसचिव संस्थान का पूर्णकालिक अधिकारी होगा, कुलसचिव की पदावधि तथा सेवा-शर्ते ऐसी होंगी जैसा कि विनियमों द्वारा विहित किया जाए.
30. चयन समिति
(1) कार्य परिषद-संस्थान में आचार्यों, सह आचार्यों तथा अन्य अध्यापकों के पदों पर नियुक्ति करने के लिए कार्य परिषद को सिफारिशें करने हेतु एक चयन समिति गठित करेगी. (2) चयन समिति में निम्नलिखित सदस्य होंगे,- (एक) निदेशक, जो समिति का अध्यक्ष होगा; (दो) संबंधित विभाग का विभागाध्यक्ष परन्तु वह उस पद से, जिस पद के लिये चयन किया जाना है निम्न पद धारण नही करता हो; (तीन) आचार्यों, सह आचार्यों तथा सहायक आचार्यों का चयन करने के लिये तीन विशेषज्ञ, जो विद्या परिषद द्वारा सिफारिश की गई तथा कार्य परिषद द्वारा अनुमोदित की गई नामों की तालिका में से निदेशक द्वारा नामनिर्देशित किये जाएंगे; (3) चयन समिति का सम्मिलन, जब कभी आवश्यक हो, निदेशक द्वारा बुलाया जाएगा. तीन सदस्यों से गणपूर्ति होगी.
31. विनियम
(1) इस अधिनियम के उपबंधों के अध्यधीन रहते हुए कार्य परिषद को उसमें विनिहित की गई अन्य समस्त शक्तियों के अतिरिक्त, संस्थान के कार्यकलापों के प्रशासन तथा प्रबंध के लिये उपबंध करने हेतु विनियम बनाने की शक्ति भी होगी: परन्तु कार्य परिषद ऐसा कोई विनियम जो संस्थान के किसी प्राधिकारी की हैसियत, शक्तियों या उसके गठन को प्रभावित करता है तब तक नही बनाएगी जब तक कि ऐसे प्राधिकारी को प्रस्तावित तब्दीलियों पर लिखित में राय अभिव्यक्त करने का एक अवसर नही दे दिया गया है और इस प्रकार अभिव्यक्ति की गई किसी राय पर कार्य परिषद द्वारा विचार किया जाएगा. परन्तु यह और भी कि कार्य परिषद निम्नलिखित समस्त या किन्हीं विषयों पर प्रभाव डालने वाला कोई विनियम विद्या परिषद की पूर्व सहमति के बिना नही बनाएगी, और न ही उसे संशोधित या निरस्त करेगी, अर्थात:- (एक) विद्या परिषद का गठन, उसकी शक्तियां तथा कर्तव्य; (दो) संस्थान के संबंध में अध्यापन पाठ्यक्रम तथा विद्या संबंधी कायक्रमों को आयोजित करने के लिये जिम्मेदार प्राधिकारी; (तीन) उपाधियों, उपाधिपत्रों, प्रमाणपत्रों और विद्या संबंधी अन्य विशिष्टताओं का प्रत्याहरण; (चार) संकायों, विभागों, छात्र निवासों तथा संस्थाओं की स्थापना और उनका समाप्त किया जाना; (पांच) अध्ययतावृत्तियां, छात्रवृत्तियां, अध्ययनवृत्तियां, छात्र-सहायता वृत्तियां पदक, और पारितोषिक संस्थित करना; (छह) परीक्षकों की नियुक्ति की शर्तें तथा ढंग या परीक्षाओं या अन्य अध्ययन पाठ्यक्रमों का संचालन या उसके मानक; (सात) छात्रों के नामांकन या प्रवेश का ढंग; (आठ) अन्य परीक्षाओं को संस्थान की परीक्षाओं के समतुल्य मान्यता प्रदान करना. (2) विद्या परिषद को यह शक्ति होगी कि वह उपधारा (1) के खण्ड (एक) से (आठ) तक में विनिर्दिष्ट समस्त मामलों पर और उससे संसक्त या अनुषांगिक मामलों पर विनियम प्रस्तावित करे; (3) जहां विद्या परिषद द्वारा प्रस्तावित किसी विनियम का प्रारूप कार्य परिषद ने नामंजूर कर दिया है वहां विद्या परिषद कुलाध्यक्ष को अपील कर सकेगी और कुलाध्यक्ष, आदेश द्वारा यह निदेश दे सकेगा कि प्रस्तावित विनियम, साधारण परिषद के आगामी सम्मिलन के समक्ष अनुमोदन के लिए रखा जाए और साधारण परिषद के ऐसे अनुमोदन के लंबित रहने तक वह विनियम ऐसी तारीख जो ऐसे आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए प्रभावी होगा: परन्तु ऐसे विनियम को यदि साधारण परिषद के ऐसे सम्मिलन में अनुमोदित नहीं किया जाता है तो वह प्रभावी नहीं रह जाएगा. (4) कार्य परिषद द्वारा बनाए गए समस्त विनियम साधारण परिषद के समक्ष उसके आगामी सम्मिलन में प्रस्तुत किए जाएंगे और साधारण परिषद को यह शक्ति होगी कि वह कार्य परिषद द्वारा बनाए गए किसी विनियम को संशोधित या रद कर दे: परन्तु ऐसे विनियम, जहां तक कि वे धारा 33 में प्रगणित किए गए अनुसार भविष्य निधि, उपदान तथा पेंशन से संबंधित है, साधारण परिषद द्वारा अनुमोदन के पश्चात ही प्रवृत्त होंगे.
32. पुनर्विलोकन आयोग की नियुक्ति
(1) कुलाध्यक्ष, प्रत्येक पांच वर्ष में कम से कम एक बार संस्थान के कार्यकरण को पुनर्विलोकन करने और पर अपनी सिफारिशें करने के लिए एक आयोग गठित करेगा. (2) आयोग में कम से कम तीन प्रख्यात शिक्षाविद होंगे जिसमें से एक ऐसे आयोग का अध्यक्ष होगा जो कुलाध्यक्ष द्वारा राज्य सरकार के परामर्श से नियुक्त किया जाएगा. (3) सदस्यों की नियुक्ति के निबन्धन तथा शर्तें ऐसी होंगी जैसी कि कुलाध्यक्ष अवधारित करे. (4) आयोग, ऐसी जांच करने के पश्चात् जैसी कि वह उचित समझे, अपनी सिफारिश कुलाध्यक्ष को करेगा. (5) कुलाध्यक्ष ऐसी सिफारिशों पर ऐसी कार्रवाई कर सकेगा जैसा कि वह उचित समझे.
33. भविष्य निधि, उपदान तथा पेंशन
संस्थान के समस्त स्थायी कर्मचारी, ऐसे विनियमों के अनुसार, जो उस संबंध में बनाए जाएं भविष्य निधि पेंशन तथा उपदान के फायदों के लिए हकदार होंगे.
34. संस्थान की निधि
(1) संस्थान के लिए एक संस्थान निधि होगी जिसमें निम्नलिखित सम्मिलित होंगे,- (एक) राज्य सरकार द्वारा दिया गया कोई अभिदाय या अनुदान; (दो) विश्वविद्यालय अनुदान आयोग या केन्द्र सरकार द्वारा दिया गया कोई अभिदाय या अनुदान; (तीन) राज्य विधिज्ञ परिषद द्वारा दिया गया कोई अभिदाय; (चार) कोई वसीयत, दान, विन्यास (एण्डाउमेन्ट्स) या अन्य अनुदान जो निजी व्यक्तियों या संस्था द्वारा किए गये हैं; (पांच) संस्थान द्वारा फीस तथा प्रभारों से प्राप्त आय; और (छह) किसी अन्य स्त्रोत से प्राप्त रकमें. (2) उक्त निधि में की रकम, भारतीय रिर्जव बैंक अधिनियम, 1934 में यथा परिभाषित किसी अनुसूचित में रखी जाएगी या ऐसी प्रतिभूतियों में विनित की जा सकेगी जो कि भारतीय न्यास अधिनियम, 1882 द्वारा प्राधिकृत की गई है जैसा कार्य परिषद द्वारा विनिश्चित किया जाए. (3) उक्त निधि संस्थान के ऐसे प्रयोजन के लिए और ऐसी रीति में उपयोग की जा सकेगी जैसा विनियमों में विहित किया जाए.
35. वार्षिक लेखे तथा संपरीक्षा
(1) संस्थान के वार्षिक लेखा, कार्य परिषद के निदेशों के अधीन तैयार किये जाएंगे. (2) संस्थान के लेखाओं की संपरीक्षा कार्य परिषद द्वारा नियुक्त संपरीक्षकों द्वारा एक वर्ष में कम से कम एक बार की जाएगी. परन्तु जब कभी आवश्यक समझा जाए, राज्य सरकार को यह निदेश देने की शक्ति होगी कि संस्थान वे उसके साथ ऐसी संस्थाओं के, जिनका प्रबंध संस्थान द्वारा किया है, लेखाओं की संपरीक्षा ऐसे संपरीक्षकों जिन्हें वह विनिर्दिष्ट करे, कराई जाए. (3) लेखे, जब उनकी संपरीक्षा कर ली जाए, कार्य परिषद द्वारा प्रकाशित किए जायेंगे और लेखाओं की और उसके साथ, संपरीक्षा रिपोर्ट की एक-एक प्रति साधारण परिषद के समक्ष रखी जाएगी और राज्य सरकार को भी प्रस्तुत की जाएगी. (4) वार्षिक लेखाओं पर साधारण परिषद द्वारा अपने वार्षिक सम्मिलन में विचार किया जायेगा. साधारण परिषद उनके संदर्भ में संकल्प पारित कर सकेगी और उसे कार्य परिषद को संसूचित करेगी. कार्य परिषद साधारण परिषद द्वारा दिए गए सुझावों पर विचार करेगी और उन पर ऐसी कार्रवाई करेगी जैसी कि वह उचित समझे, कार्य परिषद उसके द्वारा की गई समस्त कार्रवाई या कार्रवाई न किए जाने के कारणों की जानकारी साधारण परिषद को उसके आगामी सम्मिलन में देगी.
36. वित्तीय प्राक्कलन
(1) कार्य परिषद ऐसी तारीख के पूर्व, जो विनियमों द्वारा विहित की जाए, आगामी वर्ष के लिए वित्तीय प्राक्कलन तैयार करेगी ओर उन्हें साधारण परिषद के समक्ष रखेगी. (2) कार्य परिषद उस दशा में जहां ऐसी रकम से, जिसका बजट में प्रावधान किया गया है, अधिक व्यय किया जाना है या अत्यावश्यकता की दशा में, व्यय किया जाता है, अभिलिखित किए जाने वाले कारणों से और विनियमों में विनिर्दिष्ट निबन्धन तथा शर्तों के अध्यधीन रहते हुए, व्यय कर सकेगी जहां ऐसे अधिक व्यय के संबंध में बजट में कोई प्रावधान नहीं किए गए हैं वहां एक रिपोर्ट साधारण परिषद को उसके आगामी सम्मिलन में की जाएगी.
37. वार्षिक रिपोर्ट
(1) कार्य परिषद एक वार्षिक रिपोर्ट तैयार करेगी जिसमें ऐसी विशिष्टयां होंगी जो विनियमों द्वारा विहित की जाएं या जिसे साधारण परिषद अपने संकल्प द्वारा विनिर्दिष्ट करे और कार्य परिषद उसके अनुसार कार्रवाई करेगी. की गई साधारण परिषद को संसूचित की जाएगी. (2) वार्षिक रिपोर्ट की प्रतियां और उसके साथ साधारण परिषद का संकल्प, राज्य सरकार को प्रस्तुत किया जाएगा. राज्य सरकार उसे यथाशक्य शीघ्र राज्य विधान सभा के पटल पर रखवाएगी.
38. संविदाओं का निष्पादन
प्रबंध तथा प्रशासन से संबंधित समस्त संविदाएं, जब संविदा का मूल्य दस लाख रुपये से अधिक हो तो वह निदेशक द्वारा ओर जब उसका मूल्य दस लाख रुपये से कम है तो कुलसचिव द्वारा निष्पादित की जाएंगी.
39. संस्थान द्वारा विधि में उपाधियाँ उपाधिपत्र आदि का प्रदान किया जाना
तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, संस्थान को यह शक्ति होगी कि वह इस अधिनियम के अधीन विधि में उपाधियां, उपाधिपत्र और विद्या संबंधी अन्य विशिष्टताएं और पदवियां(टाइटिलस)प्रदान करें.
40. सम्मानिक उपाधियां
यदि विद्या परिषद के सदस्यों में से कम से कम दो तिहाई सदस्य सिफारिश करें कि किसी व्यक्ति को इस आधार पर कि वह विशिष्ट उपलब्धियों तथा हैसियत के कारण उनकी राय में ऐसी उपाधि या विद्या संबंधी विशिष्टा प्राप्त करने के लिये उपयुक्त या उचित व्यक्ति है, सम्मानिक उपाधि या विद्या संबंधी विशिष्टा प्रदान की जायें तो साधारण परिषद् संकल्प द्वारा यह विनिश्चय कर सकेगी कि सिफारिश किए गए व्यक्ति को ऐसी सम्मानिक उपाधि या विद्या संबंधी विशिष्टा प्रदान की जाए.
41. उपाधि या उपाधिपत्र का प्रत्याहरण
(1) साधारण परिषद्, कार्य परिषद की सिफारिश पर, किसी व्यक्ति को, साधारण परिषद् के कुल सदस्यों के बहुमत द्वारा तथा साधारण परिषद के सम्मिलन में उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो तिहाई बहुमत द्वारा पारित संकल्प द्वारा प्रदान की गई या दी गई किसी विशिष्टा, उपाधि, उपाधि पत्र या विशेषाधिकार को उस दशा में प्रत्याहत कर सकेगी जबकि ऐसे व्यक्ति को न्यायालय द्वारा ऐसे अपराध के लिए सिद्ध, दोष ठहराया गया है, जिसमें साधारण परिषद की राय में नैतिक अधमता अन्तर्वलित है या कि वह घोर अवचार का दोषी है। (2) किसी व्यक्ति के विरुद्ध इस धारा के अधीन कोई कार्रवाई तब तक नही की जाएगी जब तक कि उस व्यक्ति को की जाने के लिये प्रस्तावित कार्रवाई के विरुद्ध कारण दर्शाने का अवसर प्रदान नही कर दिया गया है। (3) साधारण परिषद् द्वारा पारित संकल्प की एक प्रति संबंधित व्यक्ति को तुरन्त भेजी जाएगी। (4) साधारण परिषद् द्वारा किए गए विनिश्चय से व्यथित कोई व्यक्ति ऐसे संकल्प की प्राप्ति की तारीख से तीस दिन के भीतर कुलाध्यक्ष को अपील कर सकेगा। (5) ऐसी अपील में कुलाध्यक्ष का विनिश्चय अंतिम होगा।
42. सम्पत्ति का अन्तरण
राज्य सरकार इस अधिनियम के प्रयोजन के लिए, संस्थान को भवन, भूमि कोई अन्य संपत्ति चाहे वह जंगम हो या स्थावर, संस्थान द्वारा उसके उपयोग और प्रबंध किये जाने के लिए ऐसी शर्तों पर और सीमाओं के अध्यधीन रहते हुए जैसा कि राज्य सरकार उचित समझे, अन्तरित कर सकेगी.
43. रिक्तियों के कारण प्राधिकारियों या निकायों की कार्यवाहियां अविधिमान्य नही होंगी
(1) इस बात के होते हुए भी साधारण परिषद्, कार्य परिषद्, विद्या परिषद् या संस्थान के किसी अन्य प्राधिकारी या निकाय का गठन सम्यक रूप से नहीं हुआ है या किसी भी समय इसके गठन या पुनर्गठन में कोई त्रुटि है और इस बात के होते हुए भी कि संस्थान के किसी प्राधिकारी, समिति या निकाय का कोई कार्य या कार्रवाई केवल इस कारण अविधिमान्य नही होगी कि- (क) उसके गठन में कोई रिक्ति या त्रुटि है; या (ख) उसके सदस्य के रूप में कार्य कर रहे किसी व्यक्ति के निर्वाचन, नामनिर्देशन या नियुक्ति में कोई त्रुटि है; या (ग) उसकी प्रक्रिया में काई ऐसी अनियमितता है जो मामले के गुणागुण पर प्रभाव नही डालती है। (2) संस्थान के किसी प्राधिकारी या निकाय का कोई संकल्प इस कारण अविधिमान्य नही समझा जाएगा कि उसके किसी सदस्य पर सूचना की तामील में कोई अनियमितता हुई है बशर्ते ऐसे प्राधिकारी या निकाय की कार्यवाहियां ऐसी अनियमितता के कारण प्रतिकूलतः प्रभावित नही हुई हों।
44. प्रारंभ पर कठिनाइयों का दूर किया जाना
यदि संस्थान की स्थापना के संबंध में या संस्थान के किसी प्राधिकारी के प्रथम सम्मिलन के संबंध में या इस अधिनियम तथा विनियमो के उपबंधों को प्रथम बार प्रभावी बनाने में अन्यथा कोई कठिनाई उद्भूत होती है तो कुलाध्यक्ष; किसी भी समय, इसके पूर्व कि संस्थान के समस्त प्राधिकारियों का गठन किया जाए, आदेश द्वारा कोई नियुक्ति कर सकेगा या कोई ऐसी बात, जो जहां तक हो सके वह इस अधिनियम ओर विनियमों के उपबंधों से सुसंगत हो, कर सकेगा जो उसे ऐसी कठिनाई को दूर करने हेतु आवश्यक या समीचीन प्रतीत हो, ओर ऐसे किसी आदेश का यह प्रभाव होगा मानो ऐसी नियुक्ति या कार्रवाई इस अधिनियम तथा विनियमों में उपबंधित की गई रीति में की गई है; परन्तु कुलाध्यक्ष ऐसा कोई आदेश करने के पूर्व, निदेशक की ओर संस्थान के ऐसे समुचित प्राधिकारी की जो कि गठित किया जा चुका हो राय सुनिश्चित करेगा तथा उस पर विचार करेगा.
45. अस्थायी उपबंध
इस अधिनियम और विनियमों में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी निदेशक, साधारण परिषद् के अध्यक्ष के पूर्व अनुमोदन से और निधियों की उपलब्धता के अध्यधीन रहते हुए, इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के प्रयोजन के लिये संस्थान के समस्त या किन्हीं भी कृत्यों का निर्वहन कर सकेगा और इस प्रयोजन के लिये ऐसे समय तक ऐसी किन्ही भी शक्तियों का प्रयोग या किन्ही भी कर्तव्यों का पालन कर सकेगा जिनका इस अधिनियम तथा विनियमों द्वारा संस्थान के किसी प्राधिकारी द्वारा प्रयोग या पालन किया जाना है, जब तक कि इस अधिनियम तथा विनियमों द्वारा उपबंधित किए गए अनुसार ऐसा प्राधिकारी अस्तित्व में नही आ जाता है.
46. संरक्षण
संस्थान, निदेशक, संस्थान के किसी प्राधिकारी या अधिकारी या अन्य किसी व्यक्ति के विरूद्ध किसी ऐसी बात के संबंध में, जो कि इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए किसी विनियम के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई है या जिसका इस प्रकार सद्भावपूर्वक किया जाना तात्पर्यत रहा है, कोई वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्रवाई नही होगी और न ही उनसे कोई नुकसानी का दावा किया जाएगा.
47. अधिनियम का अध्यरोही प्रभाव होगा
इस अधिनियम और उसके अधीन बनाये गये किसी विनियम के उपबंध, तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में या इस अधिनियम से भिन्न किसी अन्य विधि के आधार पर प्रभावी किसी लिखत में अन्तर्विष्ट उससे असंगत किसी बात के होते हुए भी, प्रभावी होंगे.
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