Bare Act
The Act of Madhya Pradesh Niji Vishwavidyalaya (Sthapna evam Sanchalan) adhiniyam 2007
1. Short title, extent and commencement
(1) Is Adhiniyam Ka Sankshipt Naam Madhya Pradesh Niji Vishwavidyalaya (Sthapna Evam Sanchalan) Adhiniyam, 2007 Hai. (2) Iska Vistar Sampoorn Madhyapradesh Hai. (3) Yeh Aisi Tarikh Se Pravritt Hoga, Jaisa Ki Rajya Sarkar, Adhisuchana Dwara, Niyat Kare.
2. Definitions
Is Adhiniyam Mein, Jab Tak Sandarbh Se Anyatha Apekshit Na Ho,- (ka) "Vidya Parishad" Se Abhipret Hai, Niji Vishwavidyalaya Ki Vidya Parishad; (kha) "Gariboo Rekha Se Niche Ka Parivar" Se Abhipret Hai, Aisa Parivar Jiski Aay Shasan Dwara, Samay-Samay Par, Yatha Vinirdisht Garibi Rekha Se Niche Ho; (ga) "Prabandhan Board" Se Abhipret Hai, Niji Vishwavidyalaya Ka Prabandhan Board; (gha) "Kuladhipati" Se Abhipret Hai, Niji Vishwavidyalaya Ka Kuladhipati; (d) "Mukhya Vitt Evam Lekha Adhikari" Se Abhipret Hai, Niji Vishwavidyalaya Ka Mukhya Vitt Evam Lekha Adhikari; (cha) "Vibhag" Se Abhipret Hai, Adhyayan Vibhag Tatha Sammilit Hai Kisi Niji Vishwavidyalaya Ka Adhyayan Kendra; (chha) "Karmanchari" Se Abhipret Hai, Niji Vishwavidyalaya Dwara Niyukt Kiya Gaya Koi Vyakti Tatha Ismein Sammilit Hai Niji Vishwavidyalaya Ke Adhyapak Tatha Anya Karmancharivrind; (ja) "Vinyas Nidhi" Se Abhipret Hai, Niji Vishwavidyalaya Ki Vinyas Nidhi; (jha) "Fees" Se Abhipret Hai, Niji Vishwavidyalaya Dwara Vidyarthiyon Se Kiya Jane Wala Sangrahan, Chahe Use Kisi Bhi Naam Se Pukara Jaye; (na) "Shasi Nikay" Se Abhipret Hai, Niji Vishwavidyalaya Ka Shasi Nikay; (ta) "Ucchatar Shiksha" Se Abhipret Hai, 10+2 Star Se Aage Gyan Ke Liye Nirdharit Pathyakarya Athva Pathyakram Ka Adhyayan; (tha) "Mukhya Parisar" Se Abhipret Hai, Madhyapradesh Mein Sthit Niji Vishwavidyalaya Ka Mukhya Parisar, Jismein Kam Se Kam Panch Vishwavidyalaya Adhyapan Vibhag, Vidya Shakha Hon Aur Jahan Kulapati Evam Kulsachiv Niwas Karte Hon Tatha Niji Vishwavidyalaya Ka Mukhya Karyalay Bhi Sthit Ho; (d) "National Council of Assessment and Accreditation" Se Abhipret Hai, Vishwavidyalaya Anudan Ayog Ki Ek Swashasi Sansthan, National Council of Assessment and Accreditation, Banglore; (dha) "Adhyadesh" Se Abhipret Hai, Niji Vishwavidyalaya Ka Adhyadesh; (na) "Anya Pichhada Varg" Se Abhipret Hai, Rajya Sarkar Dwara, Samay-Samay Par Yatha Sanshodhit Adhisuchana Kr. F-85-Pachhis-4-84-Dinank 26 December, 1984 Dwara Vinirdisht Nagrikon Ke Anya Pichhade Varg; (ta) "Niji Vishwavidyalaya" Se Abhipret Hai, Is Adhiniyam Ke Adhin Sthapit Aur Nigamit Kiya Gaya Niji Vishwavidyalaya; (tha) "Arhata" Se Abhipret Hai, Niji Vishwavidyalaya Dwara Di Gayi Koi Upadhi Ya Koi Anya Arhata; (da) "Kulsachiv" Se Abhipret Hai, Niji Vishwavidyalaya Ka Kulsachiv; (dha) "Viniyam" Se Abhipret Hai, Is Adhiniyam Ke Upbandhon Ke Adhin Banaye Gaye Viniyam; (na) "Viniyamak Nikay" Se Abhipret Hai, Kendriya Athva Rajya Sarkar Dwara Sthapit Kendriya Ya Rajya Viniyamak Nikay, Jo Ucchatar Shiksha Ke Manak Sunishchit Karne Ke Liye Mandand Tatha Sharten Adhikathit Karen; (pa) "Viniyamak Ayog" Se Abhipret Hai Dhara 36 Ke Adhin Sthapit Viniyamak Ayog; (fa) "Viniyamak Parishad" Se Abhipret Hai, Yathasthit, Akhil Bharatiya Takniki Shiksha Parishad Adhiniyam, 1987 (1987 Ka 52) Ke Adhin Sthapit Akhil Bharatiya Takniki Shiksha Parishad, Adhivakta Adhiniyam, 1961 (1961 Ka 25) Ki Dhara 4 Ke Adhin Gathit Bharatiya Vidhigya Parishad, Vastuvid Adhiniyam, 1972 (1972 Ka 20) Ke Adhin Sthapit Vastuvid Parishad, Bharatiya Ayurvigyan Parishad Adhiniyam, 1956 (1956 Ka 102) Ke Adhin Gathit Bharatiya Ayurvigyan Parishad, Madhyapradesh Sah-Chikitsiya Parishad Adhiniyam, 2000 (Kr. 1 San 2001) Ke Adhin Sthapit Madhyapradesh Sah-Chikitsiya Parishad Ya Bheshaji Adhiniyam, 1948 (1948 Ka 8) Ke Adhin Gathit Bharatiya Bheshaji Parishad; (ba) "Anusuchi" Se Abhipret Hai, Is Adhiniyam Ki Anusuchi; (bha) "Anusuchit Jati" Se Abhipret Hai, Bharat Ke Samvidhan Ke Anuchchhed 341 Ke Adhin Adhisuchit Jatiyan; (ma) "Anusuchit Janjati" Se Abhipret Hai, Bharat Ke Samvidhan Ke Anuchchhed 342 Ke Adhin Adhisuchit Janjatiyan;
3. निजी विश्वविद्यालय के उद्देश्य
निजी विश्वविद्यालय के निम्नलिखित सामान्य उद्देश्य होंगे :-(क) उच्चतर शिक्षा में शिक्षण, अध्यापन तथा प्रशिक्षण की व्यवस्था करना एवं गवेषणा, ज्ञान की अभिवृद्धि एवं प्रसार के लिये उपबंध करना;(ख) बौद्धिक क्षमता के उच्चतर स्तर का सृजन करना;(ग) शिक्षा एवं प्रशिक्षण के लिए कला सुविधाओं को सुलभ करना;(घ) अध्यापन तथा गवेषणा एवं शिक्षा कार्यक्रमों को निरन्तर चालू रखने का प्रस्ताव करना;(ङ) गवेषणा एवं विकास तथा ज्ञान की सहभागिता एवं उसके उपयोजन के लिए उत्कृष्टता केन्द्रों को सृजित करना;(च) विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, तथा संबद्ध विनियामक निकाय या विनियामक परिषद द्वारा अधिकथित मानदण्डों के अनुसार उपाधि, उपाधिपत्र, प्रमाण पत्र तथा अन्य विद्या संबंधी विशेष सम्मान के स्तर को बनाए रखना;(छ) विनियामक आयोग की अनुशंसा पर आधारित किसी ऐसे अन्य उद्देश्य के अनुसार कार्य करना, जैसा कि राज्य सरकार द्वारा समय-समय पर अनुमोदित किया जाए।
4. निजी विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए प्रस्ताव प्रस्तुत करना
(१) धारा ३ में प्रगणित उद्देश्यों के क्रियान्वयन हेतु निजी विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए प्रस्ताव तथा परियोजना रिपोर्ट अंतर्विष्ट करते हुए प्रायोजी निकाय द्वारा विनियामक आयोग को आवेदन, ऐसी फीस के साथ तथा ऐसे प्रारूप में किया जाएगा, जैसा कि विहित किया जाए।(२) परियोजना रिपोर्ट में निम्नलिखित विशिष्टयां अंतर्विष्ट होंगी, अर्थात् :-(क) प्रायोजी निकाय के रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र, उसके गठन तथा उपविधियों की प्रति के साथ विस्तृत ब्यौरे;(ख) पूर्ववर्ती पांच वर्षों के संपरीक्षित लेखाओं के साथ प्रायोजी निकाय के वित्तीय संसाधनों के संबंध में जानकारी;(ग) प्रस्तावित निजी विश्वविद्यालय के मुख्य परिसर की अवस्थिति;(घ) निजी विश्वविद्यालय के उद्देश्य;(ङ) भूमि की उपलब्धता और भवन तथा अवसंरचनात्मक सुविधाओं के ब्यौरे;(च) निजी विश्वविद्यालय का कार्य प्रारंभ होने के पूर्व किए जाने वाले परिसर के विकास हेतु योजना के विस्तृत ब्यौरे, जैसे भवन निर्माण संरचनात्मक सुख सुविधाएं एवं अवसंरचनात्मक सुविधाओं का विकास और उपकरण के उपापन आदि उपलब्धियों तथा पांच वर्षों के लिए चरणबद्ध कार्यक्रम की रूपरेखा;(छ) पांच वर्ष के लिए प्रस्तावित पूंजीगत व्यय की चरणबद्ध स्थिति विवरण तथा उसके वित्त के स्रोत;(ज) संकाय, जैसे विज्ञान, कला, वाणिज्य, तकनीकी, शिक्षा आदि, की प्रकृति तथा संख्या, निजी विश्वविद्यालय द्वारा प्रत्येक संकाय में किए जाने वाले प्रस्तावित अध्ययन तथा गवेषणा कार्यक्रम (स्नातक और स्नातकोत्तर) के प्रकार एवं ऐसा क्रमिक कार्यक्रम जो पाठ्यक्रमनुसार नामांकन लक्ष्य के साथ पांच वर्ष के लिए हो;(झ) प्रायोजी निकाय के समादेश पर संबंधित शिक्षण में अनुभव तथा विशेषज्ञता;(ञ) अध्ययन पाठ्यक्रमों तथा गवेषणा हेतु अपेक्षित शैक्षणिक सुविधाओं की उपलब्धता जैसे अध्यापन कर्मचारीवृन्द तकनीकी या गैर-तकनीकी कर्मचारीवृन्द एवं उपकरण आदि;(ट) पाठ्यक्रम अनुसार या क्रियाकलाप के अनुसार आवर्ती व्यय का अनुमान तथा वित्त के स्रोत तथा अनुमानित प्रति छात्र व्यय;(ठ) संसाधनों का जुटव करने की स्कीम तथा उससे संबद्ध पूंजी की लागत तथा ऐसे स्रोतों के प्रति संदाय की रीति;(ड) छात्रों से फीस की वसूली, निजी विश्वविद्यालय के उद्देश्यों से संबंधित अन्य क्रियाकलापों से प्रत्याशित राजस्व एवं अन्य प्रत्याशित आय के द्वारा आंतरिक रूप से निधि को जुटाने (जेनरेट करने) की स्कीम;(ढ) इकाई की लागत पर व्यय के ब्यौरे के संदर्भ सहित विभिन्न पाठ्यक्रमों के लिए प्रस्तावित फीस का ढांचा तथा अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़े वर्ग तथा गरीबी रेखा से नीचे के परिवार के छात्रों को दी जाने वाली फीस में रियायतों या रिबेट या फीस माफी तथा छात्रवृत्ति यदि कोई हो का विस्तार;(ण) निजी विश्वविद्यालय में पाठ्यक्रमों में छात्रों के प्रवेश के लिए चयन हेतु अपनाई जाने वाली प्रस्तावित प्रणाली;(त) निजी विश्वविद्यालय में अध्यापकों तथा अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति हेतु अपनाई जाने वाली प्रस्तावित प्रणाली।
5. प्रस्ताव का मूल्यांकन
(१) विनियामक आयोग, निजी विश्वविद्यालय की स्थापना का प्रस्ताव तथा परियोजना रिपोर्ट प्राप्त होने पर, प्रस्ताव के प्राप्त होने से ६० दिन के भीतर, परियोजना रिपोर्ट में अधिकथित तथ्यों की ऐसी समीक्षा करेगा, जैसी कि वह आवश्यक समझे।(२) विनियामक आयोग समीक्षा के दौरान प्रायोजी निकाय से कोई अतिरिक्त जानकारी मांग सकेगा और ऐसी जानकारी प्राप्त होने के पश्चात, विनियामक आयोग १० दिन के भीतर परियोजना प्रस्ताव का मूल्यांकन करेगा।
6. आशय पत्र जारी करना
(१) धारा ५ में यथा उपबंधित जांच तथा मूल्यांकन के पश्चात, यदि विनियामक आयोग की यह राय हो कि प्रायोजी निकाय को निजी विश्वविद्यालय की स्थापना का अवसर दिया जाए, तो वह राज्य सरकार को सिफारिश करेगा कि इस संबंध में प्रायोजी निकाय को आशय पत्र जारी करे।(२) विनियामक आयोग से अनुशंसा प्राप्त होने पर, राज्य सरकार प्रायोजी निकाय को राज्य में निजी विश्वविद्यालय स्थापित करने के संबंध में आशय पत्र जारी कर सकेगी।
7. निजी विश्वविद्यालय स्थापित करने की शर्तें
धारा ६ की उपधारा (२) में यथा उपबंधित आशय पत्र में निम्नलिखित शर्तें अंतर्विष्ट होंगी, जिनके संबंध में प्रायोजी निकाय से यह अपेक्षा की जाएगी कि वह राज्य में एक निजी विश्वविद्यालय स्थापित करने के लिए उन्हें पूरी करे, अर्थात् :-(एक) वह-(क) मुख्य परिसर स्थापित करेगा;(ख) धारा ११ के उपबंधों के अनुसार विन्यास निधि स्थापित करेगा;(दो) वह स्थापित किए जाने वाले मुख्य परिसर के लिए न्यूनतम २० हैक्टर भूमि प्राप्त करेगा और उसके स्वामित्व संबंधी कागज प्रस्तुत करेगा;(तीन) वह प्रशासनिक प्रयोजन तथा शैक्षणिक कार्यक्रम संचालित करने के लिए भवन तथा अनुषंगी संरचना के रूप में न्यूनतम २५०० वर्गमीटर निर्मित क्षेत्र उपलब्ध कराएगा।
8. अनुपालन रिपोर्ट की प्रस्तुति, सत्यापन तथा निरीक्षण
(1) प्रायोजी निकाय सुसंगत दस्तावेजों सहित अनुपालन रिपोर्ट तथा परिवचन विनियामक आयोग को प्रस्तुत करेगा। (2) प्रायोजी निकाय से अनुपालन रिपोर्ट प्राप्त करने के पश्चात विनियामक आयोग, उसका तथा तथ्यात्मक आंकडों का ऐसी रीति में परीक्षण करेगा जैसा कि वह उचित समझे। (3) उपधारा (2) में यथाउल्लिखित अनुपालन रिपोर्ट तथा परिवचन के परीक्षण के पश्चात यदि उसमें कोई कमी पाई जाती हैं तो वह प्रायोजी निकाय को निदेश देगा कि यथाशीघ्र पहचानी गई कमियों को दूर करे। (4) विनियामक आयोग का यह समाधान हो जाने पर कि, उपधारा (3) में यथाउल्लिखित पहचानी गई कमियों को दूर कर दिया गया है, निजी विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए प्रस्ताव की स्थिति के संबंध में राज्य सरकार को रिपोर्ट भेजेगा। (5) राज्य सरकार विनियामक आयोग से उपधारा (4) में उल्लिखित रिपोर्ट प्राप्त होने के पश्चात, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से प्रस्तावित निजी विश्वविद्यालय का निरीक्षण करने का अनुरोध करेगा और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अपनी रिपोर्ट अधिक से अधिक तीन मास के भीतर प्रस्तुत करेगा या अन्यथा राज्य सरकार ऐसा विनिश्चय कर सकेगी, जैसा कि वह उचित समझे। (6) यदि प्रायोजी निकाय नियत समय के भीतर धारा 7 में अधिकथित शर्तों का अनुपालन करने में असफल रहता है, तो धारा 4 की उपधारा (1) के अधीन प्रस्तुत किया गया परियोजना प्रस्ताव, निष्प्रभाव हो जाएगा तथा धारा 6 की उपधारा (2) के अधीन जारी किया गया आशय पत्र रद्द हो जाएगा।
9. स्थापना और निगमन
(1) यदि धारा 8 के अधीन विनियामक आयोग द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट तथा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की निरीक्षण रिपोर्ट, यदि कोई हो, पर विचार करने के पश्चात राज्य सरकार का यह समाधान हो जाता है कि प्रायोजी निकाय ने धारा 7 के उपबंधों का पालन कर लिया है तथा उसके प्रस्ताव के आधार पर निजी विश्वविद्यालय स्थापित किया जा सकता है, तो वह अनुसूची का संशोधन करके ऐसे विशिष्ट नाम तथा विवरण सहित, जैसा कि अनुसूची में इस निमित्त विनिर्दिष्ट किया जाए, एक निजी विश्वविद्यालय स्थापित करेगी। (2) ऐसा निजी विश्वविद्यालय, अनुसूची के संशोधन की तारीख से निगमित हुआ समझा जाएगा। (3) निजी विश्वविद्यालय, अनुसूची में दर्शाए गए नाम से एक निगमित निकाय होगा जिसका इस अधिनियम के उपबंधों के अध्यधीन रहते हुए शाश्वत उत्तराधिकार होगा एवं उसकी सामान्य मुद्रा होगी, जो सम्पत्ति अर्जित कर सकेगा तथा उसका स्वामित्व होगा, करार कर सकेगा तथा उस नाम से वाद चला सकेगा तथा उस पर वाद चलाया जा सकेगा। (4) ऐसे निजी विश्वविद्यालय द्वारा या उसके विरुद्ध प्रस्तुत समस्त वाद या अन्य विधिक कार्यवाही में अभिवचन कुलसचिव द्वारा हस्ताक्षरित तथा सत्यापित किये जाएंगे और ऐसे वाद या कार्यवाहियों में समस्त आदेशिकाएं कुलसचिव को जारी की जाएंगी तथा उस पर तामील की जाएंगी। (5) निजी विश्वविद्यालय का मुख्य परिसर ऐसे स्थान पर होगा जैसा कि अनुसूची के कॉलम (5) में दर्शाया गया है।
10. निजी विश्वविद्यालय को प्रोत्साहन
धारा 7 के खण्ड (चार) के उपखण्ड (क) के उपबंधों में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, राज्य सरकार कारणों को लेखबद्ध करते हुए निजी विश्वविद्यालय को वित्तीय या अन्य प्रोत्साहन देने के लिए विचार कर सकेगी।
11. विन्यास निधि
(1) राज्य सरकार से, धारा 6 की उपधारा (2) में यथा उपबंधित आशय-पत्र प्राप्त होने पर, यदि कोई प्रायोजी निकाय शर्तों को पूरा करना चाहता है तथा आशय-पत्र में यथा उल्लिखित परिवचन देता है तो वह बैंककारी कंपनी (उपक्रमों का अर्जन तथा अंतरण) अधिनियम, 1970 (1970 का 5) की प्रथम अनुसूची में तत्स्थानी नये बैंक के रूप में विनिर्दिष्ट किसी बैंक में पन्द्रह दिन के भीतर शाश्वत निक्षेप के रूप में पांच करोड़ की विन्यास निधि स्थापित करेगा। (2) यह सुनिश्चित करने के लिए कि निजी विश्वविद्यालय अधिनियम, परिनियम तथा अध्यादेश के उपबंधों का पालन कर रहा है, विन्यास निधि सुरक्षा निक्षेप के रूप में प्रयुक्त होगी तथा प्रायोजी निकाय द्वारा अधिनियम, परिनियम, अध्यादेश या विनियमन के किसी भी उपबंध के उल्लंघन या भंग की दशा में, विनियामक आयोग की अनुशंसा पर राज्य सरकार विन्यास निधि को पूर्णतः या उसके किसी भाग को सूचना देने पश्चात समपहृत कर सकेगी। (3) विन्यास निधि की स्थापना के विकास के लिए विन्यास निधि से आय का उपयोग किया जा सकेगा किन्तु इसका उपयोग निजी विश्वविद्यालय के आवर्ती व्यय हेतु नहीं किया जाएगा। (4) विन्यास निधि की स्थापना का ढंग, उसके विनियमन का प्रकार, उससे प्राप्त आय का प्रायोजी निकाय को भुगतान, उसको समपहृत करने और प्रायोजी निकाय के वापस करने का ढंग ऐसा होगा जैसा कि विहित किया जाए।
12. सामान्य निधि
प्रत्येक निजी विश्वविद्यालय एक निधि की स्थापना करेगा, जो सामान्य निधि के नाम से जानी जाएगी, जिसमें निम्नलिखित राशि जमा की जाएगी, अर्थात्:- (क) निजी विश्वविद्यालय द्वारा प्राप्त फीस तथा अन्य प्रभार; (ख) प्रायोजी निकाय द्वारा किया गया कोई अंशदान; (ग) न्यास, वसीयत, दान, विन्यास तथा कोई अन्य का अनुदान; तथा (घ) निजी विश्वविद्यालय द्वारा प्राप्त अन्य सभी प्रकार की राशि: परन्तु खण्ड (क) के अधीन छात्रों से संग्रहित फीस का एक प्रतिशत, विनियामक आयोग के पास ऐसी रीति में, जैसी कि विहित की जाए, जमा किया जाएगा।
13. सामान्य निधि का उपयोग
सामान्य निधि का उपयोग निम्नलिखित प्रयोजनों के लिए किया जाएगा, अर्थात्:- (क) इस अधिनियम तथा उसके अधीन बनाए गये परिनियमों, अध्यादेशों तथा विनियमों के प्रयोजनों के लिए ऋण का प्रति संदाय, जिसमें प्रभारित ब्याज भी सम्मिलित है; (ख) निजी विश्वविद्यालय की आस्तियों का रखरखाव; (ग) धारा 11 एवं 12 के अधीन सृजित निधियों के अंकेक्षण की लागत का भुगतान; (घ) न्यायालय में ऐसे वाद या कार्यवाही के व्ययों को पूरा करना जिसमें निजी विश्वविद्यालय एक पक्षकार हो; (ङ) विश्वविद्यालय के अधिकारियों तथा कर्मचारियों और अध्यापन एवं शोध कर्मचारियों के सदस्यों के वेतन, भत्ते, भविष्य निधि अंशदान, उपदान तथा अन्य फायदों का भुगतान; (च) शासी निकाय, प्रबंधन बोर्ड, विद्या परिषद तथा निजी विश्वविद्यालय के परिनियम के अधीन इस प्रकार घोषित अन्य प्राधिकरण के सदस्यों तथा किसी प्राधिकरण या प्रायोजी निकाय के सभापति (चेयरपर्सन) या इस अधिनियम तथा उसके अधीन बनाए गए परिनियमों, अध्यादेशों या विनियमों के किसी उपबंध के अनुसरण में कुलपति द्वारा नियुक्त की गई किसी समिति के सदस्यों के यात्रा भत्ते या अन्य भत्तों का भुगतान; (छ) यथास्थिति, गरीबी रेखा के नीचे के परिवार के छात्रों या शोध सहयुक्त (एसोसिएट्स) या प्रशिक्षु को या अन्य ऐसे छात्रों को, जो इस अधिनियम तथा उसके अधीन बनाए गए परिनियमों अध्यादेशों या नियमों के उपबंधों के अधीन ऐसे पुरस्कारों के लिए अन्यथा पात्र हों, अध्येतावृत्ति, फीस माफी, छात्रवृत्ति, सहायकवृत्ति तथा अन्य पुरस्कार का दिया जाना; (ज) इस अधिनियम तथा इसके अधीन बनाए गए परिनियमों, अध्यादेशों या विनियमों के उपबंधों के क्रियान्वयन में निजी विश्वविद्यालय द्वारा उपगत किए गए किसी व्यय का भुगतान; (झ) प्रायोजी निकाय द्वारा निजी विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए एवं उसके द्वारा किए गए निवेश में पूंजी की लागत का भुगतान, जो ब्याज की लागू बैंक दर से अधिक न हो; (ञ) किन्हीं अन्य व्ययों का भुगतान जिसमें सम्मिलित है कोई विशिष्ट सेवा जिसके अन्तर्गत प्रायोजी निकाय की ओर से निजी विश्वविद्यालय की प्रबंधकीय सेवा आती है जो कि प्रबंधन बोर्ड द्वारा निजी विश्वविद्यालय के प्रयोजनों के लिए व्यय के रूप में अनुमोदित हो, प्रदान करने के उत्तरदायित्व से भारित किसी संगठन को देय सेवा फीस: परन्तु निजी विश्वविद्यालय द्वारा प्रबंधन बोर्ड के पूर्व अनुमोदन के बिना, प्रबंधन बोर्ड द्वारा नियत किए गए किसी वर्ष हेतु कुल आवर्ती तथा कुल अनावर्ती व्यय हेतु निर्धारित सीमा से अधिक कोई व्यय उपगत नहीं किया जाएगा: परन्तु यह और कि सामान्य निधि का उपयोग खण्ड (क) में विनिर्दिष्ट उद्देश्य के लिये निजी विश्वविद्यालय के शासी निकाय के अनुमोदन के बिना नहीं किया जाएगा।
14. निजी विश्वविद्यालय के अधिकारी
निजी विश्वविद्यालय के निम्नलिखित अधिकारी होंगे, अर्थात्:- (क) कुलाध्यक्ष (ख) कुलाधिपति (ग) कुलपति (घ) कुलसचिव (ङ) मुख्य वित्त एवं लेखाधिकारी, और (च) ऐसे अन्य अधिकारी जिन्हें परिनियमों द्वारा विश्वविद्यालय के अधिकारी होना घोषित किया जाए।
15. कुलाध्यक्ष
(1) मध्यप्रदेश के राज्यपाल, निजी विश्वविद्यालय के कुलाध्यक्ष होंगे. (2) कुलाध्यक्ष, जब वे उपस्थित हों, उपाधि तथा उपाधि-पत्र प्रदान करने हेतु निजी विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह की अध्यक्षता करेंगे. (3) कुलाध्यक्ष की निम्नलिखित शक्तियां होंगी, अर्थात्:- (क) निजी विश्वविद्यालय के कार्यकलापों से संबंधित कोई जानकारी या अभिलेख मंगवाना; (ख) जानकारी के आधार पर, यदि यह प्रतीत होता है कि निजी विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकारी द्वारा किया गया कोई आदेश, कार्यवाही अथवा विनिश्चय इस अधिनियम और उसके अधीन बनाए गए परिनियमों, अध्यादेशों या विनियमों के अनुरूप नहीं है तो कुलाध्यक्ष, विनियामक आयोग का मत प्राप्त कर सकेगा तथा ऐसा समाधान होने पर कि कोई अनियमितता हुई है, ऐसा निदेश जारी कर सकेगा, जैसा कि वह निजी विश्वविद्यालय के हित में उचित समझे, तथा इस प्रकार जारी किए गए निदेशों का, निजी विश्वविद्यालय द्वारा अनुपालन किया जाएगा।
16. कुलाधिपति
(1) कुलाध्यक्ष के अनुमोदन से कुलाधिपति प्रायोजी निकाय द्वारा नियुक्त किया जाएगा. (2) कुलाधिपति निजी विश्वविद्यालय का प्रमुख होगा. (3) कुलाधिपति विश्वविद्यालय की शासी निकाय की बैठकों की अध्यक्षता करेगा तथा जब कुलाध्यक्ष उपस्थित न हो, उपाधि, उपाधि-पत्र तथा अन्य विद्या संबंधी सम्मान प्रदान करने के लिए निजी विश्वविद्यालय को दीक्षांत समारोह की अध्यक्षता करेगा। (१) राज्य सरकार द्वारा, राज्य स्तर पर विनियामक विरचना प्रदान करने के प्रयोजन से तथा अध्यापन, परीक्षा, गवेषणा, विस्तार कार्यक्रम, छात्रों के हितों का संरक्षण तथा कर्मचारियों की युक्तियुक्त सेवा शर्तो को सुनिश्चित करने के प्रयोजन हेतु और राज्य सरकार तथा केन्द्रीय विनियामक निकायों के बीच मध्यस्थ के रूप में कार्य करने के लिए, एक विनियामक आयोग की स्थापना की जाएगी। (२) विनियामक आयोग, कुलाध्यक्ष के सामान्य नियंत्रण के अधीन कार्य करेगा। (३) विनियामक आयोग में एक सभापति (चेयरमेन) और दो पूर्णकालिक सदस्य होंगे जिनमें से एक सदस्य "शैक्षणिक" और दूसरा सदस्य, "सदस्य-प्रशासनिक" होगा तथा दो से अधिक अंशकालिक सदस्य होंगे। (४) विनियामक में आयोग एक पूर्णकालिक सचिव होगा। (५) कुलाध्यक्ष द्वारा सभापति (चेयरमेन) की नियुक्ति राज्य सरकार द्वारा अनुशंसित पैनल में से की जायेगी, जिसमें ऐसे प्राप्त शिक्षाविद् सम्मिलित होंगे, जिन्हें उच्चतर शिक्षा की संस्थाओं के कार्य का पूर्ण ज्ञान हो। (६) सदस्य तथा सचिव की नियुक्त राज्य सरकार द्वारा अनुशंसित पैनल में से कुलाध्यक्ष द्वारा की जायेगी, जिसमें वित्त, विधि, प्रशासन और प्रबंधन के क्षेत्र के विख्यात व्यक्ति होंगे। (७) सभापति (चेयरमेन) तथा सदस्य, इस अधिनियम के अधीन स्थापित किन्हीं निजी विश्वविद्यालयों से किसी संबद्ध नहीं होंगे। (८) विनियामक आयोग का सभापति (चेयरमेन) तथा सदस्य उस तारीख, से जिसको वह अपना पद ग्रहण करता है, पैंसठ वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने तक, इनमें से जो पूर्वतर हो, क्रमशः तीन वर्ष तथा दो वर्ष की अवधि के लिए पद धारण करेगा और वह पैंसठ वर्ष की उच्चतर आयु सीमा के अध्यधीन रहते हुए पूर्वोक्त वर्षों की द्वितीय अवधि के लिए विचार किए जाने हेतु पात्र होगा : परन्तु यथास्थिति, तीन वर्ष या दो वर्ष की उक्त कालावधि का अवसान होने पर भी वह उसके उत्तराधिकारी के पदस्थ होने और अपना पद ग्रहण करने तक पद पर बना रहेगा किन्तु ऐसी कालावधि छह मास से अधिक न होगी : परन्तु यह और कि अवधि के अवसान के पश्चात विनियामक आयोग का सभापति (चेयरमेन) तथा सदस्य किसी भी रूप में या किसी भी नाम में, चाहे वह जो भी हो, किन्हीं आर्थिक फायदों और इस अधिनियम के अधीन स्थापित निजी विश्वविद्यालय में से किसी विश्वविद्यालय में कोई कर्तव्यभार या नियोजन स्वीकार करने से प्रतिषिद्ध होगा। (९) विनियामक आयोग के सभापति (चेयरमेन) तथा सदस्यों की सेवा के अन्य निबंधन तथा शर्तें, विनियामक आयोग के आदेशों तथा विनिश्चयों के अधिप्रामाण की पद्धति और विनियामक आयोग द्वारा जारी की गई लिखत, विनियामक आयोग के बैठक की प्रक्रिया, विनियामक आयोग के कर्मचारिवृन्द की भरती तथा सेवा शर्तें, विशिष्ट प्रयोजन के लिए विनियामक आयोग के साथ व्यक्तियों का अस्थायी सहयोग, विनियामक आयोग की निधि, उसका बजट, वार्षिक रिपोर्ट, लेखे, संपरीक्षा और ऐसे अन्य विषयों के संबंध में, जो विनियामक आयोग के उचित कार्यकरण के लिए अपेक्षित हो, राज्य सरकार द्वारा इस संबंध में बनाए गए नियमों में उपबंध किया जाएगा। (१०) विनियामक आयोग का यह सामान्य कर्तव्य होगा कि वह : (क) निजी विश्वविद्यालयों में अध्यापन, परीक्षा और गवेषणा का मानक बनाए रखने के लिये समस्त ऐसे कदम उठाए जिन्हें वह आवश्यक समझे;
26. परिनियम
(१) (ग) कुल सचिव, मुख्य वित्त तथा लेखा अधिकारी तथा अन्य अधिकारियों की नियुक्ति की रीति और निबंधन तथा शर्तें और उनकी शक्तियां तथा कृत्य; (घ) अध्यापकों की नियुक्ति की रीति और निबंधन तथा शर्तें; (ङ) निजी विश्वविद्यालय के कर्मचारियों की सेवा की रीति और निबंधन तथा शर्तें; (च) अधिकारियों, अध्यापकों, कर्मचारियों एवं छात्रों के बीच विवाद के मामले में मध्यस्थता हेतु प्रक्रिया; (छ) मानद उपाधियां प्रदान करना; (ज) ट्यूशन फीस के भुगतान के संबंध में छात्रों को छूट देने तथा उनको छात्रवृत्ति और शिक्षावृत्ति प्रदान करने हेतु उपबंध; (झ) प्रवेश संबंधी नीति का उपबंध करना, जिसमें विशेषतः गरीबी रेखा के नीचे के परिवार, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, अन्य पिछड़े वर्गों, शारीरिक रूप से विकलांग एवं अन्य प्रवर्गों के छात्रों हेतु स्थानों के आरक्षण का विनियमन भी सम्मिलित है; (ञ) छात्रों से प्रभारित की जाने वाली फीस तथा खण्ड (झ) में उल्लिखित श्रेणियों के लिए रियायतों का उपबंध करना; (ट) विभिन्न पाठ्यक्रमों हेतु स्थानों की संख्या का उपबंध करना। (२) निजी विश्वविद्यालय के प्रथम परिनियम, शासी निकाय द्वारा बनाए जाएंगे तथा विनियामक आयोग को अनुमोदन के लिए प्रस्तुत किए जाएंगे। (३) विनियामक आयोग, निजी विश्वविद्यालय द्वारा प्रस्तुत प्रथम परिनियमों पर उसकी प्राप्ति की तारीख से 2 मास के भीतर विचार करेगा तथा ऐसे उपान्तरणों सहित, जैसा कि वह आवश्यक समझे, अपना अनुमोदन देगा। (४) निजी विश्वविद्यालय विनियामक आयोग द्वारा तथा अनुमोदित प्रथम परिनियमों पर, अपनी सहमति संसूचित करेगा और यदि वह विनियामक आयोग द्वारा उपधारा (३) के अधीन किये गये उपान्तरणों को प्रषाभशील करने की वांछा नहीं रखता है तो वह उसके लिए कारण बताएगा तथा विनियामक आयोग निजी विश्वविद्यालय द्वारा दिये गये सुझावों को स्वीकार अथवा अस्वीकार कर सकेगा।
27. पश्चात्वर्ती परिनियम
(१) इस अधिनियम एवं उसके अधीन बनाए गए नियमों के उपबंधों के अध्यधीन रहते हुए निजी विश्वविद्यालय के परिनियमों में निम्नलिखित में से समस्त विषयों अथवा उनमें से किसी भी विषय के लिए उपबंध हो सकेंगे, अर्थात् :— (क) निजी विश्वविद्यालय के नये प्राधिकारियों का सृजन; (ख) लेखा नीति एवं वित्तीय प्रक्रिया; (ग) निजी विश्वविद्यालय के प्राधिकारियों में अध्यापकों का प्रतिनिधित्व; (घ) नये विभागों का सृजन तथा विद्यमान विभागों का उत्सादन या पुनर्संरचना; (ङ) पदक एवं पुरस्कारों को संस्थापित करना; (च) पदों का सृजन एवं उसके उत्सादन की प्रक्रिया; (छ) फीस का पुनरीक्षण; (ज) विभिन्न पाठ्यक्रमों में स्थानों की संख्या में परिवर्तन; और (झ) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन समस्त ऐसे विषय, जो परिनियमों द्वारा विहित किए जाए। (२) निजी विश्वविद्यालय के प्रथम परिनियमों से भिन्न अन्य परिनियम प्रबंधन बोर्ड द्वारा शासी निकाय के अनुमोदन से बनाये जाएंगे। (३) उपधारा (२) के अधीन बनाए गए परिनियम, विनियामक आयोग को भेजे जाएंगे तथा विनियामक आयोग, यदि आवश्यक समझे, परिनियम की प्राप्ति की तारीख से दो मास के भीतर उनमें उपान्तरणों के लिए सुझाव दे सकेगा। (४) शासी निकाय, विनियामक आयोग द्वारा सुझाये गये उपान्तरणों पर विचार करेगा एवं सुझावों पर अपनी टिप्पणी सहित परिनियमों को विनियामक आयोग को वापस करेगा। (५) विनियामक आयोग, शासी निकाय द्वारा दिये गये सुझावों पर विचार करेगा एवं विनियामक आयोग द्वारा अंतिम रूप से यथा अनुमोदित परिनियम प्रवृत्त होंगे।
28. प्रथम अध्यादेश
(१) इस अधिनियम तथा उसके अधीन बनाए गए नियमों या परिनियमों के उपबंधों के अध्यधीन रहते हुए प्रथम अध्यादेश में निम्नलिखित समस्त विषयों या उनमें से किसी भी विषय के लिए उपबंध हो सकेंगे, अर्थात् :— (क) विनिर्दिष्ट प्रवर्गों के छात्रों हेतु विशेष रूप से विचार किए जाने का स्पष्ट उल्लेख करते हुए निजी विश्वविद्यालय में छात्रों का प्रवेश और नामांकन; (ख) निजी विश्वविद्यालय की उपाधियों, उपाधि-पत्रों और प्रमाण-पत्रों के लिए विहित किए जाने वाले अध्ययन के पाठ्यक्रमों का ब्योरा; (ग) निजी विश्वविद्यालय की उपाधियां, उपाधि-पत्रों, प्रमाण-पत्रों तथा अन्य विद्या संबंधी सम्मान का प्रदान किया जाना, उनके लिये न्यूनतम अर्हताएं तथा उन्हें प्रदान करने एवं प्राप्त करने संबंधी अपनाये जाने वाले साधन; (घ) अध्ययवृत्तियों (फेलोशिप), छात्रवृत्ति, शिक्षावृत्ति, पदकों एवं पारितोषिक प्रदान करने संबंधी शर्तें; (ङ) परीक्षाओं का संचालन करना जिनमें परीक्षा निकायों, परीक्षकों एवं मॉडरेटरों की नियुक्ति की रीति तथा कर्तव्य सम्मिलित है; (च) निजी विश्वविद्यालय की उपाधियों एवं उपाधि-पत्रों के विभिन्न पाठ्यक्रमों के लिए प्रभार्य परीक्षा फीस; (छ) निजी विश्वविद्यालय के छात्रों के आवास की शर्तें; (ज) छात्रों के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही संबंधी उपबंध; (झ) किसी अन्य निकाय का सृजन, संरचना तथा उसके कृत्य जो निजी विश्वविद्यालय के शैक्षणिक वातावरण में सुधार हेतु आवश्यक समझे जाएं; (ञ) अन्य विश्वविद्यालयों तथा उच्चतर शिक्षा की संस्थाओं से सहयोग एवं सहभागिता की रीति; और (ट) ऐसे अन्य समस्त विषय जिनका इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए परिनियमों द्वारा, अध्यादेशों द्वारा उपबंधित किया जाना अपेक्षित हो; (२) निजी विश्वविद्यालय का प्रथम अध्यादेश, कुलपति द्वारा बनाया जाएगा तथा विनियामक आयोग को अनुमोदन हेतु प्रस्तुत किया जायेगा। (३) विनियामक आयोग, उपधारा (२) के अधीन कुलपति द्वारा प्रस्तुत प्रथम अध्यादेशों पर उसकी प्राप्ति की तारीख से दो मास के भीतर विचार करेगा तथा उसे या तो अनुमोदित करेगा या उसके उपान्तरण के लिए सुझाव देगा। (४) कुलपति, विनियामक आयोग द्वारा दिये गये सुझावों पर अपनी टिप्पणी देगा एवं प्रथम अध्यादेश आयोग को वापस करेगा तथा विनियामक आयोग या तो कुलपति की टिप्पणी को अनुमोदित करेगा या उसे अनुमोदित करेगा और उसके अंतिम विनिश्चय के आधार पर अध्यादेश, जैसा कि विनियामक आयोग द्वारा अनुमोदित किया गया है, प्रवृत्त हो जाएगा।
29. पश्चात्वर्ती अध्यादेश
प्रथम अध्यादेश से भिन्न समस्त अध्यादेश, विद्यापरिषद द्वारा प्रबंधन बोर्ड के अनुमोदन से बनाए जायेंगे। परन्तु प्रथम अध्यादेश का संशोधन, विनियामक आयोग के अनुमोदन के पश्चात किया जाएगा।
30. रिक्तियां
निजी विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकारी या निकाय द्वारा किया गया कोई कार्य या उसके द्वारा की गई कोई कार्यवाही केवल कोई रिक्ति होने के कारण या उसके गठन में किसी त्रुटि के कारण अविधिमान्य नहीं होगी।
31. आपात रिक्तियों का भरा जाना
निजी विश्वविद्यालय के प्राधिकारियों अथवा निकायों के सदस्यों में से किसी सदस्य की मृत्यु, पदत्याग अथवा हटाए जाने या जिस हैसियत में उसकी नियुक्ति या नामांकन हुआ था उसमें परिवर्तन होने के कारण उद्भूत रिक्तियों को उस व्यक्ति या निकाय द्वारा यथासंभव शीघ्र भरा जाएगा, जिसने ऐसे सदस्य को नियुक्त या नामनिर्दिष्ट किया था : परन्तु आपात रिक्ति होने पर निजी विश्वविद्यालय के प्राधिकारी या निकाय के सदस्य के रूप में नियुक्त या नामनिर्दिष्ट किया गया व्यक्ति उस सदस्य की, जिसके स्थान पर वह नियुक्त किया गया है या नामनिर्दिष्ट किया गया है, केवल शेष पदावधि के लिए ऐसे प्राधिकारी या निकाय का सदस्य रहेगा।
32. समिति
निजी विश्वविद्यालय के प्राधिकारियों और अधिकारियों द्वारा ऐसे निर्देश निबंधन के साथ ऐसी समितियों का गठन किया जाएगा जैसा कि ऐसी समितियों द्वारा किए जाने वाले विशिष्ट कार्य के लिए आवश्यक हो, और ऐसी समितियों का गठन तथा उनके कर्तव्य ऐसे होंगे, जैसे कि परिनियमों द्वारा विहित किए जाएं।
33. निजी विश्वविद्यालय के अभिलेख के सबूत की पद्धति
निजी विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकारी या समिति की किसी रसीद, आवेदन, सूचना, आदेश, कार्यवाही या किसी संकल्प की या निजी विश्वविद्यालय के कब्जे में के अन्य दस्तावेज की कोई प्रति यदि कुलसचिव द्वारा प्रमाणित कर दी जाती है तो वह ऐसी रसीद, आवेदन, सूचना, आदेश, कार्यवाही, संकल्प या दस्तावेज की प्रथमदृष्टया साक्ष्य या रजिस्टर में की प्रविष्टि की विद्यमानता मानी जाएगी और किसी मामले या संव्यवहार में साक्ष्य के रूप में उसी प्रकार ग्राह्य होगी जैसी कि उसके मूल रूप में प्रस्तुत किये जाने पर ग्राह्य होती।
34. विनियम
(१) इस अधिनियम के द्वारा या इसके अधीन गठित निजी विश्वविद्यालय के प्राधिकारी, इस अधिनियम के और निजी विश्वविद्यालय के परिनियमों तथा अध्यादेशों के उपबंधों के अध्यधीन रहते हुए विनियम बना सकेंगे। (२) प्रबंधन बोर्ड इस धारा के अधीन किसी प्राधिकारी द्वारा बनाये गये विनियमों को उपान्तरित अथवा बातिल कर सकेगा।
35. परिनियम, अध्यादेश और विनियम का प्रर्वतन
समस्त परिनियम, अध्यादेश एवं विनियम राजपत्र में उनके प्रकाशित होने की तारीख से प्रवृत्त होंगे।
36. विनियामक आयोग.
३६. (१) राज्य सरकार द्वारा, राज्य स्तर पर विनियामक संरचना प्रदाय करने के प्रयोजन से तथा अध्यापन, परीक्षा, गवेषणा, विस्तार कार्यक्रम, छात्रों के हितों का संरक्षण तथा कर्मचारियों की युक्तियुक्त सेवा शर्तों को सुनिश्चित करने के प्रयोजन हेतु और राज्य सरकार तथा केन्द्रीय विनियामक निकायों के बीच मध्यस्थ के रूप में कार्य करने के लिए, एक विनियामक आयोग की स्थापना की जाएगी.
(२) विनियामक आयोग, कुलाध्यक्ष के सामान्य नियंत्रण के अधीन कार्य करेगा.
(३) विनियामक आयोग में एक सभापति (चेयरमेन) और दो पूर्णकालिक सदस्य होंगे जिनमें से एक सदस्य "शैक्षणिक" और दूसरा सदस्य, "सदस्य-प्रशासनिक" होगा तथा दो से अनधिक अंशकालिक सदस्य होंगे.
(४) विनियामक में आयोग एक पूर्णकालिक या अंशकालिक सचिव होगा.
(५) कुलाध्यक्ष द्वारा सभापति (चेयरमेन) की नियुक्ति राज्य सरकार द्वारा अनुशंसित पैनल में से की जायेगी, जिसमें ऐसे प्राप्त शिक्षाविद सम्मिलित होंगे, जिन्हें उच्चतर शिक्षा की संस्थाओं के कार्य का पूर्ण ज्ञान हो.
(६) सदस्य तथा सचिव की नियुक्ति राज्य सरकार द्वारा अनुशंसित पैनल में से कुलाध्यक्ष द्वारा की जायेगी, जिसमें वित्त, विधि, प्रशासन और प्रबंधन के क्षेत्र के विख्यात व्यक्ति होंगे.
(७) सभापति (चेयरमेन) तथा सदस्य, इस अधिनियम के अधीन स्थापित किन्हीं निजी विश्वविद्यालयों से किसी संबद्ध नहीं होंगे.
(८) विनियामक आयोग का सभापति (चेयरमेन) तथा सदस्य उस तारीख, से जिसको वह अपना पद ग्रहण करता इसके पैंसठ वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने तक, इनमें से जो पूर्वतर हो, क्रमशः तीन वर्ष तथा दो वर्ष की अवधि तक पद धारण करेगा और वह पैंसठ वर्ष की उच्चतर आयु सीमा के अध्यधीन रहते हुए पूर्वोक्त वर्षों की द्वितीय अवधि के लिए विचार किए जाने हेतु पात्र होगा : परन्तु यथास्थिति, तीन वर्ष या दो वर्ष की उक्त कालावधि का अवसान होने पर भी वह उसके उत्तराधिकारी के नियुक्त होने और अपना पद ग्रहण करने तक पद पर बना रहेगा किन्तु ऐसी कालावधि छह मास से अधिक नहीं होगी : परन्तु यह और कि अवधि के अवसान के पश्चात् विनियामक आयोग का सभापति (चेयरमेन) तथा सदस्य किसी भी रूप में या किसी भी नाम में, चाहे वह जो भी हो, किन्हीं आर्थिक फायदों और इस अधिनियम के अधीन स्थापित निजी विश्वविद्यालयों में से किसी विश्वविद्यालय में कोई कर्तव्यभार या नियोजन स्वीकार करने से प्रतिषिद्ध होगा.
(९) विनियामक आयोग के सभापति (चेयरमेन) तथा सदस्यों की सेवा के अन्य निबंधन तथा शर्तें, विनियामक आयोग के आदेशों तथा विनिश्चयों के अधिप्रमाणन की पद्धति और विनियामक आयोग द्वारा जारी की गई लिखत, विनियामक आयोग के बैठक की प्रक्रिया, विनियामक आयोग के कर्मचारीवृन्द की भरती तथा सेवा शर्तें, विशिष्ट प्रयोजन के लिए विनियामक आयोग के साथ व्यक्तियों का अस्थायी संयोजन, विनियामक आयोग की निधि, उसका बजट, वार्षिक रिपोर्ट, लेखे, संपरीक्षा और ऐसे अन्य विषयों के संबंध में, जो विनियामक आयोग के उचित कार्यकरण के लिए अपेक्षित हो, राज्य सरकार द्वारा इस संबंध में बनाए गए नियमों में उपबंध किया जाएगा.
(१०) विनियामक आयोग का यह सामान्य कर्तव्य होगा कि वह :— (क) निजी विश्वविद्यालयों में अध्यापन, परीक्षा और गवेषणा का मानक बनाए रखने के लिये समस्त ऐसे कदम उठाए जिन्हें वह आवश्यक समझे;
37. वार्षिक रिपोर्ट
(1) प्रबंधन बोर्ड द्वारा निजी विश्वविद्यालय की वार्षिक रिपोर्ट तैयार की जाएगी, जिसमें अन्य विषयों में निजी विश्वविद्यालय द्वारा उसके उद्देश्यों की पूर्ति हेतु उठाये गये कदम जिसका अनुमोदन शासी निकाय द्वारा किया जाएगा, सम्मिलित होंगे तथा इसकी एक प्रति प्रायोजी निकाय को प्रस्तुत की जाएगी। (2) उपधारा (1) के अधीन तैयार की गई वार्षिक रिपोर्ट की प्रतियां कुलाध्यक्ष एवं विनियामक आयोग को भी प्रस्तुत की जाएगी।
38. वार्षिक लेखा एवं संपरीक्षा
(1) निजी विश्वविद्यालय का वार्षिक लेखा जिसमें तुलनपत्र सम्मिलित है, प्रबंधन बोर्ड के निर्देशों के अधीन तैयार किया जाएगा और निजी विश्वविद्यालय द्वारा इस प्रयोजन हेतु नियुक्त लेखा संपरीक्षक द्वारा वर्ष में कम से कम एकबार वार्षिक लेखों की संपरीक्षा की जाएगी। (2) संपरीक्षा रिपोर्ट के साथ वार्षिक लेखा की एक प्रति शासी निकाय को प्रस्तुत की जाएगी। (3) वार्षिक लेखा और संपरीक्षा रिपोर्ट की एक प्रति शासी निकाय की टीप सहित, यदि कोई हो, कुलाध्यक्ष को तथा विनियामक आयोग को प्रस्तुत की जाएगी। (4) विनियामक आयोग वार्षिक रिपोर्ट तथा लेखा तथा संपरीक्षा रिपोर्ट का परीक्षण करेगा और निजी विश्वविद्यालय की वार्षिक रिपोर्ट तथा लेखा और संपरीक्षा रिपोर्ट से उद्भूत विषय पर विनियामक आयोग द्वारा किये गये निर्देश, निजी विश्वविद्यालय पर आबद्धकर होंगे।
39. नियतकालिक निरीक्षण
(1) विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, निजी विश्वविद्यालय का नियतकालिक निरीक्षण कर सकेगा तथा इस प्रयोजन के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, संबंधित निजी विश्वविद्यालय से समस्त सुसंगत जानकारियां मांग सकेगा, जैसा कि समय-समय पर यथा संशोधित विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (विश्वविद्यालयों की विवरणी तथा जानकारी) नियम, 1979 में उपबंधित है। (2) निजी विश्वविद्यालय, जो स्नातक उपाधि, स्नातकोत्तर उपाधि और/या उपाधिपत्र पाठ्यक्रम प्रदान करता हो, के निरीक्षण एवं मूल्यांकन के पश्चात विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, निजी विश्वविद्यालय की कोई न्यूनता या विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के सुसंगत विनियमों से कोई असमानता पाता है तो उसे ठीक करने के लिए उचित अवसर प्रदान करेगा तथा यदि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का समाधान हो जाता है कि निजी विश्वविद्यालय ऐसा अवसर प्राप्त होने के पश्चात विनियमों में से किसी उपबंध का पालन करने में असफल रहता है तो विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, निजी विश्वविद्यालय को यथास्थिति, स्नातक उपाधि, स्नातकोत्तर उपाधि और/या उपाधि पत्र के लिए पाठ्यक्रम को प्रस्तावित करने से प्रतिबंधित करने का आदेश उस समय तक दे सकेगा, जब तक कि न्यूनता को ठीक न कर दिया जाए। (3) विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, निजी विश्वविद्यालय के विरुद्ध ऐसी स्नातक उपाधि, स्नातकोत्तर उपाधि, उपाधि-पत्र देने के लिए कार्रवाई कर सकता है जो विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा विनिर्दिष्ट नहीं है, तथा अधिसूचना द्वारा सूचित करेगा और ऐसे कार्यक्रम जारी रखने और अविनिर्दिष्ट उपाधियाँ प्रदान करने वाला निजी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम, 1956 (1956 का 3) की धारा 24 के अधीन शास्ति का दायी होगा।
40. प्रायोजी निकाय का विघटन होने पर निजी विश्वविद्यालय का प्रबंधन
(1) यदि प्रायोजी निकाय स्वयं को विघटित करने का प्रस्ताव करता है या इस अधिनियम के अधीन स्थापित निजी विश्वविद्यालय के कृत्यों को बन्द करना चाहता है तो उसकी योजना की, जिसके द्वारा पाठ्यक्रमों का पूर्ण होना तथा परीक्षाओं का संचालन सुनिश्चित किया जाए, सूचना, विनियामक आयोग को देगा और उस सम्भावी तारीख की घोषणा करेगा जिससे किसी नए छात्र को प्रवेश नहीं दिया जाएगा। (2) ऐसी सूचना प्राप्त होने पर विनियामक आयोग को यह अधिकार होगा कि वह प्रायोजी निकाय को उपधारा (1) के अधीन दायित्वों को पूरा करने के लिए ऐसे निर्देश दे, जो वह आवश्यक समझें और यदि प्रायोजी निकाय उपधारा (1) के अधीन उपबंधों का उल्लंघन करता है, तो विनियामक आयोग द्वारा विन्यास निधि को समपहृत किया जाएगा और विश्वविद्यालय के छात्रों का पाठ्यक्रम पूरा करने, परीक्षा संचालन, उपाधि देने के संबंध में या तो स्वयं कार्य करेगा या वह कार्य किसी अन्य विश्वविद्यालय को सौंपने संबंधी व्यवस्था इस रीति में करेगा कि छात्रों के हित प्रतिकूल रूप से प्रभावित न हों। छात्रों को दी गई इन अवस्थाओं पर जो व्यय होगा, उसे निजी विश्वविद्यालय की विन्यास निधि और/या सामान्य निधि से पूरा किया जाएगा। (3) विनियामक आयोग की रिपोर्ट पर या अन्यथा यदि राज्य सरकार को यह प्रतीत हो कि निजी विश्वविद्यालय में वित्तीय कुप्रबंध तथा कुशासन की स्थिति उद्भूत हो गई है तो वह निजी विश्वविद्यालय से पैंतालीस दिन के भीतर उसे दर्शाने की अपेक्षा करते हुए सूचना जारी करेगी कि:- (क) उसके परिसमापन का आदेश क्यों न किया जाए। (ख) धारा (7) के अंतर्गत प्रबंधन बोर्ड को क्यों न निलंबित कर दिया जाए तथा प्रशासक नियुक्त कर दिया जाए। (4) यदि सरकार यह आवश्यक समझती है कि प्रबंधन बोर्ड को निलंबित कर दिया जाए तो वह राजपत्र में अधिसूचना द्वारा प्रबंधन बोर्ड के निलंबन का आदेश करेगी और प्रायोजी निकाय के परामर्श से निजी विश्वविद्यालय के प्रबंधन हेतु ऐसी व्यवस्था करेगी जैसी कि वह आवश्यक समझे। (5) यदि धारा (1) के अधीन जारी की गई सूचना के बारे में निजी विश्वविद्यालय का उत्तर प्राप्त कर लेने पर जो समाधान हो जाता है कि प्रथमदृष्टया प्रकरण वित्तीय कुप्रबंध, कुशासन या इस अधिनियम के उपबंधों या उसके अधीन बनाए गए विनियमों के उल्लंघन का है, तो वह ऐसी जांच के आदेश देगी, जो वह आवश्यक समझे।
41. कतिपय परिस्थितियों में राज्य सरकार की विशेष शक्तियां
(4) राज्य सरकार, उपधारा (3) के अधीन जांच के प्रयोजन के लिए, आरोपों में से किसी भी आरोप की जांच करने और उस पर रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए कोई अधिकारी अथवा प्राधिकारी, नियुक्त करेगी। (5) उपधारा (4) के अधीन नियुक्त जांच प्राधिकारी को वही शक्तियां होंगी जो कि सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 (1908 का सं. 5) के अधीन निम्नलिखित विषयों के संबंध में किसी वाद का विचारण करते समय सिविल न्यायालय में निहित हैं, अर्थात्:- (क) समन जारी करने तथा किसी व्यक्ति को उपस्थित होने के लिए बाध्य करना तथा उसका परीक्षण करना; (ख) किसी ऐसे दस्तावेज अथवा अन्य अपेक्षित सामग्री का प्रकटीकरण तथा उसका प्रस्तुत किया जाना; (ग) किसी न्यायालय या कार्यालय से सार्वजनिक अभिलेख मंगवाया जाना; (घ) कोई अन्य विषय, जो विहित किया जाए। (6) इस अधिनियम के अधीन जांच कर रहे प्रत्येक जांच प्राधिकारी को दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1973 का सं. 2) की धारा 195 तथा अध्याय सोलह के प्रयोजन हेतु सिविल न्यायालय माना जाएगा। (7) जांच रिपोर्ट प्राप्त होने पर यदि राज्य सरकार का यह समाधान हो गया है कि वित्तीय कुप्रबंध और कुशासन के कारण ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है कि निजी विश्वविद्यालय की वित्तीय स्थिरता या प्रशासन असुरक्षित हो गया है तो वह राजपत्र द्वारा, अधिसूचना द्वारा, निजी विश्वविद्यालय के समापन का आदेश देगी अथवा प्रशासक की नियुक्ति करके, जिसमें शासी निकाय की शक्तियां होंगी, निजी विश्वविद्यालय को चालू रखवाएगी: परन्तु समापन का कोई आदेश तब तक प्रभावी नहीं होगा जब तक अधिनियम की अनुसूची से ऐसे निजी विश्वविद्यालय से संबंधित प्रविष्टि को हटा न दिया जाये। (8) उपधारा (7) के अधीन समापन की अधिसूचना जारी करने के समय राज्य सरकार, वर्तमान पाठ्यक्रम की समाप्ति तक निजी विश्वविद्यालय के कार्य प्रशासन हेतु व्यवस्था करेगी। (9) उपधारा (8) के अधीन निजी विश्वविद्यालय के प्रबंध की कालावधि के दौरान राज्य सरकार, निजी विश्वविद्यालय के पास उपलब्ध निधि का उपयोग करेगी और अधिशेष, यदि कोई हो, समपहृत किया जायेगा। (10) जांच की प्रक्रिया में और छात्रों के प्रवेश पूर्ण होने तक उपगत समस्त व्यय की पूर्ति निजी विश्वविद्यालय की विन्यास निधि और सामान्य निधि से की जाएगी।
42. नियम बनाने की शक्ति
(1) राज्य सरकार, इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना द्वारा नियम बना सकेगी। (2) पूर्वगामी शक्तियों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, इन नियमों में निम्नलिखित समस्त मामलों के या किसी मामले के बारे में उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात्:- (क) निजी विश्वविद्यालय की स्थापना संबंधी प्रस्ताव की रीति तथा धारा 4 की उपधारा (1) के अंतर्गत देय फीस; (ख) धारा 4 की उपधारा (2) के अधीन परियोजना रिपोर्ट में निहित किए जाने वाले अन्य ब्यौरे; (ग) धारा 11 की उपधारा (3) के अधीन विन्यास निधि की स्थापना, निवेश, की रीति उससे होने वाली आय का प्रायोजी निकाय को भुगतान, उसके समपहरन तथा प्रायोजी निकाय को वापस करने की पद्धति; (घ) धारा 12 के परंतुक अधीन निजी विश्वविद्यालय से फीस का संग्रहण और इस प्रकार संग्रहीत राशि को संचित निधि में जमा करने की पद्धति; (ड.) धारा 25 की उपधारा (1) के अधीन अन्य विषय, जिनका उपबंध परिनियमों द्वारा किया जाना है; (च) विनियामक आयोग के आदेशों तथा विनिश्चयों और विनियामक आयोग द्वारा जारी की गई लिखितों के अधिप्रमाणीकरण की पद्धति, सभापति (चेयरमेन) तथा सदस्यों की सेवा के निबंधन तथा शर्तें, विनियामक आयोग की बैठक की प्रक्रिया, विनियामक आयोग के कर्मचारिवृन्द और उनकी सेवा शर्तें का उपबंध, विनियामक आयोग के साथ व्यक्तियों का अस्थायी सहयोजन, उसका बजट, वार्षिक रिपोर्ट, लेखे तथा संपरीक्षा और ऐसे अन्य मामले जो धारा 36 की उपधारा (1) के अधीन विनियामक आयोग के समुचित कार्यकरण के लिए आवश्यक हों; (छ) अन्य मामले जिनका इस अधिनियम के अधीन नियमों द्वारा विहित किया जाना अपेक्षित हो। (3) इस अधिनियम के अधीन बनाए गए समस्त नियम विधान सभा के पटल पर रखे जाएंगे।
43. कठिनाइयां दूर करने की शक्ति
यदि इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने में कोई कठिनाई उद्भूत होती है तो राज्य सरकार, प्रकाशित आदेश द्वारा, जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हो, कठिनाई दूर कर सकेगी: परन्तु ऐसा कोई आदेश, इस अधिनियम के प्रारम्भ होने से दो वर्ष की कालावधि के अवसान के पश्चात् नहीं दिया जाएगा।
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