section 31
कुलपति की शक्तियां तथा कर्तव्य
The Madhya Pradesh Dharmashastra National Law University Act, 2018३१. (१) कुलपति, विश्वविद्यालय का प्रधान प्रशासनिक तथा विद्या विषयक अधिकारी होगा और वह कार्य परिषद् का तथा विद्या परिषद् का पदेन सदस्य एवं अध्यक्ष होगा तथा विश्वविद्यालय के ऐसे अन्य प्राधिकारियों, समितियों तथा निकायों का, जिनका कि वह सदस्य है, अध्यक्ष होगा. वह विश्वविद्यालय के किसी भी प्राधिकारी समिति या अन्य निकाय के किसी सम्मलेन में उपस्थित होने तथा बोलने का हकदार होगा, किन्तु वह उसमें मत देने का तब तक हकदार नहीं होगा जब तक कि वह संबंधित प्राधिकारी, समिति या निकाय का सदस्य न हो.
(२) यह सुनिश्चित करना कुलपति का कर्तव्य होगा कि इस अधिनियम तथा परिनियमों का निष्ठापूर्वक अनुपालन किया जाता है और उसे इस प्रयोजन के लिए समस्त आवश्यक शक्तियां प्राप्त होंगी.
(३) कुलपति को कार्य परिषद्, विद्या परिषद् के तथा विश्वविद्यालय के ऐसे अन्य प्राधिकारियों, समितियों तथा निकायों के, जिनका कि वह अध्यक्ष है, सम्मलेन बुलाने की शक्ति होगी. वह विश्वविद्यालय के किसी अन्य अधिकारी को यह शक्ति प्रत्यायोजित कर सकेगा.
(४) यदि कुलपति की राय में कोई ऐसी आपात स्थिति उत्पन्न हो गई है जिसमें तुरन्त कार्रवाई की जाना अपेक्षित है तो कुलपति ऐसी कार्रवाई करेगा जैसी कि वह आवश्यक समझे और तत्पश्चात् यथाशीघ्र, अपनी कार्रवाई की रिपोर्ट ऐसे अधिकारी, प्राधिकारी, समिति या अन्य निकाय को करेगा, जो कि सामान्य अनुक्रम में उस मामले के संबंध में कार्रवाई करता :
परन्तु कुलपति द्वारा की गई कार्रवाई से विश्वविद्यालय तीन मास से अधिक कालावधि के लिए किसी भी आवर्ती व्यय हेतु वचनबद्ध नहीं होगा :
परन्तु यह और कि जहां कुलपति द्वारा की गई ऐसी कोई कार्रवाई विश्वविद्यालय की सेवा में के किसी व्यक्ति पर प्रभाव डालती है वहां ऐसा व्यक्ति, उस तारीख से, जिसको कि उसे ऐसी कार्रवाई की संसूचना दी गई है, तीस दिन के भीतर कार्य परिषद् को अपील प्रस्तुत करने का हकदार होगा :
परन्तु यह भी कि इस शक्ति विस्तार विनियमों में संशोधन या नियुक्तियों से संबंधित किसी मामले पर नहीं होगा.
(५) उपधारा (४) के अधीन रिपोर्ट प्राप्त होने पर, यदि संबंधित प्राधिकारी, समिति या निकाय, कुलपति द्वारा की गई कार्रवाई का अनुमोदन नहीं करता है, तो वह मामले को कुलाधिपति को निर्दिष्ट करेगा जिसका उस पर विनिश्चय अंतिम होगा.
(६) उपधारा (४) के अधीन कुलपति द्वारा की गई कार्रवाई समुचित प्राधिकारी द्वारा की गई कार्रवाई समझी जाएगी जब तक कि वह उपधारा (५) के अधीन दिए गए निर्देश के प्राप्त होने पर कुलाधिपति द्वारा अपास्त नहीं कर दी गई है या उपधारा (४) के द्वितीय परन्तुक के अधीन अपील किए जाने पर कार्य परिषद् द्वारा अपास्त नहीं कर दी गई है.
(७) यदि कुलपति की राय में विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकारी, समिति या अन्य निकाय की किसी भी कार्यवाही से विश्वविद्यालय के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना संभाव्य है, तो वह अपने कारण अभिलिखित करेगा तथा मामला कुलाधिपति को निर्दिष्ट करेगा और तदनुसार उसकी इत्तिला संबंधित प्राधिकारी, समिति या अन्य निकाय को भी देगा जिस पर संबंधित विनिश्चय तब तक प्रभावशील नहीं किया जाएगा जब तक कि मामला कुलाधिपति द्वारा विनिश्चित नहीं कर दिया जाता है.
(८) कुलपति, विश्वविद्यालय के कार्यकलापों पर सामान्य नियंत्रण रखेगा और विश्वविद्यालय के प्राधिकारियों के विनिश्चयों को प्रभावशील करेगा.
(९) विश्वविद्यालय के छात्रों के बीच अनुशासन बनाए रखने के लिए कुलपति अंतिम प्राधिकारी होगा. इस हेतु उसके निर्देश विभागाध्यक्षों, छात्रावासों तथा संस्थाओं के प्रमुखों द्वारा क्रियान्वित किए जाएंगे.
(१०) उपधारा (९) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, किसी छात्र को किसी परीक्षा से विवर्जित करने या विश्वविद्यालय या छात्रावास या संस्था से निष्कासित करने का दण्ड कुलपति के प्रतिवेदन पर कार्य परिषद् द्वारा विचारित एवं अधिरोपित किया जाएगा :
परन्तु ऐसा कोई दण्ड, संबंधित छात्र को उसके विरुद्ध की जाने वाली प्रस्तावित कार्रवाई के विरुद्ध सुनवाई का युक्तीयुक्त अवसर दिये बिना अधिरोपित नहीं किया जाएगा.
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