section 10
धारा 8 के अधीन संचालक की रिपोर्ट के पश्चात् अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया
The Madhya Pradesh Sthaniya Nidhi Samparikha Adhiniyam, 1973(1) धारा 8 के अधीन रिपोर्ट प्राप्त होने के पैंतालीस दिन के भीतर स्थानीय प्राधिकारी का प्रधान स्थानीय प्राधिकारी (क) उस रिपोर्ट में बतलाई गई ऐसी त्रुटियों या अनियमितताओं को छांटेगा या छंटवाएगा— (एक) जिन्हें वह कार्यपालिक अधिकारी स्थानीय प्राधिकारी को निर्दिष्ट किये बिना ही दूर करने के लिये सक्षम हो; (दो) जिन्हें दूर करने के लिये स्थानीय प्राधिकारी ही सक्षम हो; (ख) स्थानीय प्राधिकारी से संबंधित विधि में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, उस रिपोर्ट पर विचार करने के लिये स्थानीय प्राधिकारी का एक विशेष सम्मिलन बुलायेगा, जो सम्मिलन स्थानीय प्राधिकारी से संबंधित विधि के प्रयोजनों के लिये एक ऐसा विशेष सम्मिलन समझा जायेगा जो उक्त विधि के अधीन संयोजित किया गया हो; और (ग) स्थानीय प्राधिकारी के उस विशेष सम्मिलन के, जो कि खण्ड (ख) के अधीन बुलाया गया हो, समक्ष उस रिपोर्ट को एक ऐसे टिप्पण सहित प्रस्तुत करेगी जिसमें उन तथ्यों के बारे में, जो कि उस रिपोर्ट में वर्णित किये गये हों, स्थिति वह कार्यवाही, जिसे कि वह उन तथ्यों के बारे में की जाने के लिये प्रस्तावित करे, दर्शायी जावेगी। स्पष्टीकरण.—किसी "नगरपालिक निगम" के मामले में खण्ड (ख) तथा (ग) के प्रयोजनों के लिये उस नगरपालिक निगम के महापौर को नगरपालिक आयुक्त के स्थान पर स्थानीय प्राधिकारी का प्रधान अधिकारी समझा जाएगा। (1-क) यदि स्थानीय प्राधिकारी का प्रधान अधिकारी, उपधारा (1) के खण्ड (ख) द्वारा अपेक्षित किये गये अनुसार विशेष सम्मिलन नहीं बुलाता है, तो स्थानीय प्राधिकारी का कार्यपालिक अधिकारी उपधारा (1) में वर्णित कालावधि के अवसान की तारीख से तीस दिन के भीतर विशेष सम्मिलन बुलायेगा और उपधारा (1) के खण्ड (ख) तथा (ग) के उपबन्ध उसके उसी प्रकार लागू होंगे जिस प्रकार कि वे उक्त उपधारा के खण्ड (ख) के अधीन संयोजित किये गये विशेष सम्मिलन को लागू होते हैं। स्पष्टीकरण.—इस उपधारा के प्रयोजन के लिये, "स्थानीय प्राधिकारी के कार्यपालिक अधिकारी से अभिप्रेत है,— (एक) नगरपालिक निगम के मामले में, नगरपालिका आयुक्त; (दो) नगरपालिका परिषद या अधिसूचित क्षेत्र समिति के मामले में, मुख्य नगरपालिका अधिकारी; (तीन) नगर तथा ग्राम विकास प्राधिकारी के मामले में, मुख्य कार्यपालिक अधिकारी; (चार) (क) ग्राम पंचायत के मामले में, सचिव; (ख) जनपद पंचायत के मामले में, मुख्य कार्यपालिक अधिकारी; (ग) जिला पंचायत के मामले में, सचिव; (पाँच) कृषि-उपज मण्डी समिति के मामले में, सचिव; (छ:) किसी अन्य स्थानीय प्राधिकारी के मामले में, उसका ऐसा पदाधिकारी या अधिकारी जिसे राज्य सरक र अधिसूचना द्वारा, इस सम्बन्ध में विनिर्दिष्ट करे। (1-ख) स्थानीय प्राधिकारी का प्रधान अधिकारी उपधारा (1) के अधीन बुलाये गये विशेष सम्मिलन में उस विषय पर स्थानीय प्राधिकारी द्वारा विचार कर लिया जाने के पश्चात्, त्रुटियों या अनियमितताओं का परिशोधन करने के लिये आवश्यक कार्यवाही करेगा तथा रिपोर्ट प्राप्त होने के चार मास के भीतर— (क) संचालक को इस बात की प्रज्ञापना भेजेगा कि उस रिपोर्ट में बतलाई गई त्रुटियां या अनियमितताएं दूर कर दी गई हैं; या (ख) ऐसी त्रुटियों या अनियमितताओं के सम्बन्ध में स्पष्टीकरण, जो कि स्थानीय प्राधिकारी देना चाहे, संचालक को देगा। (1-ग) यदि स्थानीय प्राधिकारी का प्रधान अधिकारी को वह रिपोर्ट समझने में कोई कठिनाई मालूम होती है या उस बारे में कोई शंका होती है, तो वह ऐसी रीति में तथा ऐसी कालावधि के भीतर जो कि विहित की जाय, संचालक से उस रिपोर्ट के सम्बन्ध में स्थिति स्पष्ट करेगा। संचालक, उन बातों को स्पष्ट करने के लिये जिन्हें कि स्थानीय प्राधिकारी के प्रधान अधिकारी को, उससे अपेक्षा करते हुए समन कर सकेगा कि वह स्वयं ऐसे समय पर तथा ऐसे स्थान पर और ऐसे अभिलेखों सहित, जैसा कि वह (संचालक) निर्देशित करे, उपस्थित हो या संचालक, यदि वह ऐसा करना उचित समझे अभिलेख का निरीक्षण ऐसे स्थान पर जहां कि वह रखा हुआ हो कर सकेगा।” (2) ऐसी प्रज्ञापना या स्पष्टीकरण के प्राप्त होने पर, संचालक अपनी रिपोर्ट में वर्णित समस्त विषयों के बारे में (क) स्थानीय प्राधिकारी के प्रधान अधिकारी द्वारा दी गई प्रज्ञापना या दिये गये स्पष्टीकरण को प्रतिगृहीत कर सकेगा तथा आरोपों का प्रत्याहरण कर सकेगा; या (ख) यह निदेश दे सकेगा कि आगामी संपरीक्षा के समय या किसी पूर्वतर तारीख को उस विषय के सम्बन्ध में पुनः अन्वेषण किया जाय; या (ग) यह मान सकेगा कि रिपोर्ट में बतलाई गई त्रुटियां या अनियमितताएं या उनमें से कोई त्रुटियां, अनियमितता हटाई या दूर नहीं की गई हैं। (3) यदि संचालक यह मानता है कि "रिपोर्ट में बतलाई गई त्रुटियां या अनियमितताएं हटाई या दूर नहीं की गई हैं, तो वह उपधारा (1-ख) के अधीन संबंधित स्थानीय प्राधिकारी के प्रधान अधिकारी द्वारा दी गई प्रज्ञापना या दिये गये नये स्पष्टीकरण के अपने द्वारा प्राप्त किये जाने पर या उपधारा (1-ग) के अधीन विहित की गई कालावधि का अवसान हो जाने पर या जब कि स्थानीय प्राधिकारी का प्रधान अधिकारी ऐसी प्रज्ञापना या स्पष्टीकरण देने से चूक गया हो, उपधारा (1-ख) में वर्णित चार मास की कालावधि का अवसान हो जाने पर, यथाशक्य शीघ्र किन्तु रिपोर्ट प्राप्त होने से अधिक से अधिक एक वर्ष के भीतर, अभिकथित भ्रष्टाचारी व्यक्तियों के विरुद्ध आरोप उस धनराशि का, जिससे कि त्रुटियां या अनियमितताएं संबंधित हैं, वर्णन करते हुए विरचित करेगा और उक्त आरोपों की प्रतिलिपि आयुक्त को प्रेषित करने के अलावा स्थानीय प्राधिकारी के प्रधान अधिकारी को भी प्रेषित करेगा; और (3-क) यदि यथास्थिति स्थानीय प्राधिकारी का प्रधान अधिकारी या स्थानीय प्राधिकारी का कार्यपालिक अधिकारी उपधारा (1) या उपधारा (1-क) या उपधारा (1-ख) या उपधारा (1-ग) के अधीन कार्यवाही नहीं करता है, तो वह इस बात के लिये दायी होगा कि उसके विरुद्ध आरोप विरचित किये जायें तथा संचालक, उपधारा (1-ख) में वर्णित चार मास की कालावधि का अवसान हो जाने पर, अभिकथित भ्रष्टाचारी व्यक्ति या व्यक्तियों के विरुद्ध उपधारा (3) के अधीन आरोप विरचित करने के साथ-साथ यथास्थिति स्थानीय प्राधिकारी के प्रधान अधिकारी या स्थानीय प्राधिकारी के कार्यपालिक अधिकारी के विरुद्ध भी आरोप विरचित कर सकेगा। (4) इस धारा में कोई भी बात संचालक को भी कोई भी ऐसी जानकारी जिसके संबंध में यह प्रतीत हो कि वह आपराधिक दुर्विनियोग या कपट की उपधारणा का समर्थन करती है या जो, उसकी राय में, विशेष ध्यान दिये जाने या तत्काल अन्वेषण किये जाने के योग्य है, आयुक्त के ध्यान में, ऐसी कार्यवाही की जाने के लिये, जैसी कि आयुक्त आवश्यक समझे लाने से किसी भी समय प्रभावित नहीं करेगी।
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