Bare Act
The Jharkhand Cow Welfare Commission Act, 2005
0. Preamble
Preamble. Preamble राज्य में पशु परिरक्षण तथा कल्याण हेतु गो सेवा आयोग की स्थापना करने के लिए संस्थाओं के पर्यवेक्षण तथा नियंत्रण के लिए तथा उसे सशक्त और अनुषंगिक विषयों के लिए उपबंध करने हेतु अधिनियम। भारत गणराज्य के छप्पनवे वर्ष में झारखंड विधान मंडल द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ
- (1) यह अधिनियम झारखंड गो सेवा आयोग अधिनियम, 2005 कहा जायेगा ।
- (2) इसका विस्तार सम्पूर्ण झारखंड राज्य में होगा ।
- (3) यह ऐसी तारीख से प्रवृत्त होगा जो राज्य सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस निमित अधिसूचित करे ।
2. परिभाषाएँ
इस अधिनियम में जब तक संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो -
- (1) 'अधिनियम' से अभिप्रेत है झारखंड गो सेवा आयोग अधिनियम, 2005
- (2) 'आयोग' से अभिप्रेत है धारा 3 के अधीन झारखंड गो सेवा आयोग ।
- (3) 'पशु' से अभिप्रेत है गाय, साढ़, बैल और बछड़ा-बछिया
- (4) 'अध्यक्ष' से अभिप्रेत है आयोग का अध्यक्ष
- (5) 'संस्था' से अभिप्रेत है कोई ऐसी संस्था जो पशुओं के कल्याण में लगी हुई है और पशुओं को रखने, उनके प्रजनन, पालन तथा रख-रखाव भरण पोषण करने के लिए या अशक्त बूढ़े और रोगी पशुओं ग्रहण करने, उनका संरक्षण, देखभाल, प्रबंध तथा उपचार करने के प्रयोजनार्थ स्थापित की गई है जिसके अन्तर्गत गोसदन, गोशाला, पिंजरापोल, गो रक्षण संस्था और उसके परिसंघ या संघ जो तत्समय प्रवृत किसी अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत है या अन्यथा है -
- (6) 'सदस्य' से अभिप्रेत है आयोग का सदस्य और इसके अन्तर्गत अध्यक्ष भी आता है ।
3. आयोग का गठन
- (1) आयोग में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष को सम्मिलित करते हुए निम्नलिखित ग्यारह सदस्य होंगे :- 1. अध्यक्ष, जो राज्य सरकार द्वारा नाम निर्देशित किया जानेवाला कोई गैर सरकारी सदस्य होगा; 2. उपाध्यक्ष, जो राज्य सरकार द्वारा नाम निर्देशित किया जानेवाला कोई गैर सरकारी सदस्य होगा; 3. नौ अन्य सदस्य, जिनमें से पाँच सरकारी और चार गैर सरकारी होंगे;
- (2) सरकारी सदस्य निम्नलिखित होंगे - 1. विकास आयुक्त, झारखंड सरकार (पदेन) 2. वित्त आयुक्त अथवा सचिव, झारखंड सरकार (पदेन) 3. आयुक्त एवं सचिव, अथवा सचिव, पशुपालन विभाग (पदेन)
5. पुलिस महानिदेशक, झारखंड (पदेन)
- (3) निम्नलिखित गैर सरकारी सदस्य जिन्हें राज्य सरकार द्वारा नाम निर्देशित किये जायेंगे :- 1. झारखंड गोशाला संघ द्वारा चुना गया एक प्रतिनिधि; 2. बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, राँची के कुलपति या उनका प्रतिनिधि जो संकायाध्यक्ष की रैंक से नीचे के न हो; 3. राज्यन्तर्गत पशु कल्याण कार्य से जुड़े ऐसे गैर सरकारी व्यक्ति जिन्हें राज्य सरकार द्वारा समय-समय पर अधिसूचित किया जायेगा; 4. पदावधि
- (1) आयोग के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष को सम्मिलित करते हुए अन्य गैर सरकारी सदस्य आयोग की प्रथम बैठक की तारीख से तीन वर्ष की कालावधि के लिए पद धारित करेंगे और तीन वर्ष की अवधि की समाप्ति पर पद रिक्त कर देंगे और यदि राज्य सरकार द्वारा ऐसा अपेक्षित हो तो निवृत्त होने वाले सदस्य नए नाम निर्देशन के लिए पात्र होंगे ।
- (2) उपधारा-1 में विनिर्दिष्ट पदावधि के चालू रहने के दौरान किसी भी आकस्मिक रिक्ति या प्रतिस्थापन के कारण ऐसे अध्यक्ष और उपाध्यक्ष या अन्य गैर सरकारी सदस्यों की पदावधि, जो नाम निर्देशित किये जाये सामान्य रूप से नियुक्त अध्यक्ष, उपाध्यक्ष या सदस्य जिनके स्थान पर वे नाम निर्देशित हुये हो उनकी अवधि की अन्तिम तिथि तक होगी । 5. सचिव
- (1) राज्य सरकार आयोग को एक सचिव और ऐसे अन्य अधिकारी और कर्मचारी उपलब्ध करायेगी जो आयोग के कृत्यों को दक्षतापूर्वक पालन के लिए आवश्यक हो ।
- (2) आयोग के प्रयोजन के लिए नियुक्त सचिव और अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों का देय वेतन एवं भत्ते और उनकी सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें ऐसी होगी जैसी विहित किया जाय ।
6. अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और गैर सरकारी सदस्यों के भत्ते
आयोग के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और गैर सरकारी सदस्यों को, आयोग की निधि में से ऐसे भत्ते जो समय-समय पर विहित किये जाये, सन्दत्त किये जायेंगे ।
7. पद त्याग
आयोग का कोई भी गैर सरकारी सदस्य किसी भी समय अपना पद त्याग, राज्य सरकार को लिखित नोटिस देकर कर सकेगा और राज्य सरकार द्वारा ऐसा पद त्याग स्वीकृत किये जाने पर उसे उसका पद रिक्त किया हुआ समझा जायेगा ।
8. अशासकीय सदस्यों का हटाया जाना
राज्य सरकार गैर सरकारी सदस्य के पद से किसी व्यक्ति को हटा सकेगी यदि व्यक्ति - 1. अनुमोचित दिवालिया हो जाता है । 2. किसी ऐसे अपराध के लिये जिसमें राज्य सरकार की राय में नैतिक अधमता अंतर्वलित है दोष सिद्ध और कारावास से दण्डाविष्ट किया जाता है । 3. विकृत चित हो जाता है और किसी सक्षम न्यायालय द्वारा ऐसा घोषित किया जाता है । 4. कार्य करने से इन्कार करता है या कार्य करने में असमर्थ हो जाता है । 5. आयोग से अनुपस्थित रहने की अनुमति अभिप्राप्त किये बिना, आयोग के क्रमवर्ती तीन सम्मेलनों से अनुपस्थित रहता है, या 6. राज्य सरकार की राय में अध्यक्ष या सदस्य की हैसियत का इस प्रकार दुरुपयोग करता है जिससे कि उस व्यक्ति का उस पद पर बना रहना पशु के हित में या लोक हित में अपायकर हो गया है । परन्तु इस उपधारा के अधीन किसी व्यक्ति को तब तक नही हटाया जायेगा जब तक कि उस व्यक्ति को उस मामले में सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर नही दिया जाता है ।
9. अशासकीय सदस्य के रूप में नियुक्ति की निरर्हता
कोई भी व्यक्ति अशासकीय सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिए पात्र नही होगा, यदि वह- 1. भारत का नागरिक नही है; 2. इक्कीस वर्ष की आयु पूरी न कर चुका हो; 3. सक्षम न्यायालय द्वारा विकृत चित न्यायनिर्णित कर दिया गया है; 4. नैतिक अधमता अंतर्वलित करने वाले किसी अपराध के लिये किसी न्यायालय द्वारा कारावास से दण्डाविष्ट किया गया है; 5. अवचार के कारण पूर्व में अगर सरकारी सेवा में हो तथा सरकार की सेवा से पदच्युत कर दिया गया है और लोक सेवा में नियोजन के लिये निरर्हित घोषित कर दिया गया है; और 6. अनुमोचित दिवालिया है ।
10. आकस्मिक रिक्ति
अपनी पदावधि का अवसान होने के पूर्व किसी अशासकीय सदस्य की मृत्यु हो जाने, उसके पद त्यागकर देने या उसके निरर्हित हो जाने की दशा में या कार्य करने से असमर्थ हो जाने की दशा में ऐसे पद में आकस्मिक रिक्ति हो गई समझी जायेगी और ऐसी रिक्ति, उस पर किसी व्यक्ति की सदस्य के रूप में नियुक्ति करके, यथासंभव शीघ्र भरी जायेगी, और वह ऐसा पद अपने पूर्ववर्ती की अनवसित पदावधि के लिये धारण करेगा ।
11. आयोग की प्रक्रिया
आयोग जब आवश्यक हो ऐसे समय और स्थान पर बैठक करेगा जैसा अध्यक्ष उचित समझे । 2. आयोग अपनी प्रक्रिया स्वयं विनियमित करेगा । 3. आयोग के समस्त और विनिश्चय सचिव या सचिव द्वारा इस निमित्त सम्भव रूप से प्राधिकृत आयोग के किसी अन्य अधिकारी द्वारा अधिप्रामाणित किए जायेंगे ।
12. रिक्ति के कारण कार्यवाहियों का अविधिमान्य न होना
आयोग का कोई कार्य या कार्यवाही केवल इस कारण अविधिमान्य नहीं समझी जायेगी कि आयोग में कोई रिक्ति है या आयोग के गठन में कोई त्रुटि है ।
13. अधिकारियों और कर्मचारियों की नियुक्ति
ऐसे नियमों के अध्यधीन रहते हुए जो कि इस निमित्त बनाये जाये, राज्य सरकार आयोग को इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों का दक्षतापूर्वक निर्वहन करने में समर्थ बनाने के प्रयोजन के लिये उतने अधिकारियों तथा अन्य कर्मचारियों की व्यवस्था कर सकेगी जितने कि आवश्यक समझें जाये ।
14. संस्थाओं का रजिस्ट्रीकरण एवं उनके लेखाओं की संपरीक्षा
इस अधिनियम के प्रारम्भ होने के प्रत्येक संस्था ऐसे प्रारम्भ के तीन मास के भीतर इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकरण के लिये आवेदन ऐसी रीति में तथा ऐसी विशिष्टयाँ अन्तर्विष्ट करते हुए प्रस्तुत करेगी, जैसा कि विहित की जाय; 2. आवेदन के साथ ऐसी फीस संलग्न की जायेगी, जैसा कि विहित की जाय; 3. आयोग, ऐसी जाँच के पश्चात् जैसा कि वह ठीक समझे, रजिस्ट्रीकरण प्रमाण-पत्र ऐसे प्रारूप में जारी करेगा जैसा कि विहित किया जाय; 4. आयोग अपने यहाँ रजिस्ट्रीकृत संस्थाओं का एक रजिस्टर ऐसे प्रारूप में रखेगा जैसा कि विहित किया जाय; 5. उपधारा
- (4) के अधीन यथा विहित रजिस्टर में अभिलिखित किसी संस्था से संबंधित किन्ही विशिष्टियों में जब कभी कोई परिवर्तन होता है तो संस्था की ओर से कार्य करने के लिये न्यस्त व्यक्ति, ऐसे परिवर्तन की रिपोर्ट आयोग को देगा जो ऐसी जाँच के पश्चात् जैसा कि वह ठीक समझे रजिस्टर में आवश्यक परिवर्तन करेगा । 6. ऐसी प्रत्येक संस्था के जो इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत की गई है लेखाओं को, प्रत्येक वर्ष के इकत्तीस मार्च को अन्तिम रूप दिया जायेगा और प्रतिवर्ष उसके लेखाओं की संपरीक्षा विहित रीति में की जायेगी ।
15. आयोग के कृत्य
आयोग का यह कृत्य होगा कि वह - 1. पशुओं को तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन दिये संरक्षण को सुनिश्चित करें, कि जिसमें कत्ल के लिये ले जाये जाने वाले, कत्ल के लिये या उसकी संभावना में ले जाये जाने या ढोए जाने वाले पशुओं की जब्ती, अभिरक्षा और आरोपियों के विरुद्ध आपराधिक कार्यवाही करना भी समाविष्ट होगा ; 2. (एक)-खण्ड
- (1) मे निर्दिष्ट विधियों के समुचित तथा यथासमय कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने हेतु राज्य सरकार के संबंधित विभागों को अथवा राज्य सरकार के स्वामित्व के या उसके द्वारा नियंत्रित किसी निकाय या प्राधिकारी को, जो ऐसे कार्यान्वयन के लिये जिम्मेदार है उन्हें अधिक प्रभावी बनाने के लिये उपचारात्मक उपाय प्रस्तावित करे; (दो) गो-शाला विकास स्कीमों के अधीन राज्य सरकार या केन्द्र सरकार के कार्यक्रमों का समुचित तथा यथासमय कार्यान्वयन को सुनिश्चित करे; 3. पशुओं की स्वदेशी, विशेषतः झारखण्ड राज्य की नस्ल के विकास के लिये, संस्थाओं की सक्रिय भागीदारी को सुनिश्चित करे; 4. पशुओं के स्वास्थ्य संबंधी देखभाल को प्रोन्नत करे; 5. तत्समय प्रवृत्त किसी अधिनियम के उल्लंघन के लिये अभिग्रहित किये गये पशुओं की देखभाल तथा प्रबंधन को सुनिश्चित करे; 6. किसी संस्था द्वारा भरण पोषण के लिये रखे गये अशक्त तथा बूढ़े पशुओं के समुचित प्रबंधन को सुनिश्चित करे; 7. संस्थाओं का पर्यवेक्षण तथा निरीक्षण करे; 8. चारे की उन्नत किस्म की खेती, चारा बीज उत्पादन कार्यक्रम तथा चारागाह विकास गतिविधियों को प्रोन्नत करे; 9. कृषि विश्व विद्यालय तथा पशु तथा चारा विकास कार्यक्रम पर कार्यवाही करने वाले अन्य अनुसंधान संस्थाओं से समन्वय करे और नई वैज्ञानिक तकनीकी अपनाने में संस्थाओं की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करे; 10. ऐसे उपायों को सुझाए जो आर्थिक रूप से कमजोर संस्थाओं को सशक्त बनाने में सहायक हो सके; 11. संस्थाओं को आर्थिक सहायता प्रदान करे; 12. किसी संस्थान के कार्यकलापों के संबंध में शिकायतों की जाँच करे; 13. ऐसे अन्य कृत्यों का जैसे कि उसे राज्य सरकार द्वारा समनुदेशित किये जाये, पालन करे ।
16. आयोग की निधियाँ
आयोग की निधि सरकार द्वारा दिये गये अनुदानों और आयोग द्वारा प्राप्त फीसों तथा अधिरोपित जुर्माने की राशि, किसी व्यक्ति द्वारा आयोग को दिये गये दान, उपहार तथा वसीयत से मिलकर बनेगी ।
17. आयोग का बैंकर
आयोग की समस्त निधियाँ किसी राष्ट्रीयकृत बैंक में रखी जायेगी और ऐसे व्यक्ति द्वारा जो कि आयोग द्वारा प्राधिकृत किये जाये, संचालित की जायेगी ।
18. अभिलेख मंगाने की आयोग की शक्ति
इस अधिनियम के अधीन कृत्यों का पालन करने के लिये स्वयं को समर्थ बनाने के लिये आयोग राज्य सरकार के किसी विभागीय अथवा किसी निकाय या प्राधिकारी या किसी संस्था से जानकारी या रिपोर्ट प्राप्त करेगा और यथास्थिति वह विभाग या निकाय या प्राधिकारी या संस्था यथासाध्य शीघ्रता से आयोग की अध्यपेक्षा का अनुपालन करेगा ।
19. लेखे और संपरीक्षा
आयोग समुचित लेखाओं और अन्य सुसंगत अभिलेखों को बनाए रखेगा तथा लेखाओं का एक वार्षिक विवरण ऐसे प्रारूप में तैयार करेगा जैसा कि राज्य सरकार द्वारा महालेखाकार, झारखण्ड के परामर्श से विहित किया जाये । 2. आयोग के लेखाओं की संपरीक्षा महालेखाकार द्वारा ऐसे अन्तरालों पर की जायेगी जो कि उसके द्वारा निर्दिष्ट किये जाये और ऐसी संपरीक्षा के संबंध में हुआ कोई व्यय आयोग द्वारा महालेखाकार को संदेय होगा । 3. महालेखाकार और उसके द्वारा इस अधिनियम के अधीन आयोग के लेखाओं की संपरीक्षा के संबंध में नियुक्त किसी व्यक्ति को ऐसी संपरीक्षा के संबंध में वही अधिकार तथा विशेषाधिकार होंगे और वही प्राधिकार होगा जो सामान्यतया महालेखाकार को सरकारी लेखाओं की संपरीक्षा के संबंध में होते है और विशिष्टतया लेखाओं, संबद्ध वाउचरों तथा अन्य दस्तावेजों और कागज पत्रों को मांगे जाने पर पेश करने और आयोग के कार्यालय मे से किसी भी कार्यालय का निरीक्षण करने का अधिकार होगा ।
20. वार्षिक रिपोर्ट
आयोग, प्रत्येक वित्तीय वर्ष के लिये ऐसे प्रारूप में तथा ऐसी तारीख तक जो कि विहित की जाये, ऐसी वार्षिक रिपोर्ट तैयार करेगा जिसमें पूर्ववर्ती वित्तीय वर्ष के दौरान उसके कार्यकलापों का सम्पूर्ण लेखा-जोखा आ जायेगा और उसकी एक प्रति राज्य सरकार को अग्रेषित करेगा ।
21. आयोग की रिपोर्ट पर कार्यवाही
धारा 20 के अधीन की गई रिपोर्ट प्राप्त होने पर राज्य सरकार, उस पर ऐसी कार्यवाही कर सकेगी जैसा कि वह ठीक समझे । 2. राज्य सरकार को की गई रिपोर्ट की एक प्रति और उसके साथ उस पर राज्य सरकार द्वारा उपधारा
- (1) के अधीन की गई कार्यवाही की रिपोर्ट विधान-सभा के पटल पर रखा जायेगा ।
22. रिपोर्ट, विवरणियाँ आदि मंगाने की राज्य सरकार की शक्ति
राज्य सरकार आयोग से ऐसी रिपोर्ट विवरणियाँ, विवरण समय-समय पर मंगा सकेगी जो कि वह आवश्यक समझे ।
23. राज्य सरकार के निर्देश
- (1) आयोग इस अधिनियम के अधीन के अपने कृत्यों का निर्वहन करने में, नीति संबंधी प्रश्न पर ऐसे निर्देशों द्वारा मार्गदर्शन प्राप्त करेगा जो राज्य सरकार द्वारा उसे दिये जाये ।
- (2) यदि राज्य सरकार और आयोग के बीच इस संबंध में कोई विवाद उद्भूत होता है कि क्या कोई नीति विषयक प्रश्न है या नही तो उस पर राज्य सरकार का विनिश्चत अंतिम होगा ।
24. आयोग के सदस्य लोक सेवक होंगे
आयोग के समस्त सदस्य तथा अधिकारी जबकि वे इस अधिनियम के उपबंधों में किसी उपबंध के अनुसरण में कार्य कर रहे है या उनका इस प्रकार कार्य करना तात्पर्यित है, भारतीय दण्ड संहिता 1860 (1860 का सं० 45) की धारा-21 के अर्थ के अन्तर्गत लोक सेवक समझे जायेंगे ।
25. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई का संरक्षण
इस अधिनियम के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिये आशयित किसी बात के लिये कोई वाद, अभियोजन या अन्य वैधिक कार्यवाही आयोग के किसी सदस्य, अधिकारी या सेवक के विरुद्ध नही होगी ।
26. दंड
- (1) यदि कोई व्यक्ति इस अधिनियम या उसके अधीन बनाये गये किसी नियम के किन्ही उपबंधों का उल्लंघन करता है या ऐसे उपबंध के अनुसरण में दिये गये किसी आदेश का पालन करने में असफल रहता है तो आयोग ऐसी जाँच के पश्चात् जैसा कि वह आवश्यक समझे तथा उस व्यक्ति को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् उसके ऊपर ऐसा दंड अधिरोपित कर सकेगा जो दो हजार रुपये तक का हो सकेगा ।
- (2) उपधारा
- (1) के अधीन आयोग द्वारा पारित किये गये आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति आदेश की संसूचना के तीस दिन के भीतर राज्य सरकार के समक्ष अपील दाखिल कर सकेगा जिसका उस पर निर्णय अंतिम होगा ।
- (3) दंड की रकम यदि आयोग के आदेश या अपील में राज्य सरकार के आदेश की संसूचना के तीस दिन के भीतर संदत न की गई हो तो भू-राजस्व की बकाया के रूप में वसूल करने योग्य होगी ।
27. नियम बनाने की शक्ति
- (1) राज्य सरकार साधारणतया इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिये नियम बना सकेगी ।
- (2) विशिष्टतया तथा पूर्वगामी शक्तियों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियमों में निम्नलिखित समस्त विषयों या उनमें से किसी विषय के लिये उपबंध हो सकेंगे अर्थात् - क. आयोग के कर्मचारियों की सेवा के निबंधन तथा शर्तें; ख. आयोग के सदस्यों को संदाय किये जा सकने वाले भत्ते; ग. वह रीति जिसमें संस्थाओं का रजिस्ट्रीकरण किया जायेगा; घ. वह रीति जिसमें तथा वह प्राधिकारी जो आयोग की निधि का संचालन करेगा; च. वह रीति जिसमें आयोग द्वारा शिकायतों को ग्रहण किया जायेगा तथा जांच करने का ढंग; छ. वह प्रारूप तथा रीति जिसमें तथा वह समय जिसके भीतर आयोग द्वारा रिपोर्ट प्रस्तुत की जायेगी; ज. वह फीस जिसका भुगतान किये जाने पर रजिस्ट्रीकरण किया जायेगा तथा वह प्रारूप जिसमें रजिस्ट्रीकरण का प्रमाण-पत्र जारी किया जायेगा;
- (3) इस अधिनियम के अधीन बनाए गए समस्त नियम विधान-सभा के पटल पर रखे जाएंगे ।
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PDF: pending for this language.