Bare Act
The Jharkhand Women's Commission Act, 2005
General200512 sections
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और आरम्भ
Statutory text
- (1) यह अधिनियम झारखण्ड राज्य महिला आयोग अधिनियम, 2005 कहा जा सकेगा।
- (2) इसका विस्तार सम्पूर्ण झारखण्ड राज्य में होगा।
- (3) यह उस तिथि से प्रवृत्त होगा जो राज्य सरकार झारखण्ड राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करे।
2. परिभाषाएँ
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इस अधिनियम में जबतक विषय या संदर्भ में अन्यथा अपेक्षित न हो :- (क) 'आयोग' से अभिप्रेत है, धारा-3 के अंतर्गत झारखण्ड राज्य महिला आयोग, (ख) 'सदस्यों' से अभिप्रेत है, आयोग के सदस्य और इसमें सदस्य सचिव भी सम्मिलित होंगे। (ग) 'विहित' से अभिप्रेत है, इस अधिनियम के अधीन बनायी गयी नियमावली द्वारा विहित।
3. झारखण्ड राज्य महिला आयोग का गठन
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- (1) झारखण्ड राज्य सरकार द्वारा एक निकाय का गठन किया जायेगा, जो झारखण्ड राज्य महिला आयोग व नाम से जाना जायेगा। आयोग इस अधिनियम के अधीन प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग एवं उसमें समनुदेशित कृत्यों का पालन करेगा। इस आयोग के अध्यक्ष एवं सभी गैर-सरकारी सदस्य महिलाएँ होंगी।
- (2) (क) अध्यक्ष जो महिलाओं के हित के लिए वचनबद्ध हों, का मनोनयन राज्य सरकार द्वारा किया जायेगा। (ख) पाँच गैर-सरकारी महिला सदस्य जिन्हें
- (1) समाज सेवा
- (2) विधि विधान
- (3) समाज कल्याण या प्रशासन या स्वास्थ्य या शिक्षा तथा
- (4) स्वयंसेवी संस्था, ट्रेड यूनियन या ऐसी संस्था या उद्योग की व्यवस्था या प्रबंधन का अनुभव हो। इनमें से एक अनुसूचित जनजाति, एक अनुसूचित जाति एवं एक अल्पसंख्यक वर्ग से हो। (ग) एक सरकारी सदस्य, कल्याण विभाग के प्रतिनिधि के रूप में होगा। (घ) एक सरकारी सदस्य, गृह विशेष विभाग के प्रतिनिधि के रूप में होगा। (च) आयोग की सदस्य सचिव (महिला) जो राज्य सरकार द्वारा नामित की जायेगी, पदेन सदस्य सचिव होगी।
4. अध्यक्ष एवं सदस्यों का कार्यकाल एवं सेवा शर्तें
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- (1) अध्यक्ष एवं प्रत्येक सदस्य तीन वर्षों से अनधिक कालावधि तक पदधारण करेंगे, जो इस अधिसूचना में राज्य सरकार द्वारा विनिर्दिष्ट की जायेगी।
- (2) अध्यक्ष या कोई भी गैर सरकारी सदस्य लिखित रूप में सरकार को संबोधित पत्र अध्यक्ष अथवा सदस्य का पद त्याग कर सकता है, साथ ही निम्नलिखित कारणों के अतिरिक्त यदि राज्य के हित में अध्यक्ष अथवा किसी सदस्य को अपने पद पर बने रहना लोकहित में न हो, तो उस सरकार द्वारा अपने पद से हटाया जा सकेगा :- (क) अनुन्मोचित दिवालिया घोषित कर दिया गया हो; (ख) नैतिक अधमता में संलग्न होने के अपराध में सिद्ध दोषी अथवा कारावास के लिए कर दिया गया हो; (ग) विकृत चित्त हो गया हो, अथवा किसी सक्षम न्यायालय द्वारा वैसा घोषित कर दिया गया; (घ) अपना कार्य करने से इंकार करते हों, या करने में अक्षम हों; (च) बिना अवकाश प्राप्त किये आयोग की लगातार तीन बैठकों में अनुपस्थित रहे हों;
- (3) उप-धारा
- (2) के अधीन अथवा अन्य रीति से होने पर वह पद मनोनयन द्वारा भरा जायेगा।
5. आयोग के अध्यक्ष एवं गैर-सरकारी सदस्यों को देय सुविधाएं
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अध्यक्ष तथा गैर-सरकारी सदस्यों को देय वेतन एवं भत्ते और उनकी सेवा, अन्य बन्धेज तथा वही होंगी जो विहित की जायें।
6. आयोग के पदाधिकारी तथा कर्मचारीगण
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- (1) इस अधिनियम के अधीन आयोग के कृत्यों को दक्षतापूर्ण पालन करने हेतु आवश्यकत्वानुसार राज्य सरकार द्वारा पदाधिकारी और कर्मचारी उपलब्ध कराये जायेंगे। सरकार ये कर्मी प्रतिनियुक्ति के आधार पर उपलब्ध करायेगी। यदि प्रतिनियुक्ति हेतु कर्मी नहीं मिले तो संविदा के आधार पर अध्यक्ष एवं सदस्यों की पदस्थापना अवधि तक कर्मी रखें जायेंगे।
- (2) आयोग के कार्यों के प्रयोजनार्थ नियुक्त किये गये पदाधिकारियों तथा कर्मचारियों को देय वेतन भत्ते उनकी सेवा शर्तें और प्रबंधन उसी रीति से होगी, जो राज्य सरकार द्वारा विहित होगी।
7. अनुदान की राशि से वेतन एवं भत्ते का भुगतान किया जाना
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अध्यक्ष एवं सभी सदस्यों की देय भत्ते इत्यादि के साथ धारा
- (6) में निर्देशित अधिकारियों एवं कर्मचारियों को देय वेतन, भत्ते एवं पेंशन को सम्मिलित करते हुए प्रशासनिक व्यय का भुगतान अनुदान से किया जायेगा।
8. आयोग को कार्यवाही एवं रिक्ति इत्यादि के कारण अविधिमान्य न होना
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आयोग के किसी भी कार्रवाई या कार्यवाही पर कोई आक्षेप नहीं किया जायेगा तथा आयोग गठन में किसी प्रकार की रिक्ति या त्रुटि विद्यमान रहने मात्र के आधार पर अविधिमान्य नहीं किया जायेगा।
9. आयोग द्वारा गठित समितियाँ
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- (1) आयोग द्वारा समय-समय पर आवश्यकत्वानुसार विशेष मामलों के निष्पादन हेतु समितियाँ गठित की जायगी।
- (2) उप-धारा
- (1) के अन्तर्गत गठित समिति के सदस्य के रूप में किसी भी व्यक्ति को समायोजित करने का अधिकार आयोग को होगा, यदि वह व्यक्ति आयोग का सदस्य नहीं है ओर यदि उसे आयोग योग्य समझता है तो वैसे समायोजित व्यक्ति को समिति की बैठक में उपस्थित रहने तथा भाग लेने का अधिकार प्राप्त हो जायेगा तथा उसे मत देने का अधिकार प्राप्त नहीं होगा।
- (3) वह व्यक्ति, जिसे सहयोजित किया जायेगा, समिति की बैठक में भाग लेने के लिए वह भत्ता प्राप्त करने का हकदार होगा जो नियमानुकूल विहित होगा। 9(क). आयोग द्वारा प्रक्रिया का विनियमन
- (1) आयोग तथा उसके द्वारा गठित समिति की बैठक हेतु तिथि, समय और स्थान का निर्धारण आयोग के अध्यक्ष द्वारा किया जायेगा।
- (2) आयोग अपनी तथा सभी समितियों की प्रक्रिया विनियमित करेगी।
- (3) आयोग के सभी आदेशों तथा निर्णयों को सदस्य-सचिव अथवा आयोग के अन्य किसी पदाधिकारी द्वारा जिन्हें सदस्य-सचिव द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किया गया हो, अधिप्रमाणित किया जायेगा।
10. आयोग का कृत्य
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- (1) आयोग निम्नलिखित कृत्यों में से सबों या उनमें से किसा भी कृत्य का संपादन करेगा :- (क) विद्यमान विधियों के अधीन महिलाओं की सुरक्षा से संबंधित सभी तथ्यों का अन्वेषण और जाँच करना; (ख) महिलाओं की सुरक्षा के निमित्त किये गये कार्यों पर एक वार्षिक प्रतिवेदन या कोई और दावा उचित समय, जो आयोग उचित समझे, राज्य सरकार को प्रस्तुत करेगा; (ग) राज्य में महिलाओं की स्थिति में गुणात्मक सुधार हेतु सुरक्षा के उपायों के व्यवहारिक कार्यान्वयन हेतु प्रतिवेदनों की अनुशंसा करना; (घ) महिलाओं को प्रभावित करनेवाले विद्यमान विधियों और उसके उपबंधों का समय-समय पर पुनरावलोकन करना और उसमें संभावित संशोधनों को अनुशंसा करना, जिससे कि विधान में किसी प्रकार की कमी, अपर्याप्तता अथवा त्रुटियों को ठीक करने हेतु सुधारात्मक विधायी अध्युपायों के संबंध में परामर्श दिया जा सके; (च) राज्य में महिलाओं के विरूद्ध हो रहे उत्पीड़न, यातनाओं और अत्याचारों द्वारा महिलाओं से संबंधित विधि और विधिक उपायों के उल्लंघन के सभी मामलों को सक्षम प्राधिकारियों के समक्ष प्रस्तुत करना; (छ) निम्नलिखित उपखंडों से संबंधित विषयकित शिकायतों की जाँच करना और स्वप्रेरणा से ध्यान देना;
- (1) महिलाओं को अधिकारों से वंचित करने या होने की दशा में;
- (2) महिलाओं को संरक्षण और समानता तथा उसके विकास के उद्देश्य की प्राप्ति के प्रयोगात्मक कोई अधिनियमित की गई विधियों का क्रियान्वयन न किये जाने की दशा में;
- (3) महिलाओं को कठिनाइयों को दूर करने तथा कल्याण और राहत उपलब्ध कराने के उद्देश्य वाले नीतिगत निर्णयों, मार्गदर्शनों या अनुदेशों का पालन न किये जाने और सक्षम प्राधिकारियों के साथ ऐसे विषयों पर विवाद उत्पन्न होने के मुद्दों की दशा में; (ज) भेदभाव से उत्पन्न होने वाली विनिर्दिष्ट समस्याओं या उससे उत्पन्न स्थितियों के बारे में विशेष अध्ययन या अन्वेषण कर उनके काम को पहचान कर उसे दूर करने के उपायों की युद्धस्तर नीति की अनुशंसा करना; (झ) उत्थान हेतु शैक्षणिक शोध का उत्तरदायित्व लेना जिससे उसके उपाय सुझाये जा सके फलस्वरूप सभी क्षेत्रों में महिलाओं का सम्यक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सके जिससे उनके उत्थान जैसी बातें उनके घरों तक पहुँचे तथा इससे संबंधित, मौलिक सेवाओं अपर्याप्त समर्थक सेवाओं तथा भेषजापण व्यवसायिक स्वास्थ्य परिसंकटों को कम करने और उनकी उत्पादकता में वृद्धि लाने हेतु आसन्न उत्तरदायी बातों की पहचान करना; (ञ) महिलाओं के सामाजिक-आर्थिक विकास की योजनाबद्ध प्रक्रिया में भाग लेना और उससे संबंधित परामर्श देना; (ट) राज्य के अधीन महिलाओं के विकास की प्रगति का मूल्यांकन करना; (ठ) कारागार, प्रतिप्रेषण गृहों, महिलाओं की संस्था, या अन्य अभिरक्षा का स्थान, जहाँ महिलाएँ कैदी के रूप में या अन्यथा रूप में रखी जाती हों का निरीक्षण करना या करवाना और यदि आवश्यक समझा जाय तो सुधारात्मक कार्रवाई हेतु इस कार्य से संबंधित प्राधिकारियों के साथ सहयोग करना; (ड) महिलाओं के बड़े निकाय को प्रभावित करनेवाले अंतर्ग्रस्त मुद्दों के विवादों का निपटारा करना; (ढ) महिलाओं से संबंधित किसी विषय वस्तु जो विशेष रूप से उन विभिन्न कठिनाइयों के बारे में, जिनके अधीन महिलाएँ पीड़ित होती है, सरकार को सामयिक प्रतिवेदन प्रस्तुत करना; (ण) इसके अतिरिक्त कोई अन्य विषय जिसे राज्य सरकार द्वारा उन्हें समय-समय पर सौंपा जा सके।
- (2) राज्य सरकार द्वारा उपधारा
- (1) के खंड (ख) में निर्देशित सभी प्रतिवेदनों को राज्य की अनुशंसाओं पर की गई अथवा की जानेवाली प्रस्तावित कार्रवाई या अस्वीकृति, यदि कोई हो, अथवा अनुशंसाओं में से भी किसी की अस्वीकृति के कारणों को स्पष्ट करते हुए ज्ञापन के साथ, विधान-मंडल के प्रत्येक सदन के समक्ष प्रस्तुत किया जायेगा।
- (3) आयोग को, उपधारा
- (1) खंड (क) और खंड (छ) के उपखंड
- (1) में निर्देशित किसी विषय के बारे में अन्वेषण चल रहा हो, विशेष रूप से निम्नलिखित विषयों के संबंध में, किसी वाद को विचारण करनेवाले सिविल न्यायालय की सभी शक्तियाँ प्राप्त होगी :- (क) भारत के किसी भी भाग में रहनेवाले किसी भी दोषी व्यक्ति को सम्मन करने, उपस्थित होने हेतु बाध्य करने और शपथ पत्र पर उसका परीक्षण करने; (ख) किसी दस्तावेज की खोज और उपस्थापन को अध्यपेक्षा करने; (ग) शपथ-पत्र पर साक्ष्य प्राप्त करने; (घ) किसी न्यायालय या अधिकारियों से किसी लोक-अभिलेख या उसकी प्रति की अध्यपेक्षा करने; (च) साक्ष्यों एवं दस्तावेजों के परीक्षण के लिए कमीशन बहाल करने; (छ) कोई अन्य विषय जो समय-समय पर विहित किये जाये।
11. राज्य सरकार द्वारा अनुदान
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- (1) राज्य सरकार इसके निमित विधि के अधीन विधान-मंडल द्वारा पारित सम्यक विनियोग के पश्चात् अनुदान के रूप में उतनी धनराशि आयोग को उपलब्ध करायेगी जितनी राज्य सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए उपयोग होने हेतु उचित समझें।
- (2) आयोग इस अधिनियम के अधीन कृत्यों के अनुपालन के लिए उतनी रकम खर्च कर सकेगी जितनी वह उचित समझे और वह रकम उपधारा
- (1) में निर्देशित अनुदान की राशि से भुगतेय व्यय के रूप में होगी।
- (3) राज्य सरकार अध्यक्ष और सदस्य-सचिव को वित्तीय शक्तियों और आयोग के कार्यों से सम्बन्धित विषयों के लिए निधि की मंजूरी हेतु प्रक्रिया विनिर्दिष्ट करेगी।
18. निरसन एवं व्यावृत्ति
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- (1) झारखण्ड राज्य महिला आयोग अध्यादेश, 2004 (अध्यादेश 02, 2004) इसके द्वारा निरस्त किया जाता है।
- (2) ऐसे निरसन के होते हुए भी उक्त अध्यादेश के द्वारा या इसके अधीन प्रदत्त शक्ति के प्रयोग में किया गया कोई कार्य या की गई कोई कार्रवाई इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन प्रदत्त शक्तियों के प्रयोग में किया गया या की गई समझी जायेगी, मानो यह अधिनियम इस दिन प्रवृत्त था जिस दिन ऐसा कार्य किया गया या ऐसी कार्रवाई की गयी थी।
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